डीपफेक और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस के परिवर्तित नियमों के वैधानिक अंतर्राष्ट्रीय मायने

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कमलेश पांडेय

आए दिन बदलते डिजिटल घटनाक्रम के बीच केंद्र सरकार ने IT (Intermediary Guidelines and Digital Media Ethics Code) Rules, 2021 में संशोधन करके डीपफेक (deepfake) और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) से बने कंटेंट के लिए नए डिजिटल नियम जारी किए हैं, जो 10 फरवरी 2026 को अधिसूचित किए गए और 20 फरवरी 2026 से पूरे देश में लागू होते हैं। चूंकि सरकार से लेकर सुप्रीम कोर्ट तक डीपफेक व एआई के बढ़ते गलत प्रचलन पर चिंता जाहिर कर चुके हैं, इसलिए सम्बन्धित प्रशासन का यह कदम स्वागत योग्य है। 

आपको पता होना चाहिए कि सिर्फ साल 2024 में ही साइबर क्राइम के 22.68 लाख केस सामने आए थे। खासकर कई सेलेब्स शिकायत कर चुके हैं कि उनकी तस्वीरों-विडियो का इंटरनेट पर गलत इस्तेमाल हुआ। चूंकि

नई दिल्ली में अगले हफ्ते से AI समिट होना है, जिसमें इस फील्ड के दिग्गज शामिल होंगे। इसलिए कहा जा सकता है कि सरकार के इंडिया AI मिशन की सफलता के लिए यह सम्मेलन बेहद अहम है। 

हालांकि आर्टिफिशल इंटेलिजेंस में भारत ने अभी तो बस शुरुआत की है। इसलिए यह सफर उम्मीद से बेहतर हो, इसके लिए बेहतर नियमन जरूरी है। वास्तव में भारत के नए डीपफेक/AI नियम (IT Rules 2021 में संशोधन, फरवरी 2026) अन्य देशों के मुकाबले स्पष्ट परिभाषा, तेज टेकडाउन (3 घंटे) और प्लेटफॉर्म जिम्मेदारी पर ज्यादा फोकस करते हैं, जबकि कई देशों में ये कानून अभी प्रस्तावित या कम सख्त हैं। ये अंतर “प्लेटफॉर्म‑केंद्रित” हैं, जो भारत को ग्लोबल लीडर बनाते हैं। 

इससे अंतरराष्ट्रीय जगत की बहुराष्ट्रीय कम्पनियों में कार्यरत लोग और उनके देशी मॉड्यूल भी नहीं बचेंगे। उम्मीद है कि अब सोशल मीडिया का अराजक राज भी कुछ हद तक नियंत्रित होगा। इस दृष्टि से डीपफेक और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस के परिवर्तित नियमों के वैधानिक अंतर्राष्ट्रीय मायने स्पष्ट हैं जो इस प्रकार हैं-

पहला, “सिंथेटिकली जनरेटेड इनफॉर्मेशन” (AI/डीपफेक) की कानूनी परिभाषा: सरकार ने अब AI या अन्य टूल से बनाया या संशोधित ऑडियो‑विजुअल/विजुअल कंटेंट को “synthetically generated information” (SGI) के तौर पर परिभाषित किया है। यह उन वीडियो, ऑडियो, छवियों को कवर करता है जो दिखने‑सुनने में असली लग रही हैं लेकिन AI या दूसरी तकनीक से बनाई गई हैं। 

दूसरा, मैंडेटरी लेबलिंग: “यह AI‑जनरेटेड है”- सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स (जैसे X, Instagram, YouTube आदि) को अब हर AI‑जनरेटेड या बदला हुआ वीडियो/ऑडियो पर स्पष्ट और साफ‑साफ लेबल लगाना अनिवार्य है, जैसे “AI‑generated” या “synthetic content”. अब इस लेबल को ऐसे रखा जाएगा कि यूज़र इसे आसानी से देख पाए और कंटेंट “असली” लगने पर भी यह साफ हो कि यह AI से बना है। 

