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लघु कहानी : कामिनी, डा. सुरेश वशिष्ठ

Nov 22, 2020

कामिनी

सलोनी और मासूम लड़की थी कामिनी । सुंदर मुख, फैली केशराशि, लंबी नाक और भूरी आंखें । चेहरे पर मुस्कान और शरारती नजरें । उसके पास से जो भी गुजरता वह गहराई से उसे देखती और नकल उतारने लगती । खिलखिला कर हँसती और दोनों हथेलियों से मुंