भारत की आध्यात्मिक पहचान और पवित्र शहर की अवधारणा-पंजाब मॉडल से राष्ट्रीय व वैश्विक दृष्टि तक

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सिख धर्म की ऐतिहासिक,धार्मिक और सांस्कृतिक चेतना के केंद्र तीन शहर अमृतसर की वाल्ड सिटी,श्री आनंदपुर साहिब और तलवंडी साबो पवित्र शहर का दर्जा घोषित

पवित्र शहर घोषित करना,एक राज्य की नीति नहीं,बल्कि भारत की आध्यात्मिक विरासत को आधुनिक प्रशासनिक ढाँचे के साथ जोड़ने का एक महत्वपूर्ण प्रयोग है

– एडवोकेट किशन सनमुखदास भावनानीं

गोंदिया – भारत को विश्व स्तरपर जिस पहचान ने सबसे अधिक प्रतिष्ठा दिलाई है, वह उसकी आध्यात्मिक चेतना, आस्था-आधारित जीवन-दृष्टि और धर्म, दर्शन व नैतिकता से जुड़ी सांस्कृतिक परंपरा है। प्राचीन काल से ही भारत केवल एक भौगोलिक इकाई नहीं रहा, बल्कि एक आध्यात्मिक सभ्यता के रूप में विकसित हुआ है, जहाँ जीवन के भौतिक पक्ष के साथ-साथ आत्मिक शुद्धता, संयम और नैतिक अनुशासन को सर्वोच्च स्थान दिया गया। इसी परंपरा के अंतर्गत देश के अनेक शहर, कस्बे और तीर्थ स्थल ऐसे रहे हैं जिन्हें केवल निवास या व्यापार के केंद्र के रूप में नहीं, बल्कि साधना, सेवा और सामाजिक शुद्धता के प्रतीक के रूप में देखा गया।वर्तमान वैश्विक दौर में, जब तीव्र शहरीकरण, उपभोक्तावाद और नशाखोरी सामाजिक ताने-बाने को कमजोर कर रहे हैं, तब पवित्र शहरों की अवधारणा केवल धार्मिक नहीं, बल्कि सामाजिक, प्रशासनिक और स्वास्थ्यगत दृष्टि से भी अत्यंत प्रासंगिक हो जाती है। आधुनिक शहरों में जीवन-शैली से जुड़ी बीमारियाँ, मानसिक तनाव, नशे की लत, अपराध और सामाजिक विघटन तेजी से बढ़ रहे हैं। ऐसे में भारत से यह अपेक्षा स्वाभाविक है कि वह अपनी आध्यात्मिक विरासत के आधार पर एक वैकल्पिक शहरी मॉडल प्रस्तुत करे, जहाँ विकास का अर्थ केवल आर्थिक वृद्धि न होकर सामाजिक शुद्धता, नैतिक अनुशासन और सार्वजनिक स्वास्थ्य से भी जुड़ा हो।

पवित्र शहर घोषित करने की अवधारणा : आस्था और प्रशासन का संगम

पवित्र शहर घोषित करने की पहल केवल धार्मिक भावनाओं की रक्षा का विषय नहीं है, बल्कि यह स्वच्छ प्रशासन, स्वस्थ समाज और नशा-मुक्त जीवन की ओर सामूहिक यात्रा का एक सशक्त माध्यम है। यह अवधारणा दर्शाती है कि आस्था को आधुनिक प्रशासनिक ढाँचे के साथ जोड़कर सामाजिक सुधार का प्रभावी मॉडल विकसित किया जा सकता है।इसी दृष्टि से पंजाब सरकार द्वारा तीन प्रमुख धार्मिक शहरों को पवित्र शहर घोषित करने का निर्णय राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर विशेष महत्व रखता है। यह निर्णय केवल प्रतीकात्मक नहीं है, बल्कि इसके साथ स्पष्ट नियम, प्रतिबंध, जिम्मेदारियाँ और प्रशासनिक ढाँचा भी निर्धारित किया गया है, जो इसे एक गंभीर और अनुकरणीय नीति बनाता है।

पंजाब मॉडल : घोषणा से कार्यान्वयन तक

पंजाब, जिसकी रूह में भक्ति की महक है और जिसकी गलियों में गुरु नानक देव जी की शिक्षाओं की गूंज सुनाई देती है, वहाँ धर्म और संस्कृति केवल पूजा-पाठ तक सीमित नहीं, बल्कि जीवन-शैली और सामाजिक पहचान का अभिन्न हिस्सा हैं। मुख्यमंत्री द्वारा 25 नवंबर 2025 को की गई घोषणा के बाद राज्यपाल की मंजूरी मिलने पर सरकार ने औपचारिक नोटिफिकेशन जारी किया, जिससे यह फैसला नीतिगत और प्रशासनिक रूप से प्रभावी हो गया।यह निर्णय यह स्पष्ट करता है कि पवित्र शहर घोषित करना केवल भावनात्मक या धार्मिक घोषणा नहीं, बल्कि सुविचारित प्रशासनिक प्रयोग है, जिसमें नियमों के पालन और निगरानी की स्पष्ट व्यवस्था की गई है।