तीसरा, मेटाडेटा, ट्रेस और बैन: प्लेटफॉर्म्स को पर्सिस्टेंट मेटाडेटा या यूनिक आइडेंटिफायर लगाने हैं ताकि डीपफेक/AI‑कंटेंट का सोर्स, किस प्लेटफॉर्म या टूल से बना, आसानी से ट्रेस हो सके। इसलिए लेबल या मेटाडेटा को मिटाकर या छिपाकर कंटेंट शेयर करने पर प्लेटफॉर्म को जवाबदेही माना जा सकता है। वहीं कुछ केसों में (जैसे बेवजह किसी की आवाज़/इमेज का इस्तेमाल, एक्सपोजिंग कंटेंट, बच्चों के खिलाफ मैटरियल, धोखाधड़ी के दस्तावेज़ आदि) ऐसे AI‑कंटेंट पर सीधा बैन लगाने की बात है।

 चौथा, फास्ट टेक‑डाउन टाइम: “ओब्जेक्शनेबल कंटेंट को 3 घंटे में हटाएं” यानी कोई कानूनी/अधिकृत सूत्र (जैसे कोर्ट या सरकारी अथॉरिटी) जिस डीपफेक या AI‑कंटेंट को ओब्जेक्शनेबल बताए, उसे प्लेटफॉर्म पर 3 घंटे के भीतर हटाना अनिवार्य होगा। इन्हीं नियमों में यूज़र शिकायतों के निपटान का समय भी घटाकर कुछ मुद्दों पर 7 दिन तक कर दिया गया है। 

पांचवां, यूज़र से डिक्लेरेशन और प्लेटफॉर्म पर कंट्रोल: बड़े सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स यूज़र से यह पहले ही पूछने वाले कि वे कौन‑सा कंटेंट AI से बनाया/संपादित है, और इस डिक्लेरेशन की सत्यता जांचने के लिए वे ऑटोमेटेड टूल्स (AI डिटेक्शन/मॉडरेशन टूल्स) लगाएंगे। अगर प्लेटफॉर्म ने लेबल नहीं लगाया, सही लेबल नहीं दिया, या अवैध AI‑कंटेंट को समय पर नहीं हटाया, तो उसे IT Act के तहत कानूनी जोखिम हो सकते हैं। 

सवाल है कि ये डीपफेक नियम अन्य देशों के AI कानूनों से कैसे अलग हैं? तो यह जान लीजिए कि भारत के नए डीपफेक/AI नियम (IT Rules 2021 में संशोधन, फरवरी 2026) अन्य देशों के मुकाबले “स्पष्ट परिभाषा, तेज टेकडाउन (3 घंटे) और प्लेटफॉर्म जिम्मेदारी” पर ज्यादा फोकस करते हैं, जबकि कई देशों में ये कानून अभी प्रस्तावित या कम सख्त हैं। ये अंतर “प्लेटफॉर्म‑केंद्रित” हैं, जो भारत को ग्लोबल लीडर बनाते हैं। [

जहां तक अमेरिका (USA) से तुलना की बात है तो संयुक्त राज्य अमेरिका में DEEPFAKES Accountability Act (2023) अभी तक कानून नहीं बना है, बल्कि सिर्फ प्रस्तावित है जो वॉटरमार्किंग और ट्रेसबिलिटी मांगता है लेकिन प्लेटफॉर्म्स पर बाध्यकारी नहीं हैं। जबकि भारत के नियम तुरंत लागू हैं, 3 घंटे का टेकडाउन देते हैं और लेबलिंग को 10% विजिबल बनाते हैं, जो USA के सेल्फ‑रेगुलेशन से ज्यादा सख्त है। 

जहां तक यूरोपीय संघ (EU) से तुलना  की बात है तो यूरोपीय संघ यानी EU AI Act (2024) डीपफेक टूल्स को हाई‑रिस्क मानता है, ट्रांसपेरेंसी और रिस्क असेसमेंट मांगता है लेकिन डीपफेक के लिए स्पेसिफिक प्रावधान कम हैं। जबकि भारत SGI (synthetically generated information) की स्पष्ट डेफिनिशन देता है, मेटाडेटा ट्रेसिंग और 3 घंटे टेकडाउन के साथ। वहीं EU ज्यादा व्यापक AI रेगुलेशन पर फोकस करता है। 

