बौद्धिक प्रदूषण और नशे के विरुद्ध सामाजिक उत्तरदायित्व -21वीं सदी की दो अदृश्य वैश्विक चुनौतियाँ

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बौद्धिक प्रदूषण और नशे के खिलाफ लड़ाई केवल पुलिस की जिम्मेदारी नहीं, एक सामाजिक युद्ध

“बौद्धिक प्रदूषण और नशे के खिलाफ़ लड़ाई वास्तव में समाज, परिवार, शिक्षा तंत्र, स्वास्थ्य संस्थान, मीडिया, धार्मिक–सांस्कृतिक समुदायों और शासन प्रणाली-इन सभी का संयुक्त युद्ध है।”

-एडवोकेट किशन सनमुखदास भावनानी

गोंदिया – वैश्विक स्तरपर 21वीं सदी वैश्विक स्तर पर मानव सभ्यता को विज्ञान, तकनीक, स्वास्थ्य, शिक्षा और पर्यावरण संरक्षण में अभूतपूर्व ऊँचाइयों पर लेकर जा रही है। किंतु इसी प्रगति के समानांतर दुनिया दो ऐसी ‘‘अदृश्य’’ और तेजी से बढ़ती चुनौतियों से जूझ रही है, जिनका प्रभाव विशेष रूप से युवाओं-यानी भविष्य के निर्माताओं पर अत्यंत गहरा पड़ रहा है। ये दोनों चुनौतियाँ हैं बौद्धिक प्रदूषण और नशा। जहाँ भौतिक पर्यावरणीय प्रदूषण के समाधान हेतु वैश्विक तंत्र, कानून, शोध और संसाधन अब भी लगातार मजबूत हो रहे हैं, वहीं बौद्धिक प्रदूषण और नशे के विरुद्ध सामाजिक उत्तरदायित्व उतनी सटीक गति से विकसित नहीं हो पा रहा है।मैं, एडवोकेट किशन सनमुखदास भावनानी, यह मानता हूँ कि जब प्रश्न मनुष्य की चेतना, विचार, मूल्य और मानसिकता के प्रदूषण का हो, तो उसका समाधान केवल तकनीक या कानून के दायरे में संभव नहीं होता। यह एक नैतिक, बौद्धिक, शैक्षिक और सांस्कृतिक हस्तक्षेप पर आधारित संघर्ष बन जाता है। यही कारण है कि बौद्धिक प्रदूषण एक ‘‘अदृश्य स्मॉग’’ की तरह मानव सभ्यता को भीतर से खोखला कर रहा है। दूसरी ओर नशा आज केवल स्वास्थ्य का संकट नहीं, बल्कि अर्थव्यवस्था, शिक्षा, परिवार, युवा संसाधन, सुरक्षा और राष्ट्रीय विकास पर बहुआयामी खतरा बन चुका है।

नशे को केवल कानून और पुलिस की समस्या मानना एक गंभीर भ्रम है। विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) के अनुसार नशे की जड़ों के 70 प्रतिशत कारण सामाजिक, पारिवारिक, सांस्कृतिक और मानसिक स्थितियों से जुड़े होते हैं, जबकि कानून केवल अंतिम चरण में हस्तक्षेप करता है। इसलिए नशे के विरुद्ध लड़ाई, मूलतः एक सामाजिक युद्ध है जिसमें प्रत्येक संस्था और हर नागरिक की भूमिका अनिवार्य है।

बौद्धिक प्रदूषण: 21वीं सदी का अदृश्य वैश्विक संकट

बौद्धिक प्रदूषण को सरल शब्दों में समझें तो यह वह स्थिति है, जब मनुष्य की समझ, विवेक, निर्णय-क्षमता, नैतिकता और तार्किकता गलत, भ्रमित, पूर्वाग्रहपूर्ण, उग्र, असत्य या प्रलोभनकारी विचारों से दूषित हो जाती है। यह प्रदूषण किसी फैक्ट्री या वाहन के धुएँ की तरह दिखाई नहीं देता, लेकिन इसका प्रभाव किसी भी भौतिक प्रदूषण से कहीं अधिक विनाशकारी है।

आज बौद्धिक प्रदूषण के प्रमुख वैश्विक स्रोत हैं-
फेक न्यूज, नफरत-आधारित प्रचार, उग्रवाद, कट्टर राष्ट्रवाद, नस्लीय विभाजन, गलत सूचना, षड्यंत्र सिद्धांत, दुष्प्रचार, हेट स्पीच, डिजिटल हेरफेर और सोशल मीडिया के एल्गोरिद्म द्वारा निर्मित ‘‘भ्रम का इकोसिस्टम’’।

इंटरनेट ने सूचना को लोकतांत्रिक बनाया, लेकिन उसी ने ‘‘अज्ञान’’ को भी संस्थागत रूप दे दिया। सत्य और असत्य के बीच की रेखाएँ धुंधली हो चुकी हैं। आज एक आम नागरिक के लिए तथ्य और भ्रम के बीच अंतर करना पहले से कहीं कठिन हो गया है। यही बौद्धिक धुंध मानव मन की तार्किक क्षमता, सामाजिक चेतना और लोकतांत्रिक सोच को अंदर से कमजोर कर रही है।

इतिहास भी यही बताता है कि सभ्यताएँ युद्धों से कम, बल्कि भीतर फैलते भ्रम, विभाजन, गलत विचारधाराओं और मानसिक प्रदूषण से अधिक नष्ट होती हैं। इसलिए बौद्धिक प्रदूषण आज एक ‘‘साइलेंट ग्लोबल पैंडेमिक’’ बन चुका है।

क्या बौद्धिक प्रदूषण का समाधान संभव है?

