होर्मुज़ का संकट: वैश्विक ऊर्जा, समुद्री व्यापार और शक्ति-राजनीति का अखाड़ा

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डॉ ब्रजेश कुमार मिश्र

फारस की खाड़ी और अरब सागर के बीच स्थित स्ट्रेट आफ होर्मुजआज विश्व राजनीति का सबसे संवेदनशील समुद्री बिन्दु बन चुका है। भू-राजनीतिक, भू-आर्थिक और भू-सामरिक दृष्टि से यह जलडमरूमध्य आधुनिक वैश्विक व्यवस्था का केन्द्रीय तन्त्रिकाबिन्दु है। विश्व के लगभग 20 प्रतिशत तेल और बड़ी मात्रा में प्राकृतिक गैस इसी मार्ग से होकर एशिया, यूरोप और अमेरिका तक पहुँचती है। प्रतिदिन लगभग 20–21 मिलियन बैरल तेल इस मार्ग से गुजरता है, इसलिए इसे वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति की “जीवनरेखा” कहा जाता है। ऐतिहासिक तौर पर होर्मुज का महत्त्व बहुत पुराना है। मुगल बदशाह बाबर की आत्मकथा ‘बाबरनामा’में भी इसका उल्लेख मिलता है। बाबर ने लिखा है कि मध्य एशिया के फ़रगना क्षेत्र से बादाम और अन्य वस्तुएँ लम्बी दूरी तय करके होर्मुज के बन्दरगाह तक लाई जाती थीं और वहाँ से अन्तर्राराष्ट्रीय बाजारों में भेजी जाती थीं। इससे स्पष्ट होता है कि मध्यकाल में भी यह क्षेत्र मध्य एशिया, फारस और भारतीय उपमहाद्वीप के बीच व्यापारिक सम्पर्क का महत्त्वपूर्ण केन्द्र था। आधुनिक इतिहास में भी इसका महत्त्व लगातार बढ़ता गया। 16वीं शताब्दी में पुर्तगाल ने 1515 में इस क्षेत्र पर कब्ज़ा किया ताकि समुद्री व्यापार मार्गों पर नियन्त्रण स्थापित किया जा सके, बाद में 1622 में ईरान के सफवीद साम्राज्य और अंग्रेज़ों की संयुक्त सेना ने पुर्तगालियों को यहाँ से हटाया। इसके बाद होर्मुज द्वीप और उत्तरी त्यात पर ईरान का नियन्त्रण हो गया और स्ट्रेट ऑफ होर्मुज एक अन्तर्राष्ट्रीय जलडमरूमध्य बन गया। यद्यपि यह एक अन्तर्राष्ट्रीय जलडमरूमध्य तथापि वर्तमान समय में ईरान अपनी भू-राजनीति, भू-सामरिकी और ऐतिहासिक कारणों से इस पर अपना दावा करता है और मध्य पूर्व में उत्पन्न संकट के बीच वह इसकी पुष्टि भी कर रहा है।    

मध्य पूर्व संकट को उत्पन्न हुएअब तीन सप्ताह से ज्यादा समय हो गया है  इससे वैश्विक ऊर्जा बाजार में भारी अस्थिरता उत्पन्न हुई है और तेल की कीमतों में तेज़ उछाल आया है। फरवरी 2026 के अन्त तक ब्रेंट क्रूड की कीमत लगभग 70 डॉलर प्रति बैरल थी, लेकिन होर्मुज़ जलडमरूमध्य से तेल आपूर्ति बाधित होने के कारण इसकी कीमत मार्च के मध्य तकलगभग102–104 डॉलर प्रति बैरल के बीच पहुँच गई है जिससे वैश्विक ऊर्जा बाजार में अस्थिरता पैदा हो गई है, कई देशों ने अपनी ऊर्जा आपूर्ति को सुरक्षित रखने के लिए वैकल्पिक स्रोतों तथा रणनीतिक तेल भंडार पर विचार करना शुरू कर दिया है।इस युद्ध का सबसे बड़ा प्रभाव समुद्री व्यापार पर पड़ा है। ईरान की इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कॉर्प्स ने कई जहाजों को चेतावनी दी कि वे होर्मुज जलडमरूमध्य से न गुजरें। इसके कारण जहाजों की आवाजाही लगभग ठप हो गई और कई अंतरराष्ट्रीय शिपिंग कंपनियों ने अपनी सेवाएँ अस्थायी रूप से रोक दीं।अंतरराष्ट्रीय समुद्री एजेंसियों के अनुसार हजारों नाविकों के साथ बड़ी संख्या में जहाज इस क्षेत्र में फँस गए हैं, और कई कंपनियों ने सुरक्षा कारणों से अपने जहाजों को रोक दिया या मार्ग बदल दिया। फिलहाल सैकड़ों जहाजों की आवाजाही बाधित हुई है, जिससे वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला पर व्यापक प्रभाव पड़ा है।

