राजपूती शान का अद्भुत परिचय—घोड़े पर सवार होकर की निकासी, परंपरा और साहस का अनोखा संगम
राजपूती गौरव, साहस और परंपरा का सम्मोहक संगम—रोहिणी चौहान ने दिया अटूट शौर्य का संदेश।
घोड़े पर तलवार धारी निकासी ने रची अद्भुत मिसाल, बनवाड़ा रस्म बनी चर्चा का विषय।


हिसार – राजपूत समाज की शौर्यपूर्ण परंपराओं की झलक उस समय देखने को मिली जब चौहान परिवार की सुपुत्री रोहिणी चौहान ने विवाह-पूर्व आयोजित पारंपरिक ‘बनवाड़ा’ रस्म में पूरे राजसी अंदाज़ के साथ भाग लिया। घोड़े पर सवार, हाथ में तलवार, चेहरे पर आत्मविश्वास—रोहिणी का यह शौर्यपूर्ण रूप पूरे क्षेत्र में आकर्षण का केंद्र बना रहा।

ऐसा दृश्य सामान्यत: कम ही देखने को मिलता है, इसलिए राहगीरों, परिचितों और समाज के लोगों ने इस अनोखी परंपरा को बड़ी उत्सुकता से देखा और रोहिणी को खुलकर आशीर्वाद दिया। सभी ने उनके साहस, संस्कृति के प्रति सम्मान और परंपरा-पालन की प्रशंसा की।
परिवार ने इस समारोह को पूरी आस्था, विधि-विधान और उत्साह के साथ सम्पन्न किया। विवाह से पहले होने वाली यह रस्म कन्या को शुभ आशीष, संस्कारों और नए जीवन-प्रारंभ का प्रतीक मानी जाती है।
कार्यक्रम में परिवार के वरिष्ठ सदस्य दादा डॉ. एम.एस. चौहान, पिता सुशील चौहान, माता सीमा चौहान, और बहनें विदुषी एवं वैष्णवी पूर्ण पारंपरिक परिधान में शामिल हुए। परिजनों, रिश्तेदारों और समाज के गणमान्य लोगों की उपस्थिति ने कार्यक्रम को और अधिक गरिमामय व यादगार बना दिया।
विशेष:
इस अवसर पर सम्पन्न ‘बनवाड़ा’ रस्म ने राजपूत समाज की साहसिक विरासत, सांस्कृतिक गौरव, पारिवारिक एकजुटता और परंपरा के प्रति गहरी आस्था का प्रभावशाली उदाहरण प्रस्तुत किया—जिसे देखकर हर कोई गौरवान्वित महसूस करता रहा।








