कमलेश पांडेय

भारत-चीन के कभी नरम, कभी गरम सम्बन्धों से अक्सर प्रभावित होने वाले भारतीय उपमहाद्वीप के देशों के लिए एक अच्छी खबर है जो उद्यमियों को सुकून देने वाली है। वह यह कि भारत सरकार ने ‘भूल’ सुधार करते हुए मार्च 2026 में पड़ोसी देशों यथा चीन, पाकिस्तान, बांग्लादेश, नेपाल, भूटान, म्यांमार, श्रीलंका, मालदीव और अफगानिस्तान के लिए एफडीआई (FDI) नियमों में ढील दी है। इस प्रकार पड़ोसियों को एफडीआई के नियमों में मिली ढील के आर्थिक व कूटनीतिक मायने स्पष्ट हैं। उम्मीद है कि भरोसेमंद आर्थिक रिश्ते पुनः गुलजार होंगे।
उल्लेखनीय है कि यह बदलाव 2020 के प्रेस नोट 3 के कड़े प्रावधानों में संशोधन के रूप में आया जिसमें पहले इन देशों से सभी निवेशों के लिए सरकारी मंजूरी जरूरी थी।
ऐसे में दो टूक सवाल है कि आखिर एफडीआई में मुख्य रूप से क्या-क्या बदलाव हुए हैं? तो यह जान लिजिए कि अब 10% तक के गैर-नियंत्रणकारी शेयरहोल्डिंग वाले निवेश ऑटोमैटिक रूट से हो सकेंगे बशर्ते सेक्टरल कैप्स का पालन हो। गौरतलब है कि इससे पहले सभी एफडीआई के लिए पूर्वानुमति अनिवार्य थी।
बताया जाता है कि सरकार का यह नया कदम विभिन्न सेक्टर्स में निवेश को आसान बनाता है। इसलिए पूरक सवाल यह है कि आखिर इस ढील देने के कारण क्या हैं?क्या आतंकवाद, उग्रवाद और पड़ोसियों से विघटनकारियों को शह देने-दिलाने की हरकतें कम हो गईं, या फिर ईरान-इजरायल युद्ध से पड़ोसियों से सदैव अच्छे रिश्ते बनाये रखने की सीख मिली! शायद दोनों बात हो या कोई भी नहीं हो! वैसे तो अर्थ कूटनीति के जानकारों ने बताया है कि सरकार ने व्यापार विस्तार को बढ़ावा देने और व्यवसायिक लेन-देन को सुगम बनाने के उद्देश्य से यह कदम उठाया है।
ऐसा इसलिए कि चीन से सम्बन्धों में सुधार आया है और पाकिस्तान-,बंगलादेश की हेकड़ी भी टूट चुकी है। वहीं अफगानिस्तान से भरोसा बहाल हुआ है।
उल्लेखनीय है कि 2020 के गलवान संघर्ष के बाद लगाए गए प्रतिबंधों से कई प्रोजेक्ट्स अटक गए थे, जिसे ठीक करने का यह समयानुकूल प्रयास है। इससे विदेशी निवेश में वृद्धि की उम्मीद है। चूंकि प्रभावित देश में चीन, पाकिस्तान, बांग्लादेश, भूटान, नेपाल, म्यांमार, अफगानिस्तान आदि शामिल थे, इसलिए यह दूरदर्शिता भरा कदम है। यह नीतिगत संशोधन प्रधानमंत्री मोदी की कैबिनेट बैठक में मंजूर हुआ।
दरअसल, नए एफडीआई के नियमों में भारत सरकार ने 2020 के प्रेस नोट 3 के तहत पड़ोसी देशों यानी चीन, पाकिस्तान आदि से आने वाले निवेशों के लिए महत्वपूर्ण संशोधन किए हैं। अब 10% तक के गैर-नियंत्रणकारी निवेश ऑटोमैटिक रूट से स्वीकृत हो सकेंगे। यह बदलाव मार्च 2026 में कैबिनेट द्वारा मंजूर हुआ। अब 10% स्टेक पर ऑटोमैटिक अप्रूवल: इन देशों से 10% तक नॉन-कंट्रोलिंग स्टेक (शेयरहोल्डिंग) अब बिना सरकारी मंजूरी के अनुमत है।
