“पशु अधिकार या मानव जीवन? आवारा कुत्ते, सुप्रीम कोर्ट की चेतावनी और सभ्य समाज की परीक्षा”

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आवारा कुत्ते, मानवीय संवेदना और सार्वजनिक सुरक्षा

सुप्रीम कोर्ट की सख्त टिप्पणी और भारत के सामने खड़ा वैश्विक सवाल

डॉग बाइट मामलों पर 20 जनवरी 2026 की सुनवाई केवल तारीख नहीं, नीति और जवाबदेही की दिशा तय करने वाली घड़ी

— एडवोकेट किशन सनमुखदास भावनानी

गोंदिया | 13 जनवरी 2026 – भारत में आवारा कुत्तों की समस्या नई नहीं है, लेकिन 13 जनवरी 2026 को सुप्रीम कोर्ट में हुई सुनवाई के बाद यह विषय अब केवल पशु-प्रेम या करुणा तक सीमित नहीं रहा। यह मुद्दा अब सार्वजनिक सुरक्षा, प्रशासनिक जवाबदेही और संवैधानिक कर्तव्य के केंद्र में आ खड़ा हुआ है।

सुप्रीम कोर्ट की तीखी टिप्पणियों ने यह स्पष्ट कर दिया है कि यह बहस अब भावनाओं पर नहीं, बल्कि जीवन के अधिकार (अनुच्छेद 21), राज्य की जिम्मेदारी और नागरिकों की सुरक्षा के आधार पर तय होगी।

डॉग बाइट और राज्य की जिम्मेदारी: न्यायिक चेतावनी

जब एक नौ वर्षीय बच्चा आवारा कुत्तों के हमले में जान गंवाता है, तो वह केवल एक दुर्घटना नहीं रह जाती—
वह राज्य की नीतिगत विफलता और प्रशासनिक उदासीनता का प्रतीक बन जाती है।

सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि यदि डॉग बाइट की घटनाएं नहीं रुकीं, तो राज्य सरकारों को प्रत्येक मामले में भारी मुआवजा देना पड़ सकता है
यह टिप्पणी भारतीय न्यायिक सोच में एक निर्णायक मोड़ है, जहाँ अधिकार और कर्तव्य को अलग-अलग नहीं देखा जा सकता।

डॉग फीडर्स की भूमिका और कानूनी जवाबदेही

अदालत ने यह भी संकेत दिया कि केवल सरकार ही नहीं, बल्कि सार्वजनिक स्थानों पर आवारा कुत्तों को भोजन कराने वाले व्यक्ति या संगठन भी जवाबदेही से मुक्त नहीं हो सकते

सुप्रीम कोर्ट की महत्वपूर्ण टिप्पणी यह रही कि— “आवारा कुत्ते किसी व्यक्ति या संगठन की निजी संपत्ति नहीं हैं।”

यदि कोई व्यक्ति उन्हें भोजन कराता है, संरक्षण देता है और उन्हें सार्वजनिक स्थानों पर बनाए रखता है, तो हमले या मृत्यु की स्थिति में जिम्मेदारी से पीछे हटना स्वीकार्य नहीं हो सकता
यदि कुत्ते वास्तव में “किसी के हैं”, तो उन्हें सड़कों पर छोड़ना न तो नैतिक है और न ही कानूनी

बच्चे और बुजुर्ग: सबसे असुरक्षित, सबसे उपेक्षित

सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने विशेष रूप से बच्चों और बुजुर्गों की सुरक्षा पर गहरी चिंता जताई।
ये वे वर्ग हैं जो न तो अपनी रक्षा कर पाते हैं और न ही हमले की स्थिति में त्वरित प्रतिक्रिया दे सकते हैं।

स्कूल जाते बच्चे, सुबह टहलते बुजुर्ग, अस्पतालों के बाहर मरीज—
यदि ये आवारा कुत्तों के हमले का शिकार बनते हैं, तो यह संवैधानिक अधिकारों का सीधा उल्लंघन है।

अदालत का तीखा प्रश्न— “क्या भावनाएं केवल कुत्तों के लिए हैं, इंसानों के लिए नहीं?”

