वर्ल्ड क्लास सुविधाएँ या वर्ल्ड क्लास नागरिक?

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लखनऊ के राष्ट्रीय प्रेरणा स्थल की छोटी चोरी ने उजागर किया भारत की लोकतांत्रिक चेतना, नागरिक आचरण और मौलिक कर्तव्यों की वैश्विक सच्चाई

राष्ट्रीय प्रेरणा स्थल लखनऊ की घटना बनी बड़ा सामाजिक आईना—वर्ल्ड क्लास भारत की नागरिक जिम्मेदारियों पर सवाल

एडवोकेट किशन सनमुखदास भावनानी

गोंदिया वैश्विक स्तरपर इक्कीसवीं सदी का भारत वैश्विक मंच पर तेज़ी से उभरता हुआ राष्ट्र है। डिजिटल इंडिया, स्मार्ट सिटी परियोजनाएँ, बुलेट ट्रेन,वर्ल्ड क्लास एयरपोर्ट, आधुनिक हाईवे, मेट्रो नेटवर्क, ऑनलाइन सेवाएँ और अत्याधुनिक बुनियादी ढाँचा ये सभी भारत की सामूहिक आकांक्षाओं का प्रतीक हैं। हम चाहते हैं कि भारत उन विकसित देशों की पंक्ति में खड़ा हो, जहाँ जीवन-स्तर, सार्वजनिक सुविधाएँ और शहरी सौंदर्य अंतरराष्ट्रीय मानकों के अनुरूप हों।परंतु इसी प्रगति के साथ एक मूल प्रश्न निरंतर हमारे सामने खड़ा है, क्या हम स्वयं वर्ल्ड क्लास नागरिक बनने के लिए तैयार हैं? क्या कोई देश केवल सरकारों, नीतियों और बजट से महान बनता है, या फिर नागरिकों के आचरण, नैतिकता और जिम्मेदारी से उसकी असली पहचान गढ़ी जाती है?

अधिकारों की जागरूकता और कर्तव्यों का विस्मरण

मैं, एडवोकेट किशन सनमुखदास भावनानी, यह मानता हूँ कि आज भारतीय नागरिक अपने अधिकारों के प्रति पहले से कहीं अधिक जागरूक हैं। सूचना का अधिकार, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता, डिजिटल प्लेटफॉर्म पर शिकायत की सुविधा, उपभोक्ता अधिकार और सोशल मीडिया के माध्यम से सरकार से सीधा संवाद—इन सबने नागरिक को सशक्त बनाया है।हम अपेक्षा करते हैं कि सड़कें साफ़ हों, पार्क सुंदर हों, स्मारक सुरक्षित हों, सार्वजनिक संपत्ति सुव्यवस्थित हो और शासन पारदर्शी हो। यह अपेक्षाएँ पूरी तरह वैध हैं, क्योंकि लोकतंत्र में नागरिक का अधिकार सर्वोपरि है।परंतु प्रश्न यह है कि अधिकारों के साथ कर्तव्यों का संतुलन क्यों टूट रहा है?

मौलिक कर्तव्य: संविधान की अनदेखी या सामाजिक लापरवाही?

भारतीय संविधान ने नागरिकों को केवल अधिकार ही नहीं दिए, बल्कि अनुच्छेद 51(क) के अंतर्गत मौलिक कर्तव्यों का स्पष्ट उल्लेख भी किया है—

राष्ट्रीय संपत्ति की रक्षा, सार्वजनिक व्यवस्था बनाए रखना, भाईचारे की भावना विकसित करना, संविधान और उसके मूल्यों का सम्मान करना।

दुर्भाग्यवश, ये कर्तव्य अक्सर किताबों और भाषणों तक सीमित रह जाते हैं। व्यवहार में हम अधिकारों की भाषा तो पूरे आत्मविश्वास से बोलते हैं, लेकिन कर्तव्यों की बात आते ही चुप्पी साध लेते हैं।

