व्यंग्य : “हम ही हैं राष्ट्र, हमसे ही है राष्ट्र”

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डॉ. शैलेश शुक्ला

मैं बचपन से ही राष्ट्रसेवा करना चाहता था। जब दूसरे बच्चे डॉक्टर, इंजीनियर और वैज्ञानिक बनने का सपना देखते थे, तब मैं बंगला, लालबत्ती, सरकारी गाड़ी और पाँच सितारा बैठकों का सपना देखा करता था। मुझे शुरू से ही पता था कि राष्ट्र बहुत विशाल चीज़ है और इतने विशाल राष्ट्र की सेवा करने के लिए पहले स्वयं को विशाल बनाना आवश्यक है। इसलिए मैंने तय कर लिया था कि मैं राष्ट्र की सेवा सीधे नहीं करूँगा; पहले स्वयं की सेवा करूँगा—क्योंकि जब मैं ही सुखी नहीं रहूँगा, तो राष्ट्र को सुख कैसे दे पाऊँगा?

मैंने कठिन परिश्रम किया। दिन-रात पढ़ाई की। प्रतियोगी परीक्षा पास की। साक्षात्कार में इतनी मधुर आवाज़ में “राष्ट्रसेवा” बोला कि चयन करने वालों की आँखें भर आईं। उन्होंने सोचा—“क्या त्यागी युवक है!” और मैंने मन ही मन सोचा—“अब जीवन सफल हुआ।”

प्रशिक्षण के समय हमें सिखाया गया कि “आप राष्ट्र की रीढ़ हैं।” मैंने इस वाक्य को बहुत गंभीरता से लिया। फिर मैंने सोचा कि जब पूरी व्यवस्था मेरी पीठ पर टिकी है, तो थोड़ा भार व्यवस्था को भी उठाना चाहिए—जैसे मेरा घर, मेरी गाड़ी, मेरे फार्महाउस और मेरे निवेश।

पहली पोस्टिंग मिलते ही मुझे समझ आ गया कि राष्ट्रसेवा केवल फाइलों में नहीं, जमीनों में भी छिपी होती है। मैंने जल्दी ही यह ज्ञान प्राप्त कर लिया कि जहाँ आज खेत हैं, कल वहाँ बाईपास होगा; जहाँ आज गाँव है, कल वहाँ टाउनशिप होगी; और जहाँ आज किसान हल चला रहा है, वहाँ कल मेरी “निवेश संपत्ति” चमकेगी। राष्ट्र की प्रगति का मार्ग पहले से जान लेना ही असली प्रशासनिक दूरदृष्टि है।

मैं अकेला नहीं था। मेरे जैसे कई “समान विचारधारा वाले राष्ट्रसेवक” थे। हमने मिलकर जमीन खरीदी—बिल्कुल नियमों के अनुसार। फिर कुछ महीनों बाद संयोग से वहीं सड़क निकल आई, बाईपास बन गया, भूमि उपयोग बदल गया और खेत अचानक सोने की खान बन गए। लोग इसे भ्रष्टाचार कहते हैं, पर वे हमारी दूरदृष्टि नहीं समझते। जनता भविष्य नहीं देख पाती, इसलिए जनता है; और हम भविष्य पहले देख लेते हैं, इसलिए अधिकारी हैं।

राष्ट्रसेवा करते-करते मैंने यह भी सीखा कि सरकारी नियम बहुत सुंदर चीज़ हैं। वे जनता को नियंत्रित करने के लिए कठोर और अधिकारियों को सुविधा देने के लिए लचीले होते हैं। यात्रा भत्ता, मकान भत्ता, विशेष भत्ता, बैठक भत्ता—राष्ट्र ने मेरी सेवा के लिए इतने साधन दिए कि कभी-कभी भावुक होकर मेरी आँखें नम हो जाती थीं। मैं सोचता था—“हे राष्ट्र! तू कितना दयालु है।”

सरकारी यात्राएँ तो राष्ट्रसेवा का सबसे मधुर अध्याय थीं। सम्मेलन कहीं भी हो—पहाड़ों में, समुद्र किनारे या विदेश में—मैं राष्ट्रहित में तुरंत पहुँच जाता था। पाँच सितारा होटल में बैठकर राष्ट्र की समस्याओं पर चर्चा करता था। नाश्ते में विदेशी फल खाते हुए गरीबी उन्मूलन पर विचार करता था। वातानुकूलित सभागार में बैठकर किसानों की समस्याओं पर प्रस्तुति देता था। जनता को शायद यह विलासिता दिखती हो, पर वे नहीं जानते कि राष्ट्रसेवा कितनी कठिन होती है।

