जयसिंह रावत

पिछले कुछ सप्ताहों में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा देशवासियों से की गई अपीलों—जैसे ईंधन की बचत, सार्वजनिक परिवहन का अधिक उपयोग, विदेश यात्राओं में संयम, सोने की खरीद टालने और अनावश्यक खर्चों से बचने—को सामान्य सरकारी सलाह मानकर अनदेखा नहीं किया जाना चाहिए। राजनीति में शब्द अक्सर संकेत होते हैं और शासन व्यवस्था में सार्वजनिक अपीलें कई बार आने वाले निर्णयों की प्रस्तावना बनती हैं। यदि इन संकेतों को वैश्विक परिस्थितियों, ऊर्जा संकट, युद्धों, बढ़ती महंगाई और भारत की आंतरिक आर्थिक चुनौतियों के साथ जोड़कर देखा जाए तो स्पष्ट दिखाई देता है कि देश एक कठिन आर्थिक दौर की तैयारी कर रहा है।
दुनिया इस समय असाधारण अस्थिरता से गुजर रही है। पश्चिम एशिया में बढ़ता तनाव, विशेषकर ईरान और इजराइल के बीच संघर्ष तथा होर्मुज जलडमरूमध्य को लेकर अनिश्चितता, केवल क्षेत्रीय संकट नहीं है। विश्व के तेल व्यापार का बड़ा हिस्सा इसी समुद्री मार्ग से गुजरता है। यदि यह मार्ग बाधित होता है तो तेल की कीमतों में अचानक भारी वृद्धि होना स्वाभाविक है। भारत जैसे देश, जो अपनी जरूरत का अधिकांश कच्चा तेल आयात करते हैं, सबसे अधिक प्रभावित होते हैं।
भारत ने पिछले कुछ वर्षों में अपनी अर्थव्यवस्था को अपेक्षाकृत स्थिर बनाए रखा है, लेकिन इसके पीछे सरकार द्वारा लगातार संतुलन साधने की कोशिश रही है। पेट्रोल और डीजल की वास्तविक अंतरराष्ट्रीय कीमतों का पूरा बोझ उपभोक्ताओं पर नहीं डाला गया। तेल विपणन कंपनियों ने भी नुकसान सहा। लेकिन यह स्थिति लंबे समय तक नहीं चल सकती। यदि वैश्विक संकट लंबा खिंचता है तो सरकार के सामने ईंधन की कीमतें बढ़ाने के अलावा कोई बड़ा विकल्प नहीं बचेगा। इसका सीधा प्रभाव परिवहन, कृषि, उद्योग और रोजमर्रा की वस्तुओं की कीमतों पर पड़ेगा।
महंगाई केवल बाजार में वस्तुओं के महंगे होने का नाम नहीं है। यह धीरे-धीरे आम आदमी की क्रय शक्ति को कमजोर करती है। वेतन उतनी तेजी से नहीं बढ़ते जितनी तेजी से खर्च बढ़ते हैं। मध्यम वर्ग, निम्न मध्यम वर्ग और गरीब परिवार सबसे पहले दबाव महसूस करते हैं। रसोई गैस, बिजली, स्कूल फीस, दवाइयां, किराया और यात्रा—सब कुछ महंगा होने लगता है। ऐसे समय में सरकारों को कई बार अलोकप्रिय निर्णय लेने पड़ते हैं।
प्रधानमंत्री द्वारा सोने की खरीद कम करने की अपील भी केवल सांकेतिक नहीं है। भारत में सोना केवल आभूषण नहीं, बल्कि सामाजिक सुरक्षा और निवेश का माध्यम माना जाता है लेकिन सोना बड़े पैमाने पर आयात किया जाता है, जिससे विदेशी मुद्रा पर दबाव बढ़ता है। यदि तेल और सोने दोनों का आयात महंगा होता है तो देश का व्यापार घाटा बढ़ सकता है। इससे रुपये पर दबाव आएगा और रुपया कमजोर होने पर आयात और महंगे हो जाएंगे। यह एक दुष्चक्र बन सकता है।
संभव है कि आने वाले समय में सरकार कुछ कठोर आर्थिक कदम उठाए। इनमें ईंधन पर सब्सिडी कम करना, सरकारी खर्चों में कटौती, कुछ योजनाओं की समीक्षा, करों में बदलाव, आयात नियंत्रण, सार्वजनिक उपक्रमों के विनिवेश में तेजी और सरकारी विभागों में मितव्ययिता जैसे कदम शामिल हो सकते हैं। यह भी संभव है कि सरकार सार्वजनिक परिवहन, इलेक्ट्रिक वाहनों और घरेलू उत्पादन को बढ़ावा देने के लिए नए नियम लागू करे।