राष्ट्रीय प्रेरणा स्थल, लखनऊ: एक घटना, अनेक सवाल

हाल ही में लखनऊ स्थित राष्ट्रीय प्रेरणा स्थल की घटना ने पूरे देश को सोचने पर मजबूर कर दिया। पंडित श्यामा प्रसाद मुखर्जी, पंडित दीनदयाल उपाध्याय और पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी जैसी महान विभूतियों की प्रतिमाओं वाले इस स्थल को सुंदर बनाने के लिए लगाए गए फूलों के गमलों की चोरी शुरू हो गई।यह कोई साधारण चोरी नहीं थी। यह घटना इसलिए अधिक चिंताजनक बनी, क्योंकि चोरी करने वाले लोग न तो अत्यंत गरीब थे, न ही हाशिये पर खड़े। वे स्कूटर और कारों से आए, अच्छे कपड़े पहने हुए थे, महिलाएँ और पुरुष हँसते हुए गमले उठाकर ले जा रहे थे।

80-100 रुपये के गमले और करोड़ों की मानसिक दरिद्रता

यहाँ सवाल केवल 80 या 100 रुपये के गमलों का नहीं है। सवाल उस मानसिकता का है, जो सार्वजनिक संपत्ति को ‘सरकारी’ समझकर लूट का माल मान लेती है।जिनके पास वाहन हैं, रोजगार है, सामाजिक प्रतिष्ठा है- यदि वे सार्वजनिक स्थल से चोरी करते समय कोई अपराध-बोध महसूस नहीं करते, तो यह केवल कानून-व्यवस्था की नहीं, बल्कि सामाजिक नैतिकता की गंभीर विफलता है।

हँसी के साथ चोरी: संवेदनहीनता का खतरनाक संकेत

इस घटना का सबसे दुखद पहलू यह था कि चोरी करते समय उनके चेहरों पर कोई शर्म नहीं थी। वे हँस रहे थे, मानो यह कोई सामान्य या मज़ाकिया कार्य हो। यह हँसी उस सामूहिक संवेदनहीनता का प्रतीक है, जो धीरे-धीरे समाज में गहराई तक पैठ बना रही है।

जब गलत कार्य करते समय अपराध-बोध समाप्त हो जाए, तभी समाज का नैतिक पतन आरंभ होता है।

गरीब बनाम संपन्न: कानून की दोहरी धारणा

यह भी एक कटु सत्य है कि यदि कोई गरीब व्यक्ति छोटी चोरी करता है, तो उसके विरुद्ध कठोर कार्रवाई तुरंत शुरू हो जाती है—मीडिया ट्रायल, पुलिसिया सख्ती और सामाजिक तिरस्कार।परंतु जब तथाकथित सभ्य और संपन्न वर्ग ऐसा करता है, तो अक्सर मामले को हल्के में लिया जाता है। यही असमानता कानून के प्रति विश्वास को कमजोर करती है और सामाजिक अन्याय को जन्म देती है।

राष्ट्रीय प्रेरणा स्थलों का अपमान: विचारधारा से परे राष्ट्रीय क्षतिराष्ट्रीय प्रेरणा स्थल किसी एक दल या विचारधारा का प्रतीक नहीं होते। वे राष्ट्रीय स्मृति और चेतना के केंद्र होते हैं। वहाँ स्थापित प्रतिमाएँ इतिहास, त्याग और राष्ट्र-निर्माण की गवाह होती हैं।ऐसे स्थलों से गमले चुराना केवल चोरी नहीं, बल्कि राष्ट्रीय चेतना का अपमान है।

सार्वजनिक संपत्ति: सरकारी नहीं, हमारी अपनी

भारत में सार्वजनिक संपत्ति को लेकर एक गहरी गलतफहमी है। लोग उसे ‘सरकारी’ मानकर नुकसान पहुँचाना अपना अधिकार समझ लेते हैं। जबकि सच्चाई यह है कि हर सड़क, हर पार्क, हर स्मारक जनता के कर से बना है।दंगे, विरोध-प्रदर्शन और आंदोलनों के दौरान बसें जलाना, रेलवे संपत्ति तोड़ना और सरकारी इमारतों को नुकसान पहुँचाना, ये सब अंततः जनता की ही जेब पर बोझ डालते हैं।

विरोध का अधिकार बनाम विनाश का अपराध

लोकतंत्र में विरोध का अधिकार अत्यंत महत्वपूर्ण है, लेकिन विरोध और विनाश के बीच एक स्पष्ट रेखा है।

शांतिपूर्ण प्रदर्शन लोकतांत्रिक शक्ति का प्रतीक है, जबकि सार्वजनिक संपत्ति का विनाश अराजकता का।दुर्भाग्यवश, हम अक्सर इस अंतर को भूल जाते हैं।

वैश्विक दृष्टिकोण: नागरिकता की अंतरराष्ट्रीय कसौटी

जापान, जर्मनी और सिंगापुर जैसे देशों में सार्वजनिक संपत्ति के प्रति सम्मान कानून के डर से नहीं, बल्कि सामाजिक संस्कारों से आता है। वहाँ नागरिक स्वयं गलत व्यवहार को रोकते हैं, क्योंकि वे जानते हैं कि राष्ट्र की छवि उनके आचरण से बनती है।भारत आज G-20, वैश्विक दक्षिण के नेतृत्व और अंतरराष्ट्रीय कूटनीति में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहा है। लेकिन यदि आंतरिक स्तर पर नागरिक जिम्मेदारी कमजोर रही, तो हमारी वैश्विक छवि पर प्रश्नचिह्न लगना स्वाभाविक है।

समाधान: शिक्षा, संस्कार और समान कानून

इस समस्या का समाधान केवल सख्त कानूनों में नहीं, बल्कि शिक्षा और संस्कारों में निहित है। नागरिक शास्त्र को केवल परीक्षा का विषय नहीं, बल्कि जीवन का व्यवहार बनाना होगा।साथ ही, कानून का समान रूप से लागू होना—चाहे दोषी गरीब हो या संपन्न न्याय और विश्वास की बहाली का आधार है।मीडिया और समाज को भी सनसनी के बजाय आत्ममंथन को बढ़ावा देना होगा।

अतः अगर हम उपरोक्त पूरे विवरण का अध्ययन कर इसका विश्लेषण करें तो हम पाएंगे क़ि वर्ल्ड क्लास भारत का रास्ता नागरिक चरित्र से होकर,वर्ल्ड क्लास सुविधाएँ तभी सार्थक होंगी, जब वर्ल्ड क्लास नागरिक उन्हें संभालने और सम्मान देने के लिए तैयार हों।लखनऊ की गमला चोरी की घटना कोई छोटी खबर नहीं, बल्कि एक बड़ी चेतावनी है।यदि हम समय रहते अपने मौलिक कर्तव्यों को नहीं समझेंगे, तो अधिकारों की यह इमारत खोखली सिद्ध होगी। भारत को महान बनाने का मार्ग केवल नीतियों और योजनाओं से नहीं, बल्कि नागरिक चरित्र, नैतिकता और जिम्मेदारी से होकर गुजरता है।जब हर भारतीय यह समझ लेगा कि सार्वजनिक संपत्ति उसकी अपनी है और राष्ट्र की गरिमा उसके आचरण से जुड़ी है,तभी भारत वास्तव में वर्ल्ड क्लास राष्ट्र बन पाएगा।

लेखक परिचय-संकलनकर्ता एवं लेखक: एडवोकेट किशन सनमुखदास भावनानी कर विशेषज्ञ स्तंभकार | साहित्यकार | अंतरराष्ट्रीय लेखक | चिंतक | कवि | संगीत माध्यमा | सीए (एटीसी) गोंदिया, महाराष्ट्र

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Author: Bharat Sarathi

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