वैलेंटाइन डे विशेष : प्रेम का ‘बाज़ारीकरण’ : जहाँ शरीर मंज़िल और भावनाएं मुसाफ़िर हैं

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उमेश कुमार साहू

जब समय की रेत पर सभ्यताएं अपने निशान छोड़ती हैं तो केवल वही गाथाएं अमर होती हैं जो ‘प्रेम’ की स्याही से लिखी गई हों लेकिन आज, जब हम 21वीं सदी के तीसरे दशक के मुहाने पर खड़े हैं तो ‘प्रेम’ शब्द अपनी मौलिकता खोता नजर आ रहा है। 14 फरवरी की तारीख अब हृदय की धड़कन कम और बाज़ार का कोलाहल ज्यादा सुनाती है। जिसे हम आज की भाषा में ‘डेटिंग’ या ‘रिलेशनशिप’ कहते हैं, क्या वह वास्तव में वह प्रेम है जिसकी सुगंध से सदियाँ महकती थीं? आज प्रेम की कोमलता कहीं खो गई है और उसकी जगह एक यांत्रिक प्रदर्शन ने ले ली है।

देह की परिधि और आत्मा का सन्नाटा

आधुनिकता ने हमें आज़ादी तो दी, लेकिन उस आज़ादी में हम ‘संयम’ खो बैठे। आज के दौर की सबसे बड़ी त्रासदी यह है कि हमने ‘प्रेम’ और ‘काम’ (Lust) के बीच की उस पवित्र रेखा को धुंधला कर दिया है जो कभी मर्यादा कहलाती थी। आज प्रेम का आरंभ और अंत अक्सर ‘देह’ पर जाकर रुक जाता है। जब आकर्षण केवल शारीरिक होता है, तो वह तब तक टिकता है जब तक सामने वाली देह नवीन है। जैसे ही वह नवीनता समाप्त होती है, तथाकथित ‘प्रेम’ भी दम तोड़ देता है।

हकीकत यह है कि देह केवल एक माध्यम है, मंज़िल नहीं। वास्तविक प्रेम वह है जहाँ दो आत्माएं एक-दूसरे के मौन को सुनने लगती हैं। प्रेम वह नहीं जो बिस्तर की सिलवटों में दम तोड़ दे, बल्कि प्रेम वह है जो दो व्यक्तियों को एक-दूसरे का ‘सर्वश्रेष्ठ संस्करण’ बनने में मदद करे। जहाँ त्याग बोझ न लगे और समर्पण गुलामी न लगे, वहीं प्रेम की पहली कोंपल फूटती है।

समर्पण का विलुप्तीकरण और ‘अहं’ का विस्तार

पुराने साहित्य और लोककथाओं में प्रेम का पर्यायवाची ‘त्याग’ हुआ करता था, आज वह ‘अधिकार’ बन गया है। त्याग और समर्पण जैसी भावनाएं आज के ‘इंस्टेंट’ युग में विलुप्त होती जा रही हैं। हम जिससे प्रेम करते हैं, हम उसे अपनी संपत्ति (Possession) समझने लगते हैं। “तुम केवल मेरी हो” से लेकर “मैं तुम्हारे बिना मर जाऊँगा” तक के दावे प्रेम नहीं, बल्कि एक तरह की मानसिक असुरक्षा हैं।

प्रेम तो आज़ाद करने का नाम है। आज समर्पण की जगह ‘अपेक्षाओं’ (Expectations) ने ले ली है। हम प्रेम इसलिए करते हैं ताकि कोई हमें खुश रख सके, जबकि प्रेम का असली आनंद तो दूसरे की खुशी में अपनी खुशी ढूंढने में है। जब प्रेम में ‘ध्यान’ जुड़ता है, तब वह शाश्वत बनता है। बिना ध्यान के प्रेम अक्सर ईर्ष्या, क्रोध और असुरक्षा में बदल जाता है।

“प्रेम गली अति सांकरी, तामें दो न समाहिं। जब मैं था तब हरि नहीं, अब हरि हैं मैं नाहिं।।”

कबीर का यह दर्शन स्पष्ट करता है कि जब तक ‘मैं’ (अहंकार) रहेगा, तब तक प्रेम का प्रवेश असंभव है। प्रेम में खुद को मिटाना पड़ता है, दूसरे को पाना नहीं पड़ता।

बाज़ारवाद का षड्यंत्र और भावनाओं की नीलामी

आज वेलेंटाइन डे एक ऐसा मेला बन गया है जहाँ भावनाओं की नीलामी होती है। बहुराष्ट्रीय कंपनियों ने युवा मन में यह बात बैठा दी है कि प्रेम की गहराई आपके द्वारा दिए गए तोहफे की कीमत से मापी जाती है। यदि आपने हीरा नहीं खरीदा, तो आपका प्रेम अधूरा है। विज्ञापनों ने प्रेम को एक ‘कमोडिटी’ बना दिया है जिसे खरीदा जा सकता है।

