प्रमोद दीक्षित ‘मलय’

धर्मधुरी पुण्यभूमि भारत व्रत, पर्व, उपवास और आध्यात्मिक साधना की सजीव परंपराओं से आलोकित रही है। यहां का उत्सवधर्मी समाज केवल उल्लास का प्रतीक नहीं, बल्कि जीवन की संतुलित दृष्टि—भौतिक उन्नति और आध्यात्मिक साधना—का द्योतक है। सनातन परंपरा में व्रत और उपवास आत्मशुद्धि, मनोनिग्रह तथा मोक्षमार्ग की ओर अग्रसर होने के साधन माने गए हैं।
उपासना, जप-तप और जागरण के माध्यम से साधक आत्मिक उत्कर्ष की ओर बढ़ता है। महाशिवरात्रि ऐसा ही पावन अवसर है, जब व्यक्ति अपने भीतर के ‘शिवत्व’ को जागृत करने का प्रयास करता है। ‘शिवो भूत्वा, शिवं यजेत्’ की भावना के अनुरूप साधक स्वयं को कल्याणकारी भाव से भरकर भगवान शिव की आराधना करता है। शिव केवल देवता नहीं, बल्कि कल्याण, करुणा और समत्व के प्रतीक हैं।
तिथि, विधान और आध्यात्मिक महत्व
महाशिवरात्रि फाल्गुन मास के कृष्ण पक्ष की त्रयोदशी-चतुर्दशी को मनाई जाती है। दिन में शिवलिंग का अभिषेक और रात्रि में कीर्तन, ध्यान-साधना तथा जागरण का विशेष महत्व है। शास्त्रों में इस व्रत को अत्यंत फलदायी बताया गया है। नित्य शिवरात्रि, मास शिवरात्रि और महाशिवरात्रि—इन विविध रूपों का उल्लेख ग्रंथों में मिलता है। ज्योतिष मान्यता के अनुसार चतुर्दशी तिथि के अधिपति स्वयं भगवान शिव माने गए हैं।
स्कंद पुराण के अनुसार इस दिन ‘ॐ नमः शिवाय’ मंत्र-जाप और उपवास करने से जन्म-मरण के बंधनों से मुक्ति मिलती है। यह पर्व अज्ञान पर ज्ञान की प्रतिष्ठा और आत्मचेतना के जागरण का प्रतीक है।
पौराणिक प्रसंग और लोकमान्यता
मान्यता है कि इसी दिन भगवान शिव का विवाह माता पार्वती से हुआ था। अतः दाम्पत्य जीवन में सुख-शांति और समरसता की कामना से भी यह व्रत किया जाता है।
एक अन्य कथा के अनुसार देवताओं और दैत्यों द्वारा किए गए समुद्र मंथन से निकले कालकूट विष को जब कोई धारण करने को तैयार न हुआ, तब भगवान शिव ने उसे अपने कंठ में धारण कर समस्त सृष्टि की रक्षा की। इसी कारण वे नीलकंठ कहलाए और वह रात्रि ‘शिवरात्रि’ के रूप में विख्यात हुई।
कहा जाता है कि विष की ज्वाला शांत करने हेतु शिव उत्तर प्रदेश के कालिंजर पर्वत पर विराजमान हुए। वहां आज भी शिवलिंग से जलस्राव की मान्यता लोकविश्वास का केंद्र है।
एक अन्य प्रसंग में ब्रह्मा और विष्णु के मध्य श्रेष्ठता विवाद को समाप्त करने हेतु अनंत अग्निस्तंभ प्रकट हुआ। जब दोनों उसके आदि-अंत को न खोज सके, तब वह शिवलिंग रूप में प्रकट होकर शिव महादेव के रूप में प्रतिष्ठित हुआ—जो अनंत और सर्वव्यापी सत्ता का प्रतीक है।
द्वादश ज्योतिर्लिंग : शिव की अखंड उपस्थिति
भगवान शिव द्वादश ज्योतिर्लिंगों के रूप में संपूर्ण भारतवर्ष में पूजित हैं—

- सोमनाथ मंदिर (गुजरात)
- मल्लिकार्जुन ज्योतिर्लिंग (श्रीशैलम, आंध्र प्रदेश)
- महाकालेश्वर मंदिर (उज्जैन, मध्य प्रदेश)
- ओंकारेश्वर मंदिर (मध्य प्रदेश)
- केदारनाथ मंदिर (उत्तराखंड)
- भीमाशंकर मंदिर (महाराष्ट्र)
- काशी विश्वनाथ मंदिर (उत्तर प्रदेश)
- त्र्यंबकेश्वर मंदिर (महाराष्ट्र)
- बैद्यनाथ धाम (झारखंड)
- नागेश्वर ज्योतिर्लिंग (गुजरात)
- रामेश्वरम मंदिर (तमिलनाडु)
- घृष्णेश्वर मंदिर (महाराष्ट्र)
ये ज्योतिर्लिंग शिव की सर्वव्यापकता और लोककल्याणकारी स्वरूप के प्रतीक हैं।
निष्कर्ष
महाशिवरात्रि केवल एक धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि आत्मशोधन और विश्वकल्याण की भावना को पुष्ट करने वाला पर्व है। यह हमें संयम, साधना, करुणा और समत्व का संदेश देता है। इस पावन अवसर पर शिव पूजन, अभिषेक, जप और व्रत के माध्यम से हम अपने भीतर के शिवत्व को जागृत कर जीवन को शांत, स्थिर और मंगलमय बनाने का संकल्प लें।








