नेता व्यस्त–जनता पस्त: गुरुग्राम के अस्पताल पर राजनीति की दलदल और नेताओं की चुप्पी

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कांग्रेस–बीजेपी नेताओं की सांठ–गांठ के बीच जनता के हक़ का अस्पताल अब भी अधर में

गुरुग्राम: शहर की सबसे महत्वपूर्ण ज़रूरत – सरकारी अस्पताल – अब भी नेताओं की राजनीति और आपसी समीकरणों के बीच फँसा हुआ है। वर्ष 2016 में पुराना अस्पताल तोड़ दिया गया, लेकिन लगभग नौ साल बाद भी नया अस्पताल नींव से आगे नहीं बढ़ सका। लाखों लोगों को स्वास्थ्य सुविधा के लिए आज भी निजी अस्पतालों के भरोसे रहना पड़ रहा है।

कांग्रेस की दो दिन की भूख हड़ताल… आधे दिन में ही खत्म!

सरकारी अस्पताल निर्माण की मांग को लेकर कांग्रेस द्वारा घोषित दो दिन की भूख हड़ताल आधे दिन में ही अचानक समाप्त कर दी गई।
सबसे बड़ा सवाल यही है — बिना किसी ठोस आश्वासन के ये भूख हड़ताल इतने जल्द क्यों ख़त्म की गई?

चौंकाने वाली बात यह रही कि कांग्रेस का कोई भी बड़ा नेता वहाँ नहीं पहुँचा। सिर्फ खानापूर्ति करने जैसी उपस्थिति रही।
गुरुग्राम के कांग्रेस के सांसद उम्मीदवार राज बब्बर, विधायक उम्मीदवार मोहित ग्रोवर, मेयर उम्मीदवार सीमा पहुजा — कोई नहीं आया।
युवा कांग्रेस, NSUI, मजदूर संगठनों और SC सेल के पदाधिकारी भी नदारद रहे।

स्थानीय कार्यकर्ताओं का स्पष्ट आरोप है—
“जिला अध्यक्ष जिनके जिम्मे ये मुद्दे उठाने का दायित्व है, वे भी सिर्फ औपचारिकता निभाकर चले गए।”

**क्यों चुप रहते हैं कांग्रेस नेता?

क्या बीजेपी–कांग्रेस की ‘बैकडोर समझदारी’ वजह है?** स्थानीय लोग खुले तौर पर कह रहे हैं कि गुरुग्राम में कांग्रेस और बीजेपी नेताओं की आपसी समीकरण और सांठ–गांठ के चलते बड़े मुद्दे जानबूझकर नहीं उठाए जाते।
व्यापारिक हित, व्यक्तिगत संबंध और राजनीतिक आराम इन नेताओं के लिए जनता के मुद्दों से कहीं ज़्यादा महत्वपूर्ण हैं।

लोगों का कहना है— “कांग्रेसी नेता बीजेपी पर इसलिए नहीं बोलते क्योंकि दोनों के व्यापारिक और निजी हित जुड़े हैं। एक दूसरे के कार्यक्रमों में फोटो खिंचवाना ही इनकी राजनीति रह गई है।”

बीजेपी की लापरवाही भी भारी – 2016 से टूटा अस्पताल आज तक नहीं बना

सत्ताधारी बीजेपी की सुस्ती भी किसी से छिपी नहीं है। 2016 में अस्पताल गिराया गया, लेकिन तब से आज तक निर्माण का काम शुरू ही नहीं हुआ।

कुछ बीजेपी कार्यकर्ताओं ने भी माना— “बीजेपी में जनता की आवाज़ कौन उठाए? यहाँ पदाधिकारी या तो नेताओं की पसंद पर बनते हैं, या संघ प्रचारक और मीडिया हाउस के कहने पर। असली कार्यकर्ता तो किनारे कर दिए गए हैं।”

ऐसे में सवाल उठना स्वाभाविक है: “जब पार्टी के अंदर ही पर्ची–खर्ची का खेल है, तो सरकार कैसे दावा कर सकती है कि नौकरियाँ बिना सिफ़ारिश और पैसों के मिल रही हैं?”

राजनीति में जनता के मुद्दे गुम, रिश्ते और समीकरण हावी

आज के हालात यह साफ़ बताते हैं कि राजनीति पार्टियों और नेताओं के लिए जनता के मुद्दे प्राथमिकता नहीं रहे।
जनता स्वास्थ्य सुविधा के लिए तरस रही है, और नेता एक-दूसरे के कार्यक्रमों में फोटो खिंचवाने में व्यस्त हैं।

जनता बार-बार पूछ रही है— “हमारा अस्पताल कब बनेगा?”
लेकिन नेता या तो फोन नहीं उठाते या कहते हैं कि उनके पास जवाब नहीं है।

निष्कर्ष: जनता अब जागे, क्योंकि नेताओं के भरोसे कुछ नहीं बदलेगा

आज गुरुग्राम की स्थिति एक कड़वा सच सामने रखती है— जनता मुद्दों की बजाय जाति, पार्टी और चमक–दमक पर वोट देती है, और यही वजह है कि नेता जनता को गंभीरता से नहीं लेते।

इसलिए आज ज़रूरत है कि जनता खुद आगे आए, अपने अधिकारों के लिए सड़क पर उतरे, और नेताओं को जवाबदेह बनाए।

अस्पताल सिर्फ एक इमारत नहीं, यह गुरुग्राम की जनता के जीवन का सवाल है।
और जब तक जनता संगठित होकर आवाज़ नहीं उठाएगी, यह सवाल यूँ ही हवा में टंगा रहेगा।

Bharat Sarathi
Author: Bharat Sarathi

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