इसके लिए समयबद्ध मंजूरी मिलेगी। इससे महत्वपूर्ण क्षेत्रों (स्टार्टअप्स, डीप टेक, मैन्युफैक्चरिंग) में निवेश प्रस्तावों पर अधिकतम 60 दिनों में निर्णय होगा। बेनेफिशियल ओनर की परिभाषा के मुताबिक, निवेशकों के वास्तविक मालिकों की पहचान के स्पष्ट मानदंड जोड़े गए। साथ ही प्रभावित देश और सेक्टर भी स्पष्ट कर दिए गए। देश में चीन, बांग्लादेश, पाकिस्तान, भूटान, नेपाल, म्यांमार, अफगानिस्तान आदि शामिल हैं। इससे फायदा यह होगा कि निवेश प्रक्रिया तेज होगी, व्यापार को बढ़ावा मिलेगा और कंप्लायंस बोझ कम होगा। बता दें कि पहले सभी एफडीआई पर पूर्वानुमति जरूरी थी।
समझा जाता है कि इन एफडीआई नियमों में ढील से भारत को विदेशी निवेश में वृद्धि, नई तकनीकों तक पहुंच और वैश्विक सप्लाई चेन में एकीकरण जैसे आर्थिक फायदे होंगे। यह आत्मनिर्भर भारत को मजबूत करेगा और समग्र आर्थिक विकास को गति देगा। सरकार का अनुमान है कि इससे घरेलू पूंजी पूरक बनेगी। इसके निम्नलिखित प्रमुख आर्थिक लाभ होंगे।
पहला, एफडीआई प्रवाह में वृद्धि: इलेक्ट्रॉनिक्स, ऑटोमोबाइल, रिन्यूएबल एनर्जी जैसे क्षेत्रों में पड़ोसी देशों से निवेश बढ़ेगा, जो अर्थव्यवस्था को बूस्ट करेगा।
दूसरा, घरेलू मूल्य संवर्धन और विस्तार: नई तकनीकें मिलेंगी, भारतीय फर्में बढ़ेंगी और मैन्युफैक्चरिंग मजबूत होगी।
तीसरा, व्यापार घाटा कम: चीन जैसे देशों से आयात के बजाय निवेश से व्यापार संतुलन सुधरेगा।
चौथा, दीर्घकालिक प्रभाव: निवेश आकर्षण: ईज ऑफ डूइंग बिजनेस बढ़ेगी, 8.8 लाख करोड़ की अटकी परियोजनाओं को गति मिलेगी।
पांचवां, राष्ट्रीय सुरक्षा संरक्षित: 10% तक सीमित रखते हुए रणनीतिक क्षेत्रों पर निगरानी बरकरार रहेगी।
उम्मीद है कि यह बदलाव भारत को निवेश और मैन्युफैक्चरिंग हब बनाने में मदद करेगा। बताते चलें कि भाजपा के ही पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी बाजपेयी ने कहा था कि हम इतिहास बदल सकते हैं, लेकिन भूगोल नहीं! हालांकि मेरा अनुभव बताता है कि इतिहास और भूगोल सदैव नायक बदलते आये हैं और लोकतांत्रिक नायकों से ज्यादा उम्मीदें बेमानी होती हैं, क्योंकि उनकी सत्ता शक्ति से नहीं, बल्कि खलनीति आधारित बहुमत से बदलती हैं, इसलिए मूल समस्या जस की तस बनी रहती है और उनमें आंशिक बदलाव दृष्टिगोचर होता है। खैर, राष्ट्रहित और जनहित के सभी बदलाव स्वागत योग्य हैं।