जहां तक चीन से तुलना की बात है तो चीन के 2023 Deep Synthesis Regulations लेबलिंग और ट्रेसबिलिटी पर समान हैं, लेकिन सरकारी कंट्रोल ज्यादा सख्त है। जबकि भारत प्लेटफॉर्म्स को ऑटोमेटेड टूल्स लगाने और यूजर डिक्लेरेशन लेने का आदेश देता है, जो चीन से मिलता लेकिन लोकतांत्रिक प्लेटफॉर्म्स पर ज्यादा लागू होता है। 

जहां तक यूके (UK) से तुलना की बात है तो यूनाइटेड किंगडम यानी UK Online Safety Act (2023) हानिकारक डीपफेक (सेक्सुअल इमेज) को क्रिमिनलाइज करता है, Ofcom कोड्स से प्लेटफॉर्म्स पर ड्यूटी ऑफ केयर लगाता है। जबकिं भारत सभी प्रकार के डीपफेक पर फोकस करता है (चुनाव, फ्रॉड आदि), 3 घंटे vs UK के 24 घंटे टेकडाउन के साथ ज्यादा तेज है। 

इस प्रकार देखा जाए तो भारत सरकार ने डीपफेक और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस से तैयार कंटेंट के लिए डिजिटल नियमों को कड़ा कर दिया है, क्योंकि तकनीक के दुरुपयोग को रोकने के लिए इसकी सख्त जरूरत थी। खासकर ऑडियो, विडियो और तस्वीरों से छेड़छाड़ व फर्जी कंटेंट सामाजिक सौहार्द बिगाड़ने के साथ-साथ आम लोगों व देश की सुरक्षा के लिए भी खतरा बन रहे हैं।

हालांकि सोशल मीडिया पर कोई भी नया नियम लागू करने पर सबसे पहले अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का सवाल उठाया जाता है, खासकर यह कि सरकार कहां तक निगरानी कर सकती है? इस लिहाज से नए नियम बेहद महत्वपूर्ण हैं, विश्व में सबसे अच्छे हैं, क्योंकि इनमें नियंत्रण से ज्यादा नियमन को तरजीह दी गई है। इसका स्पष्ट मकसद है कि देखने वालों को असली और नकली के बीच का फर्क पता रहे, ताकि उसका इस्तेमाल किसी गलत काम के लिए न हो सके।

नए नियमों के मुताबिक, AI लेबलिंग होनी चाहिए। यह भी जरूरी है कि कंटेंट आया कहां से है और अगर कोई सामग्री गैरकानूनी है तो उसे तीन घंटे के भीतर हटाना होगा। सरकार ने नियमों के पालन के लिए तय समय-सीमा भी घटाई है। चूंकि ऑनलाइन चीजें जिस तेजी से वायरल होती हैं, इसलिए उसे देखते हुए यह बेहद जरूरी था कि एक्शन की रफ्तार भी बढ़ाई जाए। वहीं, जिस तरह से अब सोशल मीडिया प्लैटफॉर्म और उनके सीनियर अधिकारियों पर कार्रवाई की जिम्मेदारी डाली गई है, जो बिल्कुल ठीक है। क्योंकि ये कंपनियां हर बात में यूजर राइट्स और प्राइवेसी की आड़ लेकर बच नहीं सकतीं, उनकी भी जवाबदेही तय होना जरूरी है।

आंकड़े बताते हैं कि भारत में दुनिया के सबसे ज्यादा सोशल मीडिया यूजर मौजूद हैं और 86% से ज्यादा घरों तक इंटरनेट पहुंच चुका है। लिहाजा डिजिटल इंडिया आज तरक्की का संकेत है, लेकिन इसके साथ चुनौतियां भी बढ़ी हैं। खासकर डीपफेक और AI के जरिये ऑडियो-विडियो में छेड़छाड़ ऐसी ही एक गंभीर चुनौती है। यूँ तो आर्टिफिशल इंटेलिजेंस का विस्तार अभी शुरू हुआ है,जिसके साथ देशों की राजनीति, समाज, अर्थव्यवस्था- सब कुछ नए ढंग से आकार ले रहा है। इसलिए भारत ने देर आयद, दुरुस्त आयद की तर्ज पर बहुत ही सोचा समझा हुआ कदम उठाया है।

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Author: Bharat Sarathi

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