लेकिन क्या कोई बाज़ार वह ‘सुकून’ बेच सकता है जो एक-दूसरे का हाथ थामकर लंबी खामोश सैर में मिलता है? क्या कोई डायमंड उस ‘भरोसे’ की चमक की बराबरी कर सकता है जो विपरीत परिस्थितियों में साथ खड़े होने से आती है? आज लोग एक-दूसरे के साथ समय बिताने से ज्यादा, साथ में फोटो खींचकर सोशल मीडिया पर डालने को उत्सुक रहते हैं। हम ‘पब्लिक इमेज’ के लिए प्रेम कर रहे हैं, अहसास के लिए नहीं।

वेलेंटाइन : बलिदान की विस्मृत कथा

हम हर साल यह दिन मनाते हैं लेकिन बहुत कम लोग जानते हैं कि संत वेलेंटाइन ने प्रेम के लिए अपनी जान दी थी। तीसरी सदी के रोम में सम्राट क्लॉडियस ने सैनिकों के विवाह पर पाबंदी लगा दी थी। संत वेलेंटाइन ने उस क्रूर सत्ता के खिलाफ जाकर प्रेमियों के विवाह कराए और मृत्युदंड स्वीकार किया। उनका बलिदान शारीरिक सुख के लिए नहीं, बल्कि उस ‘आध्यात्मिक जुड़ाव’ के लिए था जिसे विवाह जैसा पवित्र बंधन पुष्ट करता है। आज का युवा वर्ग यदि उनके त्याग को समझ ले, तो वासना और प्रेम का अंतर स्वयं स्पष्ट हो जाएगा।

तकनीकी युग में ‘इंस्टेंट’ प्रेम का खतरा

हम ‘5G’ के युग में जी रहे हैं जहाँ सब कुछ जल्दी चाहिए। यहाँ वह ‘प्रतीक्षा’ खत्म हो गई है जो प्रेम को परिपक्व बनाती थी। पहले प्रेम में ‘तप’ होता था। आज ‘स्वाइप राइट’ करते ही साथी मिल जाता है और एक छोटी सी असहमति पर ‘ब्लॉक’ कर दिया जाता है। धैर्य का अभाव प्रेम का सबसे बड़ा दुश्मन है। प्रेम कोई रेडीमेड वस्तु नहीं है; यह तो एक बीज है जिसे विश्वास की खाद और धैर्य के पानी से सींचना पड़ता है। जो प्रेम जितनी जल्दी परवान चढ़ता है, वह उतनी ही जल्दी राख भी हो जाता है।

मर्यादा : प्रेम की सुरक्षा दीवार

समाज में आज प्रेम के नाम पर जो उच्छृंखलता बढ़ी है, उसने प्रेम की गरिमा को ठेस पहुँचाई है। मर्यादा वह तटबंध है जो प्रेम की नदी को विनाशकारी बाढ़ बनने से रोकता है। बिना मर्यादा के प्रेम वासना की वह आग है जो प्रेम करने वालों को ही जलाकर खाक कर देती है। पुराने समय में प्रेम को ‘इबादत’ कहा जाता था। इबादत में पवित्रता अनिवार्य है। जब तक हम दूसरे के व्यक्तित्व का सम्मान नहीं करेंगे, तब तक हमारा प्रेम केवल एक स्वार्थ सिद्ध करने का जरिया रहेगा।

अक्षुण्णता की ओर : कैसे बचाएं प्रेम को?

आज की पीढ़ी को यह समझना होगा कि देह नश्वर है और देह पर आधारित आकर्षण भी अस्थायी है। प्रेम की अक्षुण्णता बनाए रखने के लिए हमें कुछ बुनियादी बदलाव करने होंगे :

• संवाद की कोमलता: तकनीक के बजाय सीधे दिल से बात करें। शब्दों में वही माधुर्य लाएं जो हमारी संस्कृति की पहचान थी।

• भीतरी सुंदरता की खोज: चेहरे की चमक वक्त के साथ फीकी पड़ जाएगी, लेकिन स्वभाव की मिठास ताउम्र रहेगी।

• निस्वार्थता: प्रेम को ‘लेने’ की नहीं, ‘देने’ की प्रक्रिया बनाएं।

‘प्रेम’ के दिव्य और पवित्र प्रकाश की ओर बढ़ें

इस 14 फरवरी को, गुलाब के उस फूल को देने से पहले खुद से पूछिए – क्या आप उस व्यक्ति की आत्मा के अंधेरों को स्वीकार करने के लिए तैयार हैं? क्या आप उसके बुढ़ापे, उसकी बीमारी और उसकी असफलताओं में भी उतने ही प्रेम से साथ खड़े रहेंगे?

प्रेम कोई एक दिन का उत्सव नहीं, बल्कि एक ‘उपासना’ है। यह देह के बाज़ार से निकलकर रूह के गलियारों में टहलने का नाम है। जिस दिन हम देह की भूख से ऊपर उठकर आत्मा की प्यास को समझ लेंगे, उस दिन वेलेंटाइन डे सार्थक होगा। प्रेम वह प्रकाश है जो अँधेरी से अँधेरी राह को रोशन कर सकता है। आइए, इस बार ‘वासना’ के अंधेरे को पीछे छोड़ ‘प्रेम’ के दिव्य और पवित्र प्रकाश की ओर बढ़ें क्योंकि अंततः, संसार में वही जीवित रहता है जिसने निस्वार्थ प्रेम करना सीखा है।

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Author: Bharat Sarathi

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