लेकिन केवल सरकार ही कठिनाई में नहीं होगी। जनता को भी अपनी जीवनशैली बदलनी पड़ सकती है। पिछले वर्षों में उपभोग आधारित जीवनशैली तेजी से बढ़ी है। आसान ऋण, किस्तों पर खरीदारी और दिखावटी उपभोग ने समाज के बड़े हिस्से को प्रभावित किया है। यदि आर्थिक दबाव बढ़ता है तो परिवारों को खर्चों की प्राथमिकताएं तय करनी होंगी। अनावश्यक यात्राएं, विलासिता की वस्तुएं, अत्यधिक ईंधन उपयोग और दिखावे पर आधारित खर्च कम करने पड़ सकते हैं।
सबसे बड़ी चिंता यह है कि भारत की राजनीति अभी भी मुफ्त योजनाओं और लोकलुभावन घोषणाओं की प्रतिस्पर्धा में फंसी हुई है। चुनावों में मुफ्त बिजली, नकद सहायता, बेरोजगारी भत्ता और अनेक प्रकार की रियायतों की घोषणाएं लगातार बढ़ रही हैं। अल्पकाल में ये योजनाएं जनता को राहत देती हैं, लेकिन दीर्घकाल में सरकारी वित्तीय स्थिति पर भारी बोझ डालती हैं। राज्यों की आर्थिक हालत पहले से दबाव में है। कई राज्य भारी कर्ज के सहारे चल रहे हैं। यदि वैश्विक आर्थिक संकट गहराता है तो राज्यों की स्थिति और कठिन हो सकती है।
सरकार के सामने सबसे बड़ी चुनौती यह होगी कि वह विकास और मितव्ययिता के बीच संतुलन कैसे बनाए। केवल खर्च घटाने से अर्थव्यवस्था धीमी हो सकती है। इसलिए संभव है कि सरकार बुनियादी ढांचे पर खर्च जारी रखे ताकि रोजगार और आर्थिक गतिविधियां बनी रहें। सड़क, रेलवे, रक्षा, ऊर्जा और डिजिटल ढांचे में निवेश शायद जारी रहेगा, क्योंकि यही क्षेत्र लंबे समय में अर्थव्यवस्था को गति देते हैं।
कृषि क्षेत्र भी इस संकट से अछूता नहीं रहेगा। डीजल महंगा होने से सिंचाई और परिवहन लागत बढ़ेगी। उर्वरकों की कीमतें बढ़ सकती हैं। यदि मानसून कमजोर रहता है तो खाद्य महंगाई और बढ़ सकती है। इसका असर सीधे ग्रामीण भारत पर पड़ेगा। किसानों की आय और उपभोक्ताओं की थाली दोनों प्रभावित होंगी।
ऐसे समय में सामाजिक धैर्य और राष्ट्रीय अनुशासन की आवश्यकता होती है। इतिहास बताता है कि बड़े आर्थिक संकट केवल सरकारी फैसलों से नहीं, बल्कि जनता के सहयोग से संभाले जाते हैं। 1991 के आर्थिक संकट के समय भारत को सोना गिरवी रखना पड़ा था। आज स्थिति वैसी नहीं है, लेकिन वैश्विक अस्थिरता यह याद दिलाती है कि आर्थिक आत्मनिर्भरता केवल नारा नहीं बल्कि आवश्यकता है।
भारत की एक बड़ी ताकत उसका विशाल घरेलू बाजार, युवा जनसंख्या और मजबूत सेवा क्षेत्र है। यदि सरकार सही समय पर संतुलित निर्णय लेती है और जनता संयम दिखाती है तो यह संकट अवसर भी बन सकता है। घरेलू विनिर्माण, ऊर्जा आत्मनिर्भरता, सार्वजनिक परिवहन, वैकल्पिक ऊर्जा और स्थानीय उत्पादन को बढ़ावा देने का यही समय है।
फिर भी यह मान लेना भूल होगी कि आने वाले महीने सामान्य रहेंगे। महंगाई, ईंधन मूल्य वृद्धि, रोजगार की अनिश्चितता और सरकारी सख्ती का असर आम लोगों को महसूस हो सकता है। प्रधानमंत्री के हालिया संदेशों को इसी व्यापक संदर्भ में समझना चाहिए। वे केवल सलाह नहीं, बल्कि आने वाले कठिन समय की चेतावनी भी हो सकते हैं।
भारत एक ऐसे मोड़ पर खड़ा है जहां आर्थिक विवेक, राजनीतिक साहस और सामाजिक अनुशासन तीनों की परीक्षा होने वाली है। आने वाले समय में सरकार को कठोर फैसले लेने पड़ सकते हैं, लेकिन उतना ही महत्वपूर्ण यह भी होगा कि जनता इन परिस्थितियों को समझे और अल्पकालिक असुविधा के बदले दीर्घकालिक स्थिरता को महत्व दे। इतिहास में वही राष्ट्र कठिन समय से मजबूत होकर निकलते हैं जो संकट को समय रहते पहचान लेते हैं।








