झूठी आत्मप्रशंसा और सच्ची प्रशंसा का सामाजिक प्रभाव

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“आत्मप्रचार से नहीं, आचरण से बनती है पहचान।”

“चापलूसी रिश्ते बनाती नहीं, केवल स्वार्थ निभाती है।”

– सुरेश गोयल ‘धूप वाला’

मानव स्वभाव अत्यंत विविधतापूर्ण है। कोई व्यक्ति विनम्रता और सादगी को अपना आभूषण बनाता है, तो कोई अपनी ही बनाई हुई छवि के दर्पण में स्वयं को निहारता रहता है। समाज में ऐसे लोगों की कमी नहीं जो अपनी वास्तविक क्षमता से कहीं अधिक स्वयं का बखान करते हैं, उपलब्धियों को बढ़ा-चढ़ाकर प्रस्तुत करते हैं और स्वयं को सर्वश्रेष्ठ सिद्ध करने में ऊर्जा खपा देते हैं। उन्हें भ्रम होता है कि शब्दों के शोर से सम्मान मिल जाएगा, जबकि सम्मान का आधार सदैव कर्म होते हैं।

झूठी आत्मप्रशंसा का सबसे बड़ा दुष्परिणाम यह है कि व्यक्ति वास्तविक आत्ममंथन से दूर हो जाता है। वह अपनी कमियों को स्वीकारने के बजाय उन्हें छिपाने में कुशल हो जाता है। प्रारंभ में कुछ लोग उसके दावों से प्रभावित हो सकते हैं, किंतु समय सत्य का सबसे बड़ा परीक्षक है। जब कथनी और करनी में अंतर उजागर होता है, तो विश्वसनीयता दरकने लगती है। एक बार विश्वास टूट जाए तो उसे पुनः स्थापित करना अत्यंत कठिन होता है।

ऐसा व्यक्ति धीरे-धीरे आत्मविकास की प्रक्रिया से भी कट जाता है। स्वयं को पूर्ण समझने का भ्रम उसे सीखने और सुधारने से रोक देता है। परिणामस्वरूप वह भीतर से ठहर जाता है, जबकि संसार आगे बढ़ता रहता है। समाज में उसकी छवि भी धीरे-धीरे हल्की पड़ने लगती है और सम्मान के स्थान पर उपहास जन्म लेने लगता है।

दूसरी ओर, कुछ लोग दूसरों की झूठी प्रशंसा कर अपने स्वार्थ साधने में दक्ष होते हैं। वे सामने वाले के अहंकार को सहलाते हैं, हर बात में समर्थन देते हैं और असत्य को भी सत्य की तरह प्रस्तुत करते हैं। जैसे ही उनका उद्देश्य पूरा होता है, संबंधों की गर्माहट ठंडी पड़ जाती है। ऐसी चापलूसी न तो स्थायी संबंध बनाती है और न ही विश्वास की नींव रखती है। यह प्रवृत्ति समाज में अवसरवादिता और कृत्रिमता को जन्म देती है।

झूठी प्रशंसा—चाहे वह आत्मप्रशंसा हो या चापलूसी—दोनों ही सामाजिक मूल्यों को कमजोर करती हैं। इससे ईमानदारी, पारदर्शिता और परस्पर विश्वास जैसे गुण क्षीण होते हैं। व्यक्ति मुखौटे के साथ जीने का अभ्यस्त हो जाता है। लंबे समय में यह मानसिक तनाव, असंतोष और अकेलेपन का कारण भी बन सकता है।

इसके विपरीत, सच्ची और निष्कपट प्रशंसा जीवन में सकारात्मक ऊर्जा का संचार करती है। जब किसी के परिश्रम, ईमानदारी और उपलब्धियों की यथार्थ सराहना की जाती है, तो उसका आत्मविश्वास सुदृढ़ होता है। वह स्वयं को समाज का सार्थक अंग महसूस करता है और और बेहतर करने की प्रेरणा पाता है। सच्ची प्रशंसा में अतिशयोक्ति नहीं, बल्कि यथार्थ का सम्मान होता है। यह संबंधों में मधुरता और विश्वास की दृढ़ नींव रखती है।

आज के प्रतिस्पर्धी और आभासी युग में आत्मप्रचार की प्रवृत्ति तीव्र हुई है। मंच बदल गए हैं, माध्यम बदल गए हैं, परंतु मूल्य वही हैं। वास्तविक सम्मान शब्दों के आडंबर से नहीं, बल्कि कर्म की निरंतरता से अर्जित होता है। आत्मसंयम, विनम्रता और सत्यनिष्ठा आज पहले से अधिक प्रासंगिक हैं।

अतः आवश्यकता है कि हम झूठी आत्मप्रशंसा और चापलूसी से स्वयं को दूर रखें। ईमानदारी से आत्ममूल्यांकन करें, अपनी सीमाओं को स्वीकारें और निरंतर सुधार की दिशा में अग्रसर रहें। साथ ही, दूसरों के गुणों और परिश्रम की निष्कपट सराहना करें। यही व्यवहार एक स्वस्थ, सशक्त और नैतिक समाज की आधारशिला बन सकता है।

सच्ची प्रशंसा व्यक्ति को ऊँचाइयों तक ले जाती है, जबकि झूठी प्रशंसा भीतर से खोखला कर देती है। इसलिए जीवन में सत्य, सादगी और संतुलन को अपनाकर ही स्थायी सम्मान का मार्ग प्रशस्त किया जा सकता है।

Bharat Sarathi
Author: Bharat Sarathi

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