राज्यों के लोक सेवा आयोगों में पारदर्शिता का संकट

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संवैधानिक संस्था होते हुए भी क्यों डगमगा रहा है भरोसा?

—डॉ. सत्यवान सौरभ

राज्य लोक सेवा आयोग (SPSC) भारतीय प्रशासनिक ढाँचे की वह संवैधानिक संस्था है, जिस पर राज्य सेवाओं में प्रतिभाशाली और योग्य अधिकारियों के चयन की जिम्मेदारी होती है। लेकिन पिछले एक दशक में इन आयोगों की साख पर गंभीर प्रश्न उठे हैं। पेपर लीक, मूल्यांकन त्रुटियाँ, राजनीतिक हस्तक्षेप, आरक्षण गणना में गड़बड़ी, भर्तियों में अनिश्चितता और अवसंरचनात्मक कमजोरियाँ इस बात का संकेत हैं कि आयोग अपनी मूल संवैधानिक भूमिका निभाने में संघर्ष कर रहे हैं। परिणामस्वरूप लाखों युवाओं का भरोसा लगातार कम हो रहा है।

सबसे बड़ी कमजोरी आयोगों की नियुक्ति प्रक्रिया में दिखती है। अध्यक्ष और सदस्यों की नियुक्ति के लिए योग्यता, अनुभव या पेशेवर विशेषज्ञता को लेकर कोई स्पष्ट मानदंड नहीं है। कई राज्यों में राजनीतिक समीकरण इन पदों पर भारी पड़ते हैं, जिससे निष्पक्षता की धारणा प्रभावित होती है। इसके विपरीत UPSC में स्थापित पेशेवर मानक उसकी विश्वसनीयता को मजबूती देते हैं।

दूसरी गंभीर चुनौती है अनियमित मानव संसाधन प्रबंधन। कई राज्यों में वर्षों तक अधियाचन नहीं भेजा जाता, भर्तियाँ रोक दी जाती हैं, या जारी अधिसूचनाएँ वापस ले ली जाती हैं। इससे न केवल रिक्त पद बढ़ते हैं, बल्कि युवाओं का भविष्य भी दांव पर लग जाता है। राज्यों में केंद्र की तरह कोई समर्पित कार्मिक मंत्रालय न होने के कारण आयोगों को नियमित परीक्षा कैलेंडर बनाए रखने में कठिनाई होती है।

अवसंरचना की कमी आयोगों की विफलताओं को और बढ़ा देती है। सुरक्षित प्रश्नपत्र भंडारण, एन्क्रिप्टेड डिजिटल सिस्टम, आधुनिक स्कैनिंग मशीनें और डेटा सुरक्षा तंत्र कई स्थानों पर अनुपस्थित हैं। इसी कारण पेपर लीक, ओएमआर गुम होने और तकनीकी गड़बड़ियों की घटनाएँ बार-बार सामने आती हैं। प्रश्नपत्र निर्माण और अनुवाद में त्रुटियाँ भी विवादों का बड़ा कारण हैं, क्योंकि आयोग सीमित विशेषज्ञ पैनल पर निर्भर रहते हैं।

मूल्यांकन प्रक्रिया में पारदर्शिता की कमी उम्मीदवारों की असंतुष्टि को बढ़ाती है। डिजिटल मूल्यांकन, दो-स्तरीय मॉडरेशन और एकसमान स्कोरिंग प्रणाली का अभाव चयन प्रक्रियाओं को अविश्वसनीय बनाता है। आरक्षण गणना की जटिलता के कारण मैनुअल त्रुटियाँ अक्सर पूरी भर्ती को अदालतों में उलझा देती हैं। परिणामों की देरी, तिथियों में बदलाव और साक्षात्कार प्रक्रिया का अनिश्चित रहना युवाओं में तनाव व अविश्वास पैदा करता है।

इन चुनौतियों के समाधान के लिए व्यापक सुधार आवश्यक हैं—

  • आयोग सदस्यों की नियुक्ति योग्यता-आधारित मानदंडों पर हो।
  • राज्यों में अलग कार्मिक मंत्रालय स्थापित किया जाए ताकि अधियाचन और भर्ती चक्र नियमित रहें।
  • परीक्षा प्रक्रिया का संपूर्ण डिजिटलीकरण—प्रश्नपत्र निर्माण से लेकर मूल्यांकन तक—अनिवार्य हो।
  • प्रश्नपत्र निर्माण में राष्ट्रीय स्तर के विशेषज्ञ जोड़े जाएँ और अनुवाद की गुणवत्ता सुनिश्चित की जाए।
  • आरक्षण गणना के लिए स्वचालित डिजिटल सॉफ़्टवेयर विकसित हों।
  • “भर्ती कैलेंडर अधिनियम” लागू किया जाए, जिसमें प्रत्येक चरण की समयसीमा तय हो।
  • आयोग का सचिव ऐसा वरिष्ठ अधिकारी हो, जिसे परीक्षा प्रबंधन का पेशेवर ज्ञान हो।
  • शिकायत समाधान के लिए स्वतंत्र डिजिटल पोर्टल बनाया जाए।

निष्कर्षतः, यदि राज्य लोक सेवा आयोगों को पारदर्शी, तकनीक-संचालित, उत्तरदायी और राजनीतिक हस्तक्षेप से मुक्त बनाया जाए, तो न केवल युवाओं का विश्वास लौटेगा बल्कि राज्य प्रशासन को भी सक्षम, ईमानदार और संवेदनशील अधिकारी मिलेंगे। सुधार ही आयोगों की साख और देश के प्रशासनिक भविष्य को बचा सकते हैं।

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Author: Bharat Sarathi

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