– सक्रियता की जीत या आत्ममंथन का समय?

गुरुग्राम। हरियाणा में राज्यसभा की एक सीट पर कांग्रेस की जीत के बाद गुरुग्राम में जिला शहरी अध्यक्ष पंकज डावर के नेतृत्व में कार्यकर्ताओं ने जश्न मनाया। पार्टी कार्यालय में मिठाइयां बांटी गईं और कार्यकर्ताओं ने नाच-गाकर खुशी जाहिर की। पंकज डावर और महिला प्रदेश अध्यक्ष पर्ल चौधरी ने इसे कांग्रेस की सक्रियता की जीत बताते हुए भाजपा पर वोट चोरी की कोशिश का आरोप लगाया।
पंकज डावर ने कहा कि कांग्रेस की एकजुटता और सक्रियता ने भाजपा के मंसूबों को नाकाम कर दिया। उन्होंने राज्यसभा के लिए निर्वाचित हुए कर्मवीर बौद्ध को बधाई देते हुए दावा किया कि प्रदेश में कांग्रेस मजबूत स्थिति में है और आगामी विधानसभा चुनाव में भाजपा को सत्ता से बाहर कर देगी।
वहीं, पर्ल चौधरी ने भाजपा सरकार पर हमला बोलते हुए कहा कि 11 साल के शासन के बाद भी भाजपा के पास गिनाने के लिए ठोस उपलब्धियां नहीं हैं। उन्होंने आरोप लगाया कि सरकार ने विकास के बजाय केवल अपने हित साधे हैं और जनता को मूलभूत सुविधाओं से वंचित रखा है।
हालांकि, इस जश्न के बीच कई गंभीर सवाल भी उठ खड़े हुए हैं। राजनीतिक हलकों में चर्चा है कि राज्यसभा चुनाव में कांग्रेस के कुछ विधायकों द्वारा क्रॉस वोटिंग या समर्थन न देने की स्थिति सामने आई, जबकि कुछ वोट विवादित भी बताए जा रहे हैं। ऐसे में यह सवाल उठना लाजिमी है कि क्या यह परिणाम वास्तव में जश्न मनाने योग्य है या संगठन के भीतर आत्ममंथन का समय है।
यह भी उल्लेखनीय है कि वरिष्ठ कांग्रेस नेतृत्व, विशेषकर पूर्व मुख्यमंत्री भूपेंद्र सिंह हुड्डा और उनकी टीम द्वारा इस जीत पर कोई बड़ा सार्वजनिक जश्न नहीं मनाया गया। इसके उलट गुरुग्राम में स्थानीय स्तर पर हुआ उत्सव कई राजनीतिक विश्लेषकों को असंगत प्रतीत हो रहा है।
गुरुग्राम में कांग्रेस संगठन की स्थिति पर भी सवाल उठ रहे हैं। पार्टी के कई पुराने कार्यकर्ता और नेता या तो निष्क्रिय हैं या अन्य दलों की ओर रुख कर चुके हैं। कुछ ऐसे चेहरे भी हैं जो स्वयं को कांग्रेसी बताते हुए अन्य राजनीतिक दलों से समीकरण बनाए रखते हैं। ऐसे हालात में संगठन की मजबूती पर पुनर्विचार आवश्यक माना जा रहा है।
सबसे अहम सवाल यह भी है कि जिस गुरुग्राम शहर में बुनियादी समस्याएं—जैसे अव्यवस्थित ट्रैफिक, अधूरी इंफ्रास्ट्रक्चर परियोजनाएं, स्वास्थ्य सुविधाओं की कमी और प्रशासनिक स्तर पर भ्रष्टाचार के आरोप—लगातार चर्चा में हैं, उन मुद्दों पर कांग्रेस की सक्रियता अपेक्षित स्तर पर क्यों नहीं दिखती?
राजनीतिक जानकारों का मानना है कि यदि कांग्रेस को वास्तव में जनता का समर्थन हासिल करना है, तो उसे केवल चुनावी जीत के जश्न तक सीमित रहने के बजाय जनहित के मुद्दों पर मजबूती से लड़ाई लड़नी होगी। कार्यालयों में जश्न मनाने के बजाय सड़कों पर जनता के मुद्दों के लिए संघर्ष ही पार्टी को वास्तविक मजबूती दिला सकता है।
इस पूरे घटनाक्रम ने एक बार फिर यह बहस छेड़ दी है कि क्या कांग्रेस के लिए यह समय जश्न का है या आत्मविश्लेषण का—ताकि भविष्य की राजनीति के लिए मजबूत आधार तैयार किया जा सके।