भौतिक प्रदूषण का समाधान तकनीक और कानून में निहित है, लेकिन बौद्धिक प्रदूषण का समाधान-
शिक्षा, चेतना, नैतिकता, तर्क, संवेदनशीलता, संवाद, पारदर्शिता और सामाजिक सुधार में है।

बौद्धिक प्रदूषण तब बढ़ता है जब—

  • समाज तर्क की जगह अंधानुकरण को अपनाता है,
  • शिक्षा ज्ञान की बजाय अंकों पर केंद्रित हो जाती है,
  • मीडिया सूचना की जगह सनसनी बेचता है,
  • तकनीक सत्य से अधिक भ्रम को प्राथमिकता देती है।

इसलिए समाधान बहुस्तरीय होना चाहिए-
समालोचनात्मक सोच, डिजिटल साक्षरता, वैज्ञानिक दृष्टिकोण, सत्य-आधारित संवाद, पारदर्शी मीडिया प्रथाएँ, विविधतापूर्ण सामाजिक समझ और बहु-सांस्कृतिक सम्मान।

बौद्धिक प्रदूषण किसी एक संस्था द्वारा नियंत्रित नहीं हो सकता। जब तक वैश्विक समाज ‘‘सत्य को एक मूल मान्यता’’ के रूप में स्वीकार नहीं करता, तब तक यह समस्या बनी रहेगी। विचारों की शुद्धता सभ्यता के संरक्षण की पहली शर्त है।

यदि मन प्रदूषित है तो प्रगति विनाश का कारण बन सकती है; लेकिन यदि विचार निर्मल हों, तो मानवता हर संकट का समाधान खोज सकती है।

नशे के खिलाफ लड़ाई-पुलिस नहीं, समाज की संयुक्त जिम्मेदारी

नशा एक वैश्विक महामारी है। यह किसी विशेष क्षेत्र, धर्म या वर्ग की समस्या नहीं, बल्कि समूची मानवता पर संकट है। आज नशे के स्वरूप अत्यंत व्यापक हो चुके हैं—
ड्रग्स, शराब, तंबाकू, सिंथेटिक नशीले पदार्थ, प्रिस्क्रिप्शन ड्रग्स का दुरुपयोग, ऑनलाइन गेमिंग, जुआ और डिजिटल एडिक्शन।

संयुक्त राष्ट्र (UNODC) के अनुसार हर वर्ष 3 करोड़ से अधिक लोग नशे से प्रभावित होते हैं और लाखों लोग इससे संबंधित बीमारियों, दुर्घटनाओं और अपराधों में अपनी जान गँवाते हैं।

नशा केवल ‘‘स्वास्थ्य समस्या’’ नहीं है। यह-

  • अपराध,
  • सीमा पार तस्करी,
  • आतंकवाद की फंडिंग,
  • घरेलू हिंसा,
  • रोड एक्सीडेंट,
  • आत्महत्या,
  • स्कूल ड्रॉपआउट,
  • बेरोजगारी,
  • आर्थिक हानि
    जैसे अनेक खतरों का मूल स्रोत बन चुका है।

सबसे बड़ा भ्रम यह है कि ‘‘नशा” एक कानूनी समस्या है।
वास्तव में नशा एक मनोवैज्ञानिक, सामाजिक और सांस्कृतिक संकट है।

पुलिस अपराध रोक सकती है, ‘‘आदत’’ नहीं।
कानून सजा दे सकता है, ‘‘मानसिकता’’ नहीं बदल सकता।
दंड भय पैदा करता है, ‘‘समाधान’’ नहीं।

नशे की जड़ें परिवारिक तनाव, टूटन, बेरोजगारी, अकेलापन, अवसाद, गलत संगत, असमानता और सामाजिक दबाव में छिपी होती हैं। इसलिए इसका समाधान दंड में नहीं, बल्कि-
शिक्षा, परामर्श, पुनर्वास, जागरूकता, भावनात्मक सहयोग, सामुदायिक हस्तक्षेप और सामाजिक उत्तरदायित्व में है।

समाज को नशे में फँसे व्यक्ति को ‘‘अपराधी’’ नहीं, बल्कि ‘‘रोगी’’ के रूप में देखने की आवश्यकता है। तभी पुनर्निर्माण का मार्ग खुल सकता है।

उपरोक्त पूरे विश्लेषण से स्पष्ट है कि

  • बौद्धिक प्रदूषण—मन और विचारों को नष्ट करता है;
  • नशा—शरीर, जीवन और भविष्य को नष्ट करता है।

एक सभ्यता को भीतर से गिराता है, दूसरा उसकी युवा शक्ति को खोखला कर देता है,और सबसे महत्वपूर्ण बात इन दोनों संकटों से केवल कानून या सरकार नहीं लड़ सकती।इस युद्ध का नेतृत्व समाज, शिक्षा प्रणाली, परिवार, समुदाय, मीडिया और प्रत्येक नागरिक को सामूहिक रूप से करना होगा।यदि विचार शुद्ध हों, शिक्षा जागरूक हो, मीडिया सत्यनिष्ठ हो और समाज उत्तरदायी हो,तो मानवता इन दोनों अदृश्य संकटों पर विजय पा सकती है।परंतु यदि हम मौन और उदासीन रहे, तो प्रगति के बावजूद सभ्यता का भविष्य सुरक्षित नहीं रहेगा।

– संकलनकर्ता लेखक – कर विशेषज्ञ | स्तंभकार | साहित्यकार | अंतरराष्ट्रीय लेखक | चिंतक | कविसंगीत माध्यमा | सीए (ATC) एडवोकेट किशन सनमुखदास भावनानी, गोंदिया, महाराष्ट्र

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Author: Bharat Sarathi

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