कमलेश भारतीय -पूर्व उपाध्यक्ष, हरियाणा ग्रंथ अकादमी

हाॅकी के खेल में इस ओलम्पिक में भारत की दोनों टीमों के शानदार परफार्मेंस से अभिभूत हमारे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जी ने तुरंत घोषणा की कि अब भारत खेल रत्न राजीव गांधी अवार्ड का नाम बदल कर इसे मेजर ध्यान चंद के नाम से दिया जाता करेगा । मेजर ध्यान चंद को हाॅकी का जादूगर कहा जाता था । उन्हें हिटलर तक ने अपने देश की ओर से खेलने की पेशकश की लेकिन ठुकरा दी । वे देश के लिए खेलते थे न कि अपनी बेहतरी के लिए । उनके बेटे अशोक कुमार ने भी हाॅकी स्टिक ही थामी और वे भी ओलम्पियन बने । कितनी बार अशोक कुमार ने अपने पिता मेजर ध्यान चंद को सम्मान दिलाने की ओर ध्यान दिलाया लेकिन सरकार टस से मस न हुई । अब अचानक हमारे प्रधानमंत्री जी ने जो दांव खेला वह आलोचना के दायरे में आ गया । न केवल कांग्रेस बल्कि आज तो शिवसेना के प्रवक्ता राज्यसभा सांसद संजय राउत ने भी आलोचना करते कहा और सामना में लिखा कि खेल रत्न का नाम बदलना राजनीतिक खेल है । उन्होंने यही कहा कि मेजर ध्यान चंद के नाम पर इसका नाम रखना लोगों की इच्छा नहीं बल्कि राजनीतिक खेल है । यह बात सामना के संपादकीय में लिखी है । उन्होंने यह सवाल भी किया कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का क्रिकेट में क्या योगदान है जो अहमदाबाद में स्टेडियम का नाम उनके नाम पर रखा गया है ?

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कहा की नाम बदलने के पीछे देशभर के नागरिकों का आग्रह है । इस आग्रह का सम्मान करते हुए खेल रत्न का नाम बदला गया है । वाह । अब सोशल मीडिया पर यह भी आ रहा है कि देश भर के नागरिकों का आग्रह है कि किसानों की मांगें स्वीकार करते हुए तीन कृषि कानून रद्द किये जायें तो प्रधानमंत्री जी इस आवाज़ को भी सुनिये । यह आवाज़ सात माह से आ रही है । दिल्ली के बाॅर्डरों पर किसान बैठे हैं लेकिन इतने निकट रहते भी प्रधानमंत्री जी को यह आवाज़ सुनायी क्यों नहीं देती ? क्यों ? एक फोन काॅल की दूरी पर कब तक बैठे रहोगे ? यूपी, पंजाब और उत्तराखंड के चुनाव तक फोन काॅल पर बैठे रहोगे ? इस तरह की मासूम चालाकियां लोग समझने लगे हैं ।

जब जब राहुल गांधी राजनीति में विपक्ष को एकजुट करने लगते हैं तब तब राबर्ट बाड्रा के केस की तारीखें अचानक निकल आती हैं । प्रियंका गांधी के यूपी दौरों के एकदम बीच राबर्ट बाड्रा के केस का जिक्र मीडिया में शुरू हो जाता है । यह राजनीतिक खेल राजनीति तक ठीक था लेकिन अब इसे राजनीति के साथ खेल में भी लपेट लिया । यह बहुत सुखद नहीं । इसीलिए तो दिल्ली क्रिकेट स्टेडियम के नाम से अरूण जेटली के नाम का संबंध क्या है पूछा जाने लगा है । यह रीत जो शुरू की है , कोई सौहार्द्र या सद्भावनापूर्ण नहीं कही जा सकती । कल और परियोजनाओं के नाम बदले जा सकते हैं । हरियाणा में इससे पहले सरकार राजीव गांधी सचिवालयों के नाम बदल चुकी है ।क्या वहीं से तो खेल रत्न का नाम बदलने की प्रेरणा नहीं मिली ? अब किसान आंदोलन या रसोई गैस व पेट्रोल डीज़ल के लिए क्या नागरिक मांग नहीं उठाते? तो फिर ये मांगें अनसुनी क्यों साहब ?

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