सुप्रीम कोर्ट के हस्तक्षेप से अरावली संरक्षण की लड़ाई को नई ताक़त, विशेषज्ञ समिति के गठन का फैसला स्वागतयोग्य

गुरुग्राम, 30 दिसंबर 2025।अरावली पर्वतमाला की नई परिभाषा और 100 मीटर ऊंचाई आधारित आदेश को लेकर माननीय सुप्रीम कोर्ट द्वारा स्वतः संज्ञान लेते हुए उस आदेश पर रोक लगाए जाने के निर्णय का संयुक्त किसान मोर्चा, गुरुग्राम के अध्यक्ष एवं जिला बार एसोसिएशन गुरुग्राम के पूर्व प्रधान चौधरी संतोख सिंह ने स्वागत किया है। उन्होंने इसे पर्यावरण संरक्षण, जनहित और सच्चाई की दिशा में एक ऐतिहासिक और दूरगामी प्रभाव वाला फैसला बताया।
चौधरी संतोख सिंह ने कहा कि सुप्रीम कोर्ट का यह निर्णय अरावली के सतत पारिस्थितिकी तंत्र (इकोसिस्टम) की रक्षा की दिशा में मील का पत्थर है। यह फैसला न केवल वर्तमान पीढ़ी, बल्कि आने वाली पीढ़ियों के लिए देश की अमूल्य प्राकृतिक धरोहर को सुरक्षित रखने की न्यायपालिका की प्रतिबद्धता को भी दर्शाता है।
उन्होंने बताया कि सर्वोच्च न्यायालय ने इस मामले में कई गंभीर और मूलभूत प्रश्न उठाए हैं—
क्या केवल ऊंचाई के आधार पर किसी पहाड़ी श्रृंखला की परिभाषा तय करना एक निरंतर और आपस में जुड़े इकोसिस्टम को खंडित नहीं करेगा?
क्या इस तरह का कट-ऑफ बड़े और संवेदनशील पर्यावरणीय क्षेत्रों को संरक्षण के दायरे से बाहर नहीं कर देगा?
और क्या इससे खनन व रियल एस्टेट गतिविधियों के लिए खतरनाक रास्ते नहीं खुलेंगे?
इन चिंताओं को ध्यान में रखते हुए सुप्रीम कोर्ट द्वारा 100 मीटर ऊंचाई आधारित आदेश पर रोक लगाना और विशेषज्ञ समिति के गठन का निर्णय अत्यंत स्वागतयोग्य है। यह स्पष्ट संकेत है कि पहाड़ केवल भौगोलिक संरचनाएं नहीं, बल्कि जीवित और संवेदनशील इकोसिस्टम हैं, जिन्हें व्यावसायिक हितों के लिए मनमाने ढंग से पुनर्परिभाषित नहीं किया जा सकता।
चौधरी संतोख सिंह ने सरकार को स्पष्ट संदेश देते हुए कहा कि अरावली जैसी दुनिया की सबसे प्राचीन पर्वतमालाओं को किसी भी कीमत पर खनन या रियल एस्टेट हितों की भेंट नहीं चढ़ाया जा सकता। गलत नीतिगत फैसले न केवल पर्यावरणीय असंतुलन पैदा करेंगे, बल्कि पूरे क्षेत्र को रेगिस्तानीकरण की ओर धकेल सकते हैं।
उन्होंने यह भी कहा कि अरावली को बचाने की लड़ाई अभी समाप्त नहीं हुई है, लेकिन सुप्रीम कोर्ट के इस हस्तक्षेप से जवाबदेही, इकोलॉजिकल प्रोटेक्शन और पर्यावरणीय न्याय अब नीति-निर्माण और सार्वजनिक विमर्श के केंद्र में आ गए हैं। यह फैसला पर्यावरण के पक्ष में संघर्षरत सभी नागरिकों और संगठनों के लिए एक बड़ी नैतिक जीत है।