तीन पवित्र शहर : ऐतिहासिक, धार्मिक और सांस्कृतिक केंद्र

पंजाब में जिन तीन शहरों को पवित्र शहर का दर्जा दिया गया है, वे हैं — अमृतसर की वाल्ड सिटी, श्री आनंदपुर साहिब और तलवंडी साबो। ये तीनों नगर सिख धर्म की ऐतिहासिक, धार्मिक और सांस्कृतिक चेतना के प्रमुख केंद्र रहे हैं।अमृतसर की वाल्ड सिटी, जहाँ श्री हरिमंदिर साहिब स्थित है, न केवल सिख समुदाय बल्कि पूरी दुनिया के लिए आध्यात्मिक समरसता, सेवा और समानता का प्रतीक है। श्री आनंदपुर साहिब खालसा पंथ की स्थापना से जुड़ा हुआ है और सिख इतिहास में विशेष स्थान रखता है। वहीं तलवंडी साबो, जिसे ‘गुरु की काशी’ कहा जाता है, गुरु गोबिंद सिंह जी के दीर्घकालीन निवास और धार्मिक शिक्षाओं का प्रमुख केंद्र रहा है।इन नगरों की धार्मिक गरिमा को बनाए रखने के लिए लंबे समय से संगत और धार्मिक संगठनों द्वारा इन्हें पवित्र शहर घोषित करने की मांग की जा रही थी, जिसे अब प्रशासनिक स्वरूप मिला है।

नशा-मुक्ति और सामाजिक स्वास्थ्य की दिशा में ठोस कदम

सरकार द्वारा पारित प्रस्ताव के अनुसार इन तीनों शहरों में शराब, मांस, तंबाकू तथा सभी प्रकार के नशीले पदार्थों की बिक्री और उपयोग पर पूर्ण प्रतिबंध लगाया गया है। यह निर्णय केवल धार्मिक अनुशासन तक सीमित नहीं है, बल्कि इसके दूरगामी सामाजिक और स्वास्थ्यगत प्रभाव हैं।नशा-मुक्त वातावरण से अपराध और हिंसा में कमी, सार्वजनिक स्वास्थ्य में सुधार, पारिवारिक स्थिरता और युवाओं के भविष्य की सुरक्षा की संभावनाएँ बढ़ती हैं। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी कई देशों में धार्मिक या सांस्कृतिक महत्व वाले क्षेत्रों में ऐसे प्रतिबंध लागू हैं, किंतु भारत जैसे विशाल और विविधतापूर्ण देश में इस प्रकार का स्पष्ट और व्यापक निर्णय विशेष महत्व रखता है।

स्वच्छता, सुरक्षा और धार्मिक पर्यटन का समन्वित विकास

पंजाब सरकार ने स्पष्ट किया है कि पवित्र शहर घोषित होने के बाद इन क्षेत्रों में सफाई, सुरक्षा, विकास और धार्मिक पर्यटन को बढ़ावा देने के लिए विशेष योजनाएँ लागू की जाएँगी। यह दर्शाता है कि सरकार पवित्रता को केवल निषेधात्मक नीति के रूप में नहीं, बल्कि सकारात्मक विकास मॉडल के रूप में देख रही है।स्वच्छता व्यवस्था को मजबूत करना, भीड़ प्रबंधन और ट्रैफिक कंट्रोल में सुधार, ऐतिहासिक गलियों और धार्मिक मार्गों का सौंदर्यीकरण — ये सभी कदम धार्मिक पर्यटन को सुव्यवस्थित, सुरक्षित और गरिमामय बनाने की दिशा में महत्वपूर्ण हैं।

प्रशासनिक अनुशासन और अवैध गतिविधियों पर नियंत्रण

पवित्र शहरों में अवैध पार्किंग, अतिक्रमण, अनधिकृत दुकानों और दलालों जैसी गतिविधियाँ अक्सर धार्मिक वातावरण को प्रभावित करती हैं। सरकार द्वारा इन पर सख्ती का संकेत यह दर्शाता है कि पवित्र शहरों की अवधारणा को भावनात्मक नहीं, बल्कि प्रशासनिक अनुशासन से जोड़ा गया है।सार्वजनिक स्थानों पर कचरा फैलाने, अव्यवस्थित पार्किंग और अनुशासनहीन व्यवहार पर नियंत्रण का उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि पवित्र शहर केवल नाम से नहीं, बल्कि व्यवहार और व्यवस्था के स्तर पर भी पवित्र दिखाई दें।

