भारत सारथी/ऋषि प्रकाश कौशिक

गुरुग्राम। पिछले वर्ष के आरंभ से ही जनता कोरोना से त्राहि-त्राहि कर रही है, लोगों के रोजगार गए, खाने में दिक्कत आई, ऐसे समय में जनता का सत्ता पक्ष और विपक्ष दोनों की कार्यशैली से विश्वास उठ गया और इसी का लाभ उठा समाज में कुछ ऐसे लोग सक्रिय हुए जिनमें उच्च महत्वकांक्षा और किसी भी तरह नाम और पैसा कमाने की लालसा रही।
आपदा में अवसर तलाशे:
इस आपदाकाल में कुछ लोगों ने अवसर तलाशने शुरू किए और अनेक नए समाजसेवी उत्पन्न हुए। कुछ समाजसेवी तो ऐसे थे, जिनका कोरोना काल से पूर्व भी घर के खर्चे बामुश्किल पूरे होते थे, ऐसे में वह बन गए समाजसेवी।
वर्तमान में यह अममून देखा गया है कि अनेक लोगों से पूछो कि आप क्या करते हो तो उनका उत्तर होता है कि हम समाजसेवी हैं। ऐसा लगता है कि समाजसेवा धनोर्पाजन का साधन तो नहीं बन गया? वैसे कहा यह जाता है कि समाजसेवा समर्थ व्यक्ति ही कर पाता है, जिसके अपने घर में रोजी-रोटी की चिंता न हो, या तो उसका व्यवसाय चल रहा हो या वह कहीं जीविका उपार्जन के लिए नौकरी कर रहा हो। जिसके पास अपने लिए ही कुछ नहीं है, पहले वह अपने परिवार की सेवा करेगा या समाजसेवा? यही बड़ा प्रश्न है।
इस समय में अनेक लोगों ने अपने एनजीओ बना लिए और कुछ सरकार के माध्यम से, कुछ धर्मप्रेमियों, समाज के लिए दिल में दर्द रखने वाले लोगों या कुछ महत्वकांक्षी नेताओं की मदद से कोरोना पीडि़तों की सहायता का काम शुरू कर दिया। इस कार्य से वह सरकार के अधिकारियों, राजनेताओं और दानवीरों से मुलाकात कर पाए और इसका लाभ उन्हें समाज में उनका रूतबा बढऩे के रूप में मिला। यह प्रश्न अब भी खड़ा है कि जिनके अपने घर में सहायता की आवश्यकता थी, वह दूसरों की सहायता कर रहे थे तो उनका घर कैसे चला?
इतने से ही बस नहीं हुई। इसके बाद इनमें से कुछ ने कार्यक्रम कर कोरोना योद्धाओं को सम्मानित करना शुरू कर दिया और कार्यक्रम में अधिकारियों, नेताओं को आमंत्रित किया। इससे इनका समाज में यह संदेश गया कि यह व्यक्ति तो बड़ी ऊंची पहुंच रखता है। सभी नेताओं और अधिकारियों से इसके संबंध हैं और यही बात यह चाहते थे। इसमें कुछ को पूर्ण कामयाबी मिली तो कुछ आधी-अधूरी कामयाबी मिली लेकिन कुछ न कुछ मिला सबको।
अब इस प्रकार स्थापित होने पर इन लोगों ने नया काम आरंभ कर दिया, जिसे वर्तमान भाषा में लाइजनिंग कहते हैं और आपको समाज में अनेक लोग लाइजनिंग करने वाले मिल जाएंगे। अब बात करें लाइजनिंग की, यह होता क्या है तो अनेक लोगों से बात करने पर ज्ञात हुआ कि कोई भी काम शासन-प्रशासन से कराना हो तो यह लोग भाग-दौड़कर और अपने संबंधों से करा कर देते हैं। इसकी एवज में ये हमसे धन ले लेते हैं, जिसमें यह कहते हैं कि यह धन काम कराने की एवज में अधिकारियों को दिया जाता है और कुछ यह अपने आने-जाने का खर्चे के रूप में ले लेते हैं। इन बातों को देख-सुनकर कम से कम मुझे ऐसा लगा कि अंग्रेजी का नाम लाइजनिंग देकर यह पुराना नाम दलाल या दलाली जैसा काम करते हैं।
आजकल समाचारों में आमतौर पर पढऩे को मिल जाता होगा कि अमुक-अमुक संस्था ने कार्यक्रम कर विधायक को सम्मानित किया या किसी अधिकारी, उपायुक्त, पुलिस उपायुक्त आदि को उनके कार्यालय जाकर सम्मानित कर आए। अब प्रश्न यह है कि जैसा मेरा और शायद समाज का सोचना है कि सम्मानित करने वाले का सम्मान सम्मानित होने वाले से अधिक होता है तो प्रश्न उठता है कि यह एनजीओ वाले इन अधिकारियों से अधिक सम्मानित हैं, क्या इनमें इतनी समझ है कि वह इनके कार्यों पर नजर रख उसका अच्छा-बुरा समझ सकें?