समाज के दोहरे मापदंड को उजागर करता है।

करुणा बनाम अराजकता: सुप्रीम कोर्ट का संतुलित दृष्टिकोण

सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि जो लोग कुत्तों की देखभाल करना चाहते हैं, वे यह कार्य अपने घर या निजी परिसर में करें।
सार्वजनिक सड़कों पर उन्हें छोड़कर भय और खतरा उत्पन्न करना, और फिर जिम्मेदारी से बचना—अब स्वीकार्य नहीं होगा।

यह दृष्टिकोण अंतरराष्ट्रीय मानकों के अनुरूप है, जहाँ पेट ओनरशिप के साथ कानूनी दायित्व अनिवार्य होता है।

प्रशासनिक निष्क्रियता और प्रणालीगत विफलता

अदालत ने इसे केवल कानून-व्यवस्था का नहीं, बल्कि प्रशासनिक निष्क्रियता का मुद्दा बताया।
नगरपालिकाओं और स्थानीय निकायों द्वारा—

  • नियमित सर्वेक्षण का अभाव
  • पर्याप्त डॉग शेल्टर की कमी
  • स्टरलाइजेशन कार्यक्रमों का अधूरा क्रियान्वयन

इस समस्या को वर्षों से और गंभीर बनाता रहा है।

स्कूलों, अस्पतालों, रेलवे स्टेशनों और खेल परिसरों से आवारा कुत्तों को हटाने के पूर्व आदेशों को दोहराते हुए, अदालत ने उनके सख्त अनुपालन की चेतावनी दी।

डॉग बाइट: एक पूरी तरह रोकथाम योग्य खतरा

सुप्रीम कोर्ट ने डॉग बाइट को “प्रिवेंटेबल रिस्क” यानी रोकथाम योग्य खतरा माना।
किसी क्षेत्र में बार-बार ऐसी घटनाएं होना प्रशासनिक लापरवाही का स्पष्ट संकेत है।

अंतरराष्ट्रीय परिप्रेक्ष्य: दुनिया क्या करती है?

अमेरिका, यूरोप, जापान और ऑस्ट्रेलिया जैसे देशों में आवारा कुत्तों की समस्या लगभग न के बराबर है।
वहाँ—

  • पेट ओनरशिप लाइसेंस
  • अनिवार्य रजिस्ट्रेशन
  • भारी जुर्माना
  • मजबूत शेल्टर सिस्टम

सख्ती से लागू हैं।

भारत में लंबे समय तक भावनात्मक दृष्टिकोण ने व्यावहारिक और सुरक्षित समाधान को बाधित किया है।

संविधान और अनुच्छेद 21: जीवन का अधिकार

भारतीय संविधान का अनुच्छेद 21 जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता की गारंटी देता है।
जब राज्य नागरिकों—विशेषकर बच्चों और बुजुर्गों—को सड़कों पर सुरक्षित नहीं रख पाता, तो यह संवैधानिक विफलता बन जाती है।

सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणियाँ स्पष्ट संकेत देती हैं कि अब इस मुद्दे को मौलिक अधिकारों के उल्लंघन के रूप में देखा जा रहा है।

20 जनवरी 2026: केवल तारीख नहीं, दिशा निर्धारण

20 जनवरी 2026 को होने वाली अगली सुनवाई केवल एक तारीख नहीं, बल्कि—

  • स्पष्ट गाइडलाइंस
  • मुआवजा ढांचा
  • डॉग फीडर्स की कानूनी जिम्मेदारी

तय करने वाली ऐतिहासिक सुनवाई हो सकती है।

निष्कर्ष

यह बहस करुणा बनाम जिम्मेदारी की नहीं, बल्कि करुणा के साथ जिम्मेदारी की है।
सुप्रीम कोर्ट का संदेश साफ है—

करुणा आवश्यक है, पर अराजकता स्वीकार्य नहीं।
आवारा कुत्तों की देखभाल जरूरी है, लेकिन इंसानों की जान की कीमत पर नहीं

अब भारत को तय करना होगा कि वह भावनाओं के नाम पर जोखिम उठाता रहेगा या अंतरराष्ट्रीय मानकों के अनुरूप संतुलित, मानवीय और सुरक्षित मॉडल अपनाएगा।

यह बहस केवल कुत्तों की नहीं, बल्कि एक सभ्य समाज की प्राथमिकताओं की है।

— संकलनकर्ता / लेखक : एडवोकेट किशन सनमुखदास भावनानी (कर विशेषज्ञ स्तंभकार, साहित्यकार, अंतरराष्ट्रीय लेखक, चिंतक, कवि) गोंदिया, महाराष्ट्र

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Author: Bharat Sarathi

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