आखिर सेवा तीर्थ से उपजते सियासी सवालों के जवाब कब तक मिलेंगे?

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कमलेश पांडेय

कहते हैं कि शब्द ब्रह्म है और हर शब्द अपने मंत्रमय, भावमय अस्तित्व से आकार ग्रहण करते हुए देर-सबेर साकार होता है। इसी दृष्टिकोण से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने ‘नाम परिवर्तन’ के माध्यम से जनमानस की सोच में बदलाव की जो मुहिम चलाई है, वह सुसंस्कृत भारत के निमित्त ‘नाम/विचार परिवर्तन यात्रा’ के रूप में निरंतर जारी है।

इसी कड़ी में ‘गवर्नमेंट ऑफ भारत’ अपने ‘लोककल्याण मार्ग’ (पूर्व सेवन रेस कोर्स) और ‘कर्तव्य पथ’ (पूर्व राजपथ) से आगे बढ़ते हुए अब ‘सेवा तीर्थ’ (प्रधानमंत्री कार्यालय) तक के वैचारिक सफर को पूर्ण करने की दिशा में अग्रसर है।

पहले नया संसद भवन और अब कर्तव्य भवन-1 एवं 2—ये परिवर्तन उसी क्रम की कड़ियाँ हैं। अन्य बदलाव भी प्रक्रियाधीन हैं। नाम और भवन परिवर्तन के साथ भाव परिवर्तन की यह यात्रा गतिमान है। वास्तव में यह नया बदलाव ‘नए भारत’ की संकल्पना का एक महत्वपूर्ण मील का पत्थर है। बीते एक दशक में कई ऐसे निर्णायक पड़ाव पार किए गए हैं, जिन्होंने शासन की दिशा और प्रतीकों को बदलने का प्रयास किया है।

‘अमृत भारत’ और ‘विकसित भारत’ की अवधारणा के साथ यह नाम, विचार और भवन परिवर्तन यात्रा राजनीतिक और प्रशासनिक दृष्टि से भी महत्वपूर्ण है—जैसे योजना आयोग के स्थान पर नीति आयोग की स्थापना। विपक्ष इस सोच की आलोचना करता रहा है, किंतु मीडिया—चौथे स्तंभ—के नाते यह प्रश्न उठाना स्वाभाविक है कि इन परिवर्तनों के व्यापक जनपक्षीय आयाम क्या हैं और आगे की रूपरेखा क्या होगी।

प्रधानमंत्री कार्यालय अब औपनिवेशिक दौर की साउथ ब्लॉक इमारत से स्थानांतरित होकर सेवा तीर्थ परिसर में स्थापित हो चुका है। उद्घाटन के अवसर पर प्रधानमंत्री ने कहा कि “सेवा परमो धर्म की भावना ही नए सेवा तीर्थ परिसर की आत्मा है। यह केवल भवन नहीं, बल्कि सेवा और समर्पण के संकल्प का प्रतीक है। शासन का केंद्र अब नागरिक हैं और यहां लिया गया हर निर्णय 140 करोड़ देशवासियों के जीवन को बेहतर बनाने के उद्देश्य से होना चाहिए।”

उन्होंने यह भी कहा कि नॉर्थ और साउथ ब्लॉक जैसी इमारतें ब्रिटिश हुकूमत और गुलामी का प्रतीक थीं, और उस मानसिकता से बाहर निकलना आवश्यक था। वर्ष 2014 को उन्होंने इस मानसिकता से मुक्ति के संकल्प का वर्ष बताया।

ऐसे में स्वाभाविक रूप से कई प्रश्न उठते हैं। यदि औपनिवेशिक प्रतीकों से मुक्ति का अभियान जारी है, तो उसकी समय-सीमा क्या है? किन-किन प्रतीकों को बदला जाएगा और किस मानदंड पर? क्या यह प्रक्रिया केवल स्थापत्य और नाम परिवर्तन तक सीमित रहेगी या विचार और नीतियों के स्तर पर भी व्यापक पुनर्रचना होगी?

इतिहास साक्षी है कि भारत ने इस्लामिक आक्रमणों और औपनिवेशिक शासन—दोनों कालखंडों का अनुभव किया है। ऐसे में प्रतीकों के चयन और परिवर्तन को लेकर भी विमर्श स्वाभाविक है। उदाहरण के तौर पर, लाल किला—जहां से प्रत्येक वर्ष स्वतंत्रता दिवस पर प्रधानमंत्री राष्ट्रीय ध्वज फहराते हैं—भी इतिहास का एक महत्वपूर्ण प्रतीक है। क्या भविष्य में ऐसे प्रतीकों को लेकर भी कोई नई दृष्टि सामने आएगी? यह जानने की जिज्ञासा बनी हुई है।

यह निर्विवाद है कि अयोध्या में राम मंदिर का निर्माण, नया संसद भवन, कर्तव्य भवन-1 और 2 तथा सेवा तीर्थ—इन सबने एक नई वैचारिक दिशा की शुरुआत की है। किंतु यह प्रक्रिया कहां तक और कब तक जारी रहेगी, इसे लेकर समाज के विभिन्न वर्गों में उत्सुकता बनी हुई है।

प्रधानमंत्री ने सेवा तीर्थ के उद्घाटन के बाद महिलाओं, किसानों, युवाओं और कमजोर वर्गों से संबंधित कई महत्वपूर्ण फाइलों पर हस्ताक्षर किए। इनमें पीएम राहत योजना के तहत दुर्घटना पीड़ितों को 1.5 लाख रुपये तक कैशलेस इलाज की सुविधा, ‘लखपति दीदी’ लक्ष्य को दोगुना कर 6 करोड़ करना, कृषि अवसंरचना निधि को बढ़ाकर 2 लाख करोड़ रुपये करना तथा स्टार्टअप इंडिया फंड ऑफ फंड्स 2.0 को मंजूरी देना शामिल है।

कर्तव्य भवन-1 और 2 में वित्त, रक्षा, स्वास्थ्य, शिक्षा, कृषि, कानून, सूचना एवं प्रसारण, संस्कृति, रसायन एवं उर्वरक, जनजातीय कार्य और कॉरपोरेट कार्य जैसे मंत्रालयों को एकीकृत करने से प्रशासनिक समन्वय और निर्णय-प्रक्रिया में गति आने की बात कही जा रही है।

फिर भी आलोचकों का एक वर्ग आशंका व्यक्त करता है कि प्रतीकों के परिवर्तन के साथ सामाजिक-राजनीतिक समीकरण भी नए रूप में आकार ले सकते हैं। आरक्षण, सामाजिक न्याय और पहचान की राजनीति जैसे मुद्दों पर भविष्य की दिशा क्या होगी—यह भी विमर्श का विषय है।

अंततः प्रश्न यही है कि क्या सेवा तीर्थ केवल एक प्रशासनिक पुनर्संरचना है, या यह व्यापक वैचारिक परिवर्तन का संकेत? क्या यह बदलाव स्थायी नीतिगत सुधारों में परिणत होगा?

देशवासी इन सवालों के स्पष्ट और समयबद्ध उत्तर चाहते हैं—क्योंकि प्रतीक बदलने के साथ-साथ नीतियों और मानसिकताओं का परिवर्तन ही किसी भी राष्ट्र के पुनर्जागरण की वास्तविक कसौटी होता है।

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Author: Bharat Sarathi

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