सेवानिवृत्ति से पहले ‘दनादन फैसले’ : कार्यपालिका, न्यायपालिका और विधायिका में बढ़ता चलन

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संवैधानिक नैतिकता, संस्थागत विश्वसनीयता और लोकतांत्रिक भविष्य पर वैश्विक विमर्श

– एडवोकेट किशन सनमुखदास भावनानीं 

गोंदिया | वैश्विक लोकतांत्रिक शासन व्यवस्था में सत्ता का प्रयोग समय, नियम और उत्तरदायित्व से बंधा होता है। चाहे कार्यपालिका हो, न्यायपालिका या विधायिका—हर संवैधानिक संस्था का मूल उद्देश्य जनहित में निष्पक्ष, संतुलित और विवेकपूर्ण निर्णय लेना होता है। किंतु बीते कुछ वर्षों में एक चिंताजनक प्रवृत्ति उभरकर सामने आई है—सेवानिवृत्ति या कार्यकाल समाप्ति से ठीक पहले असामान्य रूप से बड़ी संख्या में फैसले और आदेश पारित करना।

मैं, एडवोकेट किशन सनमुखदास भावनानी, यह मानता हूँ कि यह प्रवृत्ति केवल भारत तक सीमित नहीं है, बल्कि विश्व की अनेक लोकतांत्रिक व्यवस्थाओं में इस पर गंभीर विमर्श चल रहा है। भारत में यह चलन अब महज़ प्रशासनिक अनुभव या लोककथाओं तक सीमित नहीं रहा, बल्कि सुप्रीम कोर्ट जैसी सर्वोच्च संवैधानिक संस्था ने स्वयं इस पर सार्वजनिक चिंता व्यक्त की है।

यह स्थिति न केवल संस्थागत नैतिकता पर प्रश्नचिह्न लगाती है, बल्कि निर्णयों की वैधता, निष्पक्षता और उनके दीर्घकालिक प्रभाव पर भी गंभीर संदेह उत्पन्न करती है।

कार्यपालिका में ‘रिटायरमेंट सिंड्रोम’ : फैसलों की अचानक बाढ़

भारत की कार्यपालिका—ग्राम स्तर के पटवारी कार्यालय से लेकर राज्य सचिवालय और केंद्रीय मंत्रालयों तक—एक जटिल नौकरशाही तंत्र पर आधारित है। अक्सर देखा गया है कि वर्षों से लंबित फाइलें किसी अधिकारी के रिटायरमेंट के अंतिम दिनों में असाधारण गति से निपटाई जाने लगती हैं।

यह स्थिति कई प्रश्न खड़े करती है—
क्या पहले निर्णय लेने की क्षमता नहीं थी?
क्या अंतिम समय में दबाव, निजी हित या जल्दबाज़ी हावी हो जाती है?
क्या यह धारणा बन गई है कि सेवानिवृत्ति के बाद जवाबदेही सीमित हो जाती है?

वैश्विक प्रशासनिक नैतिकता के सिद्धांत स्पष्ट करते हैं कि निर्णय की गुणवत्ता समय से नहीं, विवेक और उत्तरदायित्व से तय होनी चाहिए।

ग्राम स्तर से मंत्रालय तक ‘स्पीड गवर्नेंस’ का खतरा

भूमि रिकॉर्ड, नामांतरण, पट्टा वितरण जैसे मामलों में लिए गए जल्दबाज़ी के निर्णय दशकों तक सामाजिक, आर्थिक और कानूनी प्रभाव छोड़ते हैं। यही स्थिति जिला, राज्य और केंद्रीय स्तर पर भी देखने को मिलती है।

अंतरराष्ट्रीय प्रशासनिक अध्ययनों के अनुसार, लास्ट-मिनट डिसीजन-मेकिंग भ्रष्टाचार, पक्षपात और भविष्य के विवादों की संभावना को कई गुना बढ़ा देती है। इसी कारण विकसित देशों में सेवानिवृत्ति से पूर्व निर्णय-शक्ति सीमित या सामूहिक समीक्षा के अधीन रखी जाती है।

न्यायपालिका में ‘न्याय का अंतिम ओवर’ : संवैधानिक चिंता

न्यायपालिका लोकतंत्र का सबसे नैतिक स्तंभ मानी जाती है। न्यायाधीशों के फैसले केवल कानूनी विवाद नहीं सुलझाते, बल्कि समाज की नैतिक दिशा भी तय करते हैं। ऐसे में यदि सेवानिवृत्ति से ठीक पहले असामान्य संख्या में फैसले सुनाने की प्रवृत्ति बढ़े, तो यह गंभीर चिंता का विषय है।

