इलेक्टोरल ट्रस्ट्स की ओर से चुनाव आयोग को सौंपी गई रिपोर्ट्स-भारत की राजनीतिक फंडिंग का पारदर्शी मॉडल या सत्ता-केंद्रित वित्तीय संरचना?

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लोकतंत्र और राजनीतिक चंदे की पारदर्शिता का प्रश्न- 2024-25 के आंकड़े यह दिखाते हैं कि इलेक्टोरल ट्रस्ट्स मॉडल भी सत्ता संतुलन की समस्या से मुक्त नहीं है

सुप्रीम कोर्ट द्वारा इलेक्टोरल बॉन्ड पर रोक के बाद जिस तरह से चंदे का बड़ा हिस्सा कुछ चुनिंदा दलों,विशेषकर सत्तारूढ़ पार्टी, की ओर केंद्रित हुआ है,वह लोकतंत्र के लिए नए प्रश्न खड़े करता है

-एडवोकेट किशन सनमुखदास भावनानी

गोंदिया – वैश्विक स्तरपर लोकतंत्र और राजनीतिक चंदे की पारदर्शिता का प्रश्न भारत जैसे विशाल लोकतंत्र में राजनीतिक दलों की वित्तीय पारदर्शिता केवल एक प्रशासनिक प्रक्रिया नहीं, बल्कि लोकतंत्र की आत्मा से जुड़ा मूल प्रश्न है। चुनाव प्रचार, संगठन विस्तार, मीडिया प्रबंधन और जमीनी स्तरपर कार्यकर्ताओं की गतिविधियों के लिए राजनीतिक दलों को भारी मात्रा में धन की आवश्यकता होती है। यही आवश्यकता राजनीतिक फंडिंग को जन्म देती है, लेकिन साथ ही यह सवाल भी खड़ा करती है कि यह धन कहां से आता है, किसने दिया, कितना दिया और बदले में क्या अपेक्षाएं जुड़ी हैं।भारतीय कानून के अनुसार, राजनीतिक दलों को ₹20,000 से अधिक के प्रत्येक चंदे की जानकारी भारत निर्वाचन आयोग को देना अनिवार्य है। इसके बावजूद लंबे समय तक राजनीतिक फंडिंग की प्रक्रिया संदेह और अपारदर्शिता से घिरी रही।

इलेक्टोरल बॉन्ड पर सुप्रीम कोर्ट का बैन और बदला हुआ परिदृश्य-

वर्ष 2017 से 2024 के बीच लागू रही इलेक्टोरल बॉन्ड योजना के तहत ₹16,000 करोड़ से अधिक का गुमनाम चंदा राजनीतिक दलों को प्राप्त हुआ। सुप्रीम कोर्ट ने इसे लोकतांत्रिक मूल्यों के विरुद्ध मानते हुए असंवैधानिक घोषित कर दिया। इस ऐतिहासिक फैसले के बाद राजनीतिक फंडिंग का पूरा परिदृश्य अचानक बदल गया।बॉन्ड के माध्यम से मिलने वाला गोपनीय चंदा बंद होते ही इलेक्टोरल ट्रस्ट्स एक बार फिर राजनीतिक दलों के लिए सबसे बड़े वैध और औपचारिक माध्यम के रूप में उभरकर सामने आए।

2024–25 के आंकड़े: अभूतपूर्व वृद्धि और सत्ता का केंद्रीकरण

इलेक्टोरल ट्रस्ट्स द्वारा चुनाव आयोग को सौंपी गई रिपोर्ट्स के अनुसार, वित्तीय वर्ष 2024–25 में कुल नौ इलेक्टोरल ट्रस्ट्स ने राजनीतिक दलों को ₹3,811 करोड़ का चंदा दिया। यह राशि 2023–24 के ₹1,218 करोड़ की तुलना में 200 प्रतिशत से अधिक की वृद्धि दर्शाती है।सबसे महत्वपूर्ण तथ्य यह है कि इस कुल राशि में से ₹3,112 करोड़ (लगभग 82 प्रतिशत) केंद्र में सत्तारूढ़ भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) को प्राप्त हुए। शेष सभी दलों को मिलाकर लगभग ₹400 करोड़ (करीब 10 प्रतिशत) ही मिल पाए। कांग्रेस को ₹299 करोड़ मिले, जो कुल चंदे का 8 प्रतिशत से भी कम है।ये आंकड़े भारत की राजनीतिक फंडिंग में बढ़ते सत्ता-केंद्रीकरण की ओर स्पष्ट संकेत करते हैं।

चुनाव आयोग के पास उपलब्ध रिपोर्ट्स और पारदर्शिता का प्रश्न

20 दिसंबर तक उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार, चुनाव आयोग के पास पंजीकृत 19 में से केवल 13 इलेक्टोरल ट्रस्ट्स की रिपोर्ट्स उपलब्ध थीं, जिनमें से 9 ट्रस्ट्स ने सक्रिय रूप से 2024–25 में चंदा वितरित किया।यह स्थिति एक ओर कानूनी पारदर्शिता को दर्शाती है, तो दूसरी ओर यह सवाल भी खड़ा करती है कि शेष ट्रस्ट्स की निष्क्रियता या रिपोर्टिंग में देरी क्यों है। ये सभी आंकड़े चुनाव आयोग की वेबसाइट और सार्वजनिक मीडिया स्रोतों पर आधारित हैं।