संतुलन और व्यावहारिकता:जीवन-विरोधी नहीं, जीवन-संवर्धक नीति

महत्वपूर्ण बात यह है कि सरकार ने दैनिक आवश्यकताओं से जुड़ी सेवाओं पर कोई अनावश्यक रोक नहीं लगाई है। फल, सब्जी, दूध, अनाज और अन्य आवश्यक वस्तुओं की दुकानों पर कोई प्रतिबंध नहीं होगा। स्थानीय निवासियों की सामान्य दिनचर्या और संगत के आवागमन को भी बाधित नहीं किया गया है।यह संतुलन दर्शाता है कि पवित्र शहर की अवधारणा को जीवन-विरोधी नहीं, बल्कि जीवन-संवर्धक दृष्टि से लागू किया गया है।

नोटिफिकेशन और विभागीय जिम्मेदारियाँ

जारी किए गए नोटिफिकेशन की एक विशेषता यह है कि इसमें विभिन्न विभागों की जिम्मेदारियाँ स्पष्ट रूप से तय की गई हैं। समग्र निगरानी की जिम्मेदारी जिले के डिप्टी कमिश्नर को सौंपी गई है, जिससे प्रशासनिक जवाबदेही सुनिश्चित होती है।एक्साइज विभाग को शराब से संबंधित प्रतिबंधों के सख्त पालन, सेहत विभाग को तंबाकू और अन्य नशीले पदार्थों पर नियंत्रण तथा पशुपालन विभाग को मांस संबंधी प्रतिबंध लागू कराने की जिम्मेदारी दी गई है। यह बहु-विभागीय दृष्टिकोण इस नीति की गंभीरता और प्रभावशीलता को दर्शाता है।

राष्ट्रीय परिप्रेक्ष्य-अन्य पवित्र नगरों के लिए मॉडल

पंजाब का यह मॉडल राष्ट्रीय स्तर पर भी अपनाए जाने योग्य है। भारत में काशी, अयोध्या, मथुरा, हरिद्वार, उज्जैन, द्वारका, पुरी, तिरुपति और मदुरै जैसे अनेक शहर हैं, जहाँ धार्मिक आस्था और जनजीवन गहराई से जुड़े हुए हैं। यदि पंजाब मॉडल की तरह स्पष्ट नियमों, विभागीय जिम्मेदारियों और संतुलित प्रतिबंधों के साथ इन शहरों को विकसित किया जाए, तो धार्मिक गरिमा के साथ-साथ स्वच्छता, स्वास्थ्य और सामाजिक अनुशासन को भी मजबूती मिलेगी।

अंतरराष्ट्रीय दृष्टि-भारत की सॉफ्ट पावर का विस्तार

अंतरराष्ट्रीय परिप्रेक्ष्य में यह मॉडल भारत की सॉफ्ट पावर को सुदृढ़ करता है। जब दुनिया भारत को केवल आर्थिक या तकनीकी शक्ति के रूप में नहीं, बल्कि नैतिक और आध्यात्मिक नेतृत्व देने वाले देश के रूप में देखेगी, तो उसकी वैश्विक छवि और प्रभाव दोनों बढ़ेंगे। धार्मिक पर्यटन के क्षेत्र में भी ऐसे शहर अधिक आकर्षण का केंद्र बनते हैं, जहाँ स्वच्छता, सुरक्षा और सांस्कृतिक अनुशासन सुनिश्चित हो।

अतःअगर हम उपरोक्त पूरे विवरण का अध्ययन कर इसका विश्लेषण करें तो हम पाएंगे कि आस्था और विकास का पूरक मॉडलपंजाब द्वारा तीन पवित्र शहर घोषित करने का निर्णय केवल एक राज्य की नीति नहीं, बल्कि भारत की आध्यात्मिक विरासत को आधुनिक प्रशासनिक ढाँचे के साथ जोड़ने का एक महत्वपूर्ण प्रयोग है। यह प्रयोग दर्शाता है कि आस्था और विकास एक-दूसरे के विरोधी नहीं, बल्कि परस्पर पूरक हो सकते हैं।यदि इस मॉडल को संवेदनशीलता, सख्ती और संतुलन के साथ लागू किया गया, तो यह न केवल पूरे भारत के लिए, बल्कि विश्व के उन समाजों के लिए भी प्रेरणास्रोत बन सकता है, जो आधुनिकता और आध्यात्मिकता के बीच सामंजस्य की तलाश में हैं।

-संकलनकर्ता / लेखक :वरिष्ठ विशेषज्ञ स्तंभकार, साहित्यकार, अंतरराष्ट्रीय लेखक, चिंतक, कवि,सीए (एटीसी),एडवोकेट किशन सनमुखदास भावनानी गोंदिया, महाराष्ट्र

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Author: Bharat Sarathi

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