हाल ही में सुप्रीम कोर्ट ने इस संदर्भ में टिप्पणी करते हुए कहा कि कुछ न्यायाधीश क्रिकेट मैच के अंतिम ओवर में छक्के मारने की तरह फैसले सुना रहे हैं। यह टिप्पणी एक गहरी संवैधानिक चेतावनी के रूप में देखी जानी चाहिए।

सुप्रीम कोर्ट का संदेश : अनुशासन सर्वोपरि

मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति सूर्यकांत तथा न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची और न्यायमूर्ति विपुल एम. पंचोली की पीठ ने स्पष्ट कहा कि रिटायरमेंट से पहले अत्यधिक आदेश पारित करने की प्रवृत्ति न्यायिक प्रणाली की गुणवत्ता और विश्वसनीयता को प्रभावित कर सकती है।

यह टिप्पणी मध्य प्रदेश के एक जिला न्यायाधीश से जुड़े मामले में आई, जिन्हें सेवानिवृत्ति से कुछ दिन पहले निलंबित किया गया था। कोर्ट ने सहानुभूति के बजाय संस्थागत अनुशासन को प्राथमिकता देते हुए संबंधित न्यायाधीश को हाईकोर्ट जाने का निर्देश दिया।

विधायिका में अंतिम क्षणों के कानून : ‘लैम-डक लेजिस्लेशन’

यह प्रवृत्ति विधायिका में भी देखी जाती है। कार्यकाल समाप्त होने से पहले अध्यादेशों और विधेयकों की बाढ़ को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर “Lame-Duck Legislation” कहा जाता है। अमेरिका, यूरोप और लैटिन अमेरिका में इसकी तीखी आलोचना हुई है, क्योंकि ऐसे कानून अक्सर पर्याप्त बहस और सार्वजनिक विमर्श के बिना पारित होते हैं।

संवैधानिक नैतिकता बनाम निर्णयों की जल्दबाज़ी

डॉ. भीमराव अंबेडकर ने कहा था कि संविधान तभी जीवित रहेगा जब उसे लागू करने वाले लोग नैतिक होंगे। यदि निर्णय व्यक्तिगत भविष्य, पदोन्नति या जवाबदेही से बचने की मानसिकता से प्रभावित हों, तो वे कानूनी रूप से वैध होते हुए भी नैतिक रूप से संदिग्ध बन जाते हैं।

अंतरराष्ट्रीय अनुभव और भारत के लिए सबक

ब्रिटेन, कनाडा, ऑस्ट्रेलिया और जर्मनी जैसे देशों में सेवानिवृत्ति से पहले कूलिंग-ऑफ पीरियड, सीमित अधिकार और अंतिम निर्णयों की विशेष समीक्षा की व्यवस्था है। भारत में भी ऐसे संस्थागत सुधार समय की मांग हैं।

निष्कर्ष : अंतिम ओवर नहीं, लंबी पारी का लोकतंत्र

लोकतंत्र किसी एक व्यक्ति की अंतिम पारी नहीं, बल्कि संस्थाओं की दीर्घकालिक विश्वसनीयता पर आधारित होता है। यदि सेवानिवृत्ति से पहले ‘दनादन फैसलों’ की प्रवृत्ति अनियंत्रित रही, तो यह शासन व्यवस्था की आत्मा को कमजोर कर देगी।

सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी केवल एक प्रकरण नहीं, बल्कि सभी संवैधानिक संस्थाओं के लिए आत्मचिंतन का आह्वान है।
समय आ गया है कि निर्णयों की संख्या नहीं, बल्कि उनकी गुणवत्ता, नैतिकता और दीर्घकालिक प्रभाव को प्राथमिकता दी जाए—ताकि लोकतंत्र अंतिम ओवर के छक्कों से नहीं, बल्कि संतुलित और जिम्मेदार खेल से जीता जाए।

संकलनकर्ता लेखक – क़र विशेषज्ञ स्तंभकार साहित्यकार अंतरराष्ट्रीय लेखक चिंतक कवि संगीत माध्यमा सीए(एटीसी) एडवोकेट किशन सनमुखदास भावनानी गोंदिया महाराष्ट्र

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Author: Bharat Sarathi

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