इलेक्टोरल ट्रस्ट क्या हैं: अवधारणा, उत्पत्ति और उद्देश्य

इलेक्टोरल ट्रस्ट एक पंजीकृत गैर-लाभकारी संस्था होती है, जिसका उद्देश्य कॉर्पोरेट कंपनियों, समूहों और व्यक्तियों से प्राप्त चंदे को विधिसम्मत तरीके से राजनीतिक दलों तक पहुंचाना होता है। भारत में इस अवधारणा को 2013 में आयकर नियमों के तहत औपचारिक मान्यता दी गई।इन ट्रस्ट्स को इस शर्त पर मान्यता दी जाती है कि वे प्राप्त प्रत्येक रुपये का पूरा लेखा-जोखा रखें और नियमित रूप से चुनाव आयोग को रिपोर्ट सौंपें, ताकि राजनीतिक फंडिंग अज्ञात स्रोतों से न आए।

इलेक्टोरल ट्रस्ट्स की संरचना और कानूनी ढांचा-

इलेक्टोरल ट्रस्ट्स आयकर अधिनियम के तहत पंजीकृत होते हैं और सिद्धांततः किसी भी राजनीतिक दल से स्वतंत्र माने जाते हैं। इनके संचालन के लिए ट्रस्टी बोर्ड गठित होता है, जिसमें कॉर्पोरेट क्षेत्र के वरिष्ठ अधिकारी, कानूनी विशेषज्ञ और वित्तीय सलाहकार शामिल होते हैं।कानून के अनुसार, ट्रस्ट को प्राप्त कुल चंदे का कम से कम 95 प्रतिशत उसी वित्तीय वर्ष में राजनीतिक दलों को वितरित करना अनिवार्य है। ट्रस्ट स्वयं धन को संचित या निवेश नहीं कर सकता।

चुनाव आयोग को सौंपी जाने वाली रिपोर्ट्स का महत्व-

इलेक्टोरल ट्रस्ट्स की सबसे महत्वपूर्ण जिम्मेदारी चुनाव आयोग को विस्तृत वार्षिक रिपोर्ट सौंपना है। इन रिपोर्ट्स में यह स्पष्ट करना अनिवार्य होता है कि किससे कितना चंदा प्राप्त हुआ, किस दल को दिया गया और किस तिथि को दिया गया।इन रिपोर्ट्स के सार्वजनिक होने से पहली बार राजनीतिक दलों को मिलने वाले बड़े कॉर्पोरेट चंदे का एक औपचारिक और विश्लेषण योग्य रिकॉर्ड उपलब्ध हुआ।

इलेक्टोरल ट्रस्ट्स से जुड़े अप्रत्यक्ष लाभ और प्रभाव-

यद्यपि इलेक्टोरल ट्रस्ट्स गैर-लाभकारी संस्थाएं हैं, फिर भी इनके माध्यम से कॉर्पोरेट जगत को राजनीतिक दलों तक एक संगठित और अपेक्षाकृत सुरक्षित रास्ता मिलता है। ट्रस्ट्स राजनीतिक और कॉर्पोरेट जगत के बीच संवाद का मंच बन जाते हैं, जिससे नीति निर्माण पर अप्रत्यक्ष प्रभाव की संभावनाएं बढ़ती हैं।

अंतरराष्ट्रीय परिप्रेक्ष्य: भारत बनाम वैश्विक लोकतंत्र

अमेरिका, ब्रिटेन और जर्मनी जैसे देशों में राजनीतिक फंडिंग पर अधिक सख्त निगरानी और सीमाएं लागू हैं। कई देशों में कॉर्पोरेट चंदे पर कड़े प्रतिबंध हैं। भारत में इलेक्टोरल ट्रस्ट्स को एक मध्य मार्ग के रूप में देखा गया, लेकिन 2024–25 के आंकड़े दर्शाते हैं कि यह मॉडल भी सत्ता-संतुलन की समस्या से मुक्त नहीं है।

अतः अगर हम उपरोक्त पूरे विवरण का अध्ययन कर इसका विश्लेषण करें तो हम पाएंगे कि  पारदर्शिता से आगे जवाबदेही की आवश्यकता,इलेक्टोरल ट्रस्ट्स ने भारत में राजनीतिक चंदे को दस्तावेजीकृत और अपेक्षाकृत पारदर्शी अवश्य बनाया है। लेकिन सुप्रीम कोर्ट द्वारा इलेक्टोरल बॉन्ड पर रोक के बाद जिस प्रकार चंदे का बड़ा हिस्सा कुछ चुनिंदा दलों,विशेषकर सत्तारूढ़ पार्टी, की ओर केंद्रित हुआ है, वह लोकतंत्र के लिए गंभीर प्रश्न खड़े करता है।अब आवश्यकता केवल पारदर्शिता की नहीं, बल्कि जवाबदेही, संतुलन और समान अवसर की है। यदि इलेक्टोरल ट्रस्ट्स वास्तव में लोकतंत्र को मजबूत करना चाहते हैं, तो उन्हें कानूनी औपचारिकताओं से आगे बढ़कर राजनीतिक वित्तपोषण की नैतिकता पर भी खरा उतरना होगा।

संकलनकर्ता एवं लेखक-कर विशेषज्ञ स्तंभकार | साहित्यकार | अंतरराष्ट्रीय लेखक | चिंतक | कवि | संगीत माध्यमा | सीए (एटीसी) एडवोकेट किशन सनमुखदास भावनानी गोंदिया, महाराष्ट्र

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Author: Bharat Sarathi

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