भारत के सन्दर्भ में यह संकट विशेष महत्त्व रखता है क्योंकि भारत अपने तेल आयात का बड़ा हिस्सा खाड़ी क्षेत्र से प्राप्त करता है। इस क्षेत्र में प्रारंभिक चरण में 36–38 जहाजों और लगभग 1100 नाविकों के प्रभावित होने की आशंका जताई गई थी लेकिन अभी भी 22 भारतीय जहाज और 611 भारतीय नाविकइस क्षेत्र में फसे हैं, इससे स्पष्ट है कि स्थिति धीरे-धीरे नियंत्रित हो रही है, किन्तु पूरी तरह सामान्य नहीं हुई है।हालाँकि कूटनीतिक प्रयासों के परिणामस्वरूप कुछ भारतीय एलपीजी टैंकर सुरक्षित रूप से इस मार्ग को पार कर पाए, जिससे तत्काल ऊर्जा आपूर्ति में आंशिक राहत मिली है।यह संकट भारत की ऊर्जा सुरक्षा के लिए गंभीर चुनौती बना हुआ है, जिसके समाधान हेतु भारत कूटनीति, वैकल्पिक आपूर्ति स्रोतों और रणनीतिक भंडार जैसे उपायों पर समानांतर रूप से कार्य कर रहा है

चीन के सन्दर्भ में स्थिति कुछ अलग है। चीन ईरान का सबसे बड़ा तेल खरीदार है और कई रिपोर्टों के अनुसार युद्ध के बावजूद ईरान चीन को तेल की आपूर्ति जारी रखने का प्रयास कर रहा है। चीन अपनी “शैडो फ्लीट” यानी निजी और कम पहचान वाले टैंकरों के माध्यम से भी ईरानी तेल खरीदता रहा है। यही कारण है कि कई विश्लेषकों का मानना है कि ईरान चीन के जहाजों को पूरी तरह रोकने से बच रहा है क्योंकि चीन उसके लिए एक महत्त्वपूर्ण आर्थिक साझेदार है।रूस के सन्दर्भ में भी स्थिति जटिल है। रूस स्वयं ऊर्जा निर्यातक देश है और वह पश्चिमी प्रतिबन्धों के कारण चीन और एशियाई बाजारों की ओर अधिक झुकाव दिखा रहा है। ईरान और रूस दोनों पश्चिमी प्रतिबन्धों का सामना कर रहे हैं और दोनों के बीच ऊर्जा तथा सैन्य सहयोग बढ़ा है। इसलिए सम्भावना कम है कि ईरान रूस के तेल व्यापार को रोकने का प्रयास करेगा। ऐसा इस वजह से भी मुमकिन नहीं है क्योंकि दोनों मुल्क सीधे तौर पर तो नही परन्तु तकनीकी रूप से उसकी मदद निःसन्देह कर रहे हैं शायद यही कारण है ईरान अमेरिकी बेसों  पर सटीक हमले कर पा रहा।

इस पूरे संकट में एक महत्त्वपूर्ण प्रश्न यह भी उठ रहा है कि अमेरिका इस समुद्री मार्ग की पूरी तरह रक्षा क्यों नहीं कर पा रहा है। यह जानना बेहद महत्त्वपूर्ण है, इसके पीछे कई कारण हैंपहला कारण यह है कि होर्मुज जलडमरूमध्य बहुत संकीर्ण है और यहाँ समुद्री माइन्स, मिसाइल और ड्रोन हमलों का खतरा बहुत अधिक है। दूसरा कारण यह है कि ईरान के पास तटीय रक्षा प्रणाली, तेज़ नौकाएँ और मिसाइल प्रणालियाँ हैं जो अमेरिकी नौसेना के लिए लगातार चुनौती पैदा करती हैं। तीसरा कारण यह है कि युद्ध के फैलने का खतरा पूरे खाड़ी क्षेत्र को अस्थिर कर सकता है, इसलिए अमेरिका भी पूर्ण युद्ध से बचने की कोशिश कर रहा है।आर्थिक दृष्टि से इस युद्ध का प्रभाव बहुत व्यापक है। वैश्विक शेयर बाजारों में गिरावट आई है, तेल और गैस की कीमतों में तेजी आई है और कई देशों में महंगाई बढ़ने का खतरा पैदा हो गया है। विश्लेषकों के अनुसार यदि यह संकट लम्बे समय तक जारी रहता है तो वैश्विक अर्थव्यवस्था मन्दी की ओर भी जा सकती है।

होर्मुज जलडमरूमध्य केवल एक समुद्री मार्ग नहीं है बल्कि यह वैश्विक शक्ति सन्तुलन का प्रतीक बन चुका है। मध्यकालीन व्यापारिक इतिहास से लेकर आधुनिक ऊर्जा राजनीति तक इसकी भूमिका लगातार बढ़ती रही है। आज जब ईरान, अमेरिका और इज़राइल के बीच युद्ध इस क्षेत्र को अस्थिर बना रहा है, तब यह जलडमरूमध्य विश्व अर्थव्यवस्था और भू-राजनीति के लिए सबसे महत्त्वपूर्ण और संवेदनशील बिन्दु बन गया है। आने वाले महीनों में यह संकट किस दिशा में जाएगा, यह इस बात पर निर्भर करेगा कि क्या सैन्य टकराव जारी रहता है या कूटनीति के माध्यम से कोई स्थायी समाधान निकलता हैलेकिन इतना निश्चित है कि जब तक होर्मुज जलडमरूमध्य में स्थिरता नहीं लौटती, तब तक वैश्विक ऊर्जा बाजार और अन्तर्राष्ट्रीय व्यापार अनिश्चितता के दौर से गुजरते रहेंगे।

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Author: Bharat Sarathi

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