नेताओं से मधुर संबंध रखना भी प्रशासनिक कौशल का आवश्यक भाग है। मैंने हर दल के राजनेता से निकटता बनाई। सत्ता बदलती रही, पर मेरी मुस्कान स्थिर रही। मैंने निरंतर सीखा कि विचारधारा अस्थायी होती है, पर संपर्क स्थायी होते हैं। राजनेता खुश रहें, इसके लिए समय-समय पर उनकी प्रशंसा करना भी राष्ट्रहित में आवश्यक होता है। लोकतंत्र में समन्वय बहुत जरूरी है।

वरिष्ठ अधिकारियों को प्रसन्न रखना भी प्रशासनिक संस्कृति का महत्वपूर्ण अंग है। कोई भी व्यवस्था केवल नियमों से नहीं चलती, “सम्मान” से भी चलती है। इसलिए समय-समय पर उचित सम्मान पहुँचाना पड़ता था। आखिर वरिष्ठ भी राष्ट्रसेवा कर रहे थे। यदि उनका मन प्रसन्न रहेगा, तभी तो व्यवस्था सुचारु रूप से चलेगी।

कभी-कभी कुछ शरारती लोग शिकायत भी कर देते थे। कोई पत्रकार खबर छाप देता था, कोई कार्यकर्ता प्रश्न पूछ देता था। पर मैंने प्रशासनिक विज्ञान का सबसे शक्तिशाली सूत्र सीख लिया था—“जाँच शुरू होने से पहले पीड़ित बन जाओ।”

जैसे ही कोई मामला उठता, मैं तुरंत कहता—“मुझे मेरी जाति के कारण निशाना बनाया जा रहा है।” कभी कहता—“ईमानदार अधिकारियों को परेशान किया जा रहा है।” और कभी कहता—“मैंने बड़े लोगों के खिलाफ कार्रवाई की थी, इसलिए यह षड्यंत्र हो रहा है।”

यह उपाय अत्यंत प्रभावी था। लोग तुरंत दो भागों में बँट जाते—कुछ मेरे समर्थन में आ जाते, कुछ विरोध में। और इसी बहस में असली मुद्दा कहीं खो जाता। यही प्रशासनिक योग है—मुद्दे को भावनाओं में विलीन कर देना।

मैंने अपने पूरे कार्यकाल में राष्ट्र की हर चीज़ को अपना समझा। सरकारी बंगला मेरा था, सरकारी गाड़ी मेरी थी, सरकारी कर्मचारी मेरे थे। यहाँ तक कि सड़क पर लगा पेड़ भी मुझे अपना लगता था। आखिर मैं राष्ट्रसेवक था। और जब “मैं ही राष्ट्र” हूँ, तो राष्ट्र की संपत्ति और मेरी संपत्ति में अंतर कैसा?

धीरे-धीरे मैंने इतना अर्जित कर लिया कि अब सात पीढ़ियाँ भी आराम से राष्ट्रसेवा कर सकती हैं। खेत, प्लॉट, फार्महाउस, फ्लैट, निवेश, सोना—सब कुछ राष्ट्र की कृपा से मिला। जनता सोचती रही कि मैं उनकी सेवा कर रहा हूँ, और मैं वास्तव में अपनी सेवा को ही राष्ट्रसेवा का रूप देता रहा।

सबसे सुंदर बात यह रही कि समाज मुझे आज भी “ईमानदार अधिकारी” कहता है, क्योंकि मैंने कभी सीधे रिश्वत नहीं ली। मैंने केवल अवसर लिए, जानकारी का उपयोग किया, नियमों को समझा और संबंधों को निभाया। यह भ्रष्टाचार नहीं, “प्रशासनिक बुद्धिमत्ता” है।

आज जब मैं अपने आलीशान ड्राइंग रूम में बैठकर राष्ट्र की चिंता करता हूँ, तो गर्व से भर उठता हूँ। मेरे बच्चे विदेशों में पढ़ रहे हैं, पत्नी सामाजिक संस्थाओं की संरक्षिका हैं और मैं सेवानिवृत्ति के बाद भी विभिन्न समितियों में राष्ट्र को दिशा दे रहा हूँ।

कभी-कभी कोई आदर्शवादी युवक पूछ बैठता है—
“सर, क्या सचमुच व्यवस्था इतनी सड़ी हुई है?”

तब मैं मुस्कुराकर कहता हूँ—
“बेटा, व्यवस्था नहीं सड़ी… व्यवस्था तो बहुत फलदायी है। बस फल हमेशा वही खाते हैं, जो पेड़ लगाने से पहले जमीन अपने नाम करा लेते हैं।”

और फिर मैं राष्ट्रध्वज की ओर देखकर गर्व से कहता हूँ—

“हम ही हैं राष्ट्र… हमसे ही है राष्ट्र।”

Bharat Sarathi
Author: Bharat Sarathi

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