रमेश सारस्वत

आज के आधुनिक दौर में हम एक ऐसे मुकाम पर खड़े हैं जहाँ तकनीक हमारे अस्तित्व का अभिन्न हिस्सा बन चुकी है। विशेषकर युवाओं के लिए स्मार्टफोन अब केवल संचार का साधन नहीं बल्कि उनकी दुनिया का केंद्र बन गया है। सोशल मीडिया के इस बढ़ते मायाजाल ने जितनी तेजी से दुनिया को जोड़ने का दावा किया, उतनी ही खामोशी से इसने हमारी युवा पीढ़ी को उनकी किताबों और पढ़ाई की मेज से दूर कर दिया है। आज स्थिति यह है कि एक छात्र के हाथ में किताब कम और मोबाइल फोन ज्यादा नजर आता है। इंस्टाग्राम की रील, फेसबुक के नोटिफिकेशन और स्नैपचैट की स्ट्रीक ने छात्रों की उस एकाग्रता को निगल लिया है जो कभी उनकी सफलता की नींव हुआ करती थी।
सोशल मीडिया के अत्यधिक उपयोग का सबसे भयावह पहलू यह है कि इसने युवाओं की सोचने-समझने और गहराई से विश्लेषण करने की क्षमता को पंगु बना दिया है। जब कोई छात्र घंटों तक छोटे-छोटे वीडियो क्लिप्स देखता है, तो उसका मस्तिष्क थोड़े समय के मनोरंजन का आदी हो जाता है। इसका सीधा परिणाम यह होता है कि जब वह पढ़ाई के लिए बैठता है और उसे जटिल गणितीय समीकरण या इतिहास के लंबे अध्याय पढ़ने होते हैं तो उसका मस्तिष्क उस मानसिक श्रम को स्वीकार करने से मना कर देता है। यही कारण है कि आज परीक्षाओं के परिणाम और छात्रों के ज्ञान का वास्तविक स्तर लगातार गिरता जा रहा है। वे कठिन परिश्रम के बजाय शॉर्टकट की तलाश में रहते हैं|
इतना ही नहीं, सोशल मीडिया के इस दिखावे वाले युग ने भाषा और व्याकरण के स्तर को भी रसातल में पहुँचा दिया है। चैटिंग के दौरान संक्षिप्त शब्दों और ‘स्लैंग’ का बढ़ता प्रयोग अब छात्रों की स्कूल की कॉपियों और उत्तर पुस्तिकाओं में भी साफ दिखने लगा है। वे औपचारिक लेखन की कला भूलते जा रहे हैं। रात-रात भर स्क्रीन के सामने जागने के कारण उनकी जैविक घड़ी बिगड़ चुकी है जिससे कक्षा में पढ़ते समय वे मानसिक रूप से अनुपस्थित रहते हैं। नींद की कमी और स्क्रीन से निकलने वाली नीली रोशनी न केवल उनकी आंखों को नुकसान पहुँचा रही है, बल्कि उनके मानसिक स्वास्थ्य को भी अस्थिर कर रही है। जब एक छात्र अपनी तुलना सोशल मीडिया पर दूसरों की काल्पनिक और सजावटी जिंदगी से करता है तो उसमें हीन भावना पैदा होती है, जो उसे शिक्षा के प्रति और भी उदासीन बना देती है।
अंततः हमें यह समझना होगा कि तकनीक का विरोध समाधान नहीं है, बल्कि उसका विवेकपूर्ण उपयोग ही एकमात्र रास्ता है। यदि समय रहते अभिभावकों और शैक्षणिक संस्थानों ने युवाओं की इस डिजिटल लत पर लगाम नहीं लगाई, तो वह दिन दूर नहीं जब हमारी डिग्रीधारी युवा पीढ़ी के पास कागज के टुकड़े तो होंगे लेकिन वास्तविक ज्ञान और कौशल का अभाव होगा। यह केवल किसी एक छात्र या परिवार की समस्या नहीं है बल्कि एक राष्ट्र के रूप में हमारे बौद्धिक पतन का संकेत है। शिक्षा के गिरते स्तर को बचाने के लिए जरूरी है कि हम युवाओं को फिर से कागजों की सुगंध और पुस्तकालयों की शांति की ओर लौटने के लिए प्रेरित करें ताकि वे ‘डिजिटल दुनिया’ के गुलाम बनने के बजाय उसके स्वामी बन सके.









