गुरुग्राम सिविल अस्पताल: घोषणाओं का खेल, ज़मीन पर सन्नाटा — सतवंती नेहरा का सरकार पर तीखा हमला

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500 से 872 और फिर 400 बेड तक सिमटी योजना, करोड़ों के बजट के बावजूद निर्माण कार्य शुरू नहीं

गुरुग्राम, 20 मार्च 2026 – गुरुग्राम जैसे अंतरराष्ट्रीय शहर में आधुनिक सिविल अस्पताल का सपना अब भी अधूरा है। वर्षों से लगातार हो रही घोषणाओं, बदलते डिज़ाइनों और घटते-बढ़ते बजट के बीच यह परियोजना कागज़ों में ही सिमटकर रह गई है। इस मुद्दे पर कांग्रेस कार्यकर्ता और समाज सेविका सतवंती नेहरा ने सरकार की कार्यशैली पर गंभीर सवाल उठाए हैं।

सतवंती नेहरा ने कहा कि सरकार ने अस्पताल निर्माण को लेकर अब तक कम से कम पांच बार अपनी घोषणा बदली है। पहले 500 बेड के अस्पताल का वादा किया गया, जिसे बढ़ाकर 700 बेड किया गया। इसके बाद 2023-24 के बजट में इसे 750 बेड बताया गया और फिर 872 बेड के “मेगा प्रोजेक्ट” के रूप में पेश कर लगभग ₹990 करोड़ खर्च करने की योजना बनाई गई।

लेकिन इसके बाद भी स्थिति स्पष्ट नहीं रही। वर्ष 2024-25 में फिर से डिजाइन बदलते हुए योजना को 700 बेड तक सीमित कर दिया गया और अब 2026 में इसे घटाकर 400 बेड करने की चर्चा सामने आ रही है।

उन्होंने सवाल उठाया कि आखिर हर साल योजना में इतने बड़े बदलाव क्यों किए जा रहे हैं। क्या यह वास्तविक विकास है या सिर्फ आंकड़ों और घोषणाओं का खेल?

नेहरा ने कहा कि सरकार ने 2024 में ₹990 करोड़ का बजट मंजूर किया, टेंडर प्रक्रिया भी शुरू की गई और करीब ₹60 करोड़ की राशि जारी होने की बात भी सामने आई। इसके बावजूद जमीनी हकीकत यह है कि अस्पताल निर्माण को लेकर अब तक कोई ठोस काम दिखाई नहीं देता। न तो निर्माण कार्य शुरू हुआ है और न ही आम जनता को इस परियोजना का कोई लाभ मिल पाया है।

उन्होंने यह भी कहा कि गुरुग्राम की तेजी से बढ़ती आबादी और स्वास्थ्य सेवाओं पर बढ़ते दबाव के बावजूद सरकार इस महत्वपूर्ण परियोजना को गंभीरता से नहीं ले रही। वर्तमान में जिला नागरिक अस्पताल पर अत्यधिक बोझ है, जहां मरीजों को लंबी कतारों और सीमित सुविधाओं के बीच इलाज के लिए जूझना पड़ता है।

सतवंती नेहरा ने सरकार से मांग की कि अस्पताल परियोजना की स्पष्ट समयसीमा तय की जाए, बार-बार योजना बदलने की प्रवृत्ति पर रोक लगे और जल्द से जल्द निर्माण कार्य शुरू किया जाए, ताकि गुरुग्राम की जनता को बेहतर स्वास्थ्य सुविधाएं मिल सकें।

निष्कर्ष:
गुरुग्राम सिविल अस्पताल की यह कहानी विकास के दावों और जमीनी हकीकत के बीच के अंतर को उजागर करती है। अब देखना यह है कि सरकार इस परियोजना को कब तक कागज़ों से निकालकर धरातल पर उतार पाती है।

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Author: Bharat Sarathi

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