वर्तमान परिस्थितियों में लगभग गुरुग्राम की अधिकांश जनता जिला प्रशासन की कार्यशैली से संतुष्ट नजर नहीं आती। इसके भी कारण हैं कि अभी चंद दिन पूर्व हुई मानसून की पहली बारिश ने गुरुग्राम को जिस बदहाल स्थिति में देखा गया, वह इसके पूर्व शायद कभी नहीं देखा गया होगा। गुरुग्राम के हजारों घरों में पानी भर गया। लोगों के बैड तक उसमें डूब गए और वर्तमान में बैड बॉक्स रूपी होते हैं और उनमें सामान भी भरा होता है तो उनकी मेहनत की कमाई से कमाया हुआ सामान खराब हो गया। उससे पूर्व कोरोना काल में भी प्रशासन की कार्यशैली से जनता कभी खुश नजर नहीं आई।
अभी दो दिन पूर्व गृह व स्थानीय निकाय मंत्री अनिल विज ने नगर निगम का निरीक्षण किया और कहकर गए कि यहां बहुत कमियां हैं, बहुत सुधार की आवश्यकता है। उससे पूर्व मुख्यमंत्री कष्ट निवारण समिति की बैठक में आए थे और तब मुख्यमंत्री भी कहकर गए अधिकारियों से कि कुछ काम जनता और जनप्रतिनिधियों के कहने पर भी कर दिया करो, मेरे आने का इंतजार मत किया करो तो इन बातों से स्पष्ट हो रहा है कि प्रशासन की कार्यशैली से जनता और मंत्री प्रसन्न नहीं हैं। कुछ जनता के लोगों से तो यह भी सुना गया है कि जो हमारा बरसात से नुकसान हुआ है, उसका मुआवजा प्रशासन या सरकार को देना चाहिए। पटौदी में तो व्यापारियों ने आज ज्ञापन भी दिया है। इन बातों से स्पष्ट दिखाई दे रहा है कि वर्तमान में जनता प्रशासन से संतुष्ट नहीं है। ऐसे समय में समाचार आता है कि एनजीओ वाला उपायुक्त के कार्यालय में जाकर उपायुक्त को सम्मानित करके आया है।
प्रश्न यह है कि जिले के शीर्ष अधिकारी जिनकी जिम्मेदारी सारे समाज को देखने की होती है, वह सम्मानित होने के मोह में इन लोगों की जांच क्यों नहीं कराते? यही प्रश्न राजनेताओं पर भी खड़ा होता है कि जिस व्यक्ति के कार्यक्रम में वह जा रहे हैं क्या उस व्यक्ति की इतनी प्रतिष्ठा है कि वहां जाने पर आपकी प्रतिष्ठा पर आंच न आए?
बड़ा सवाल यह है कि क्या ये अधिकारी और नेता जिनके कामों में यह भी शुमार है कि वह समाज में अवसरवादी, उच्च महत्वकांक्षी लोगों द्वारा समाज का शोषण न होने दें या समाज को भ्रमित न होने दें तो वह अपना काम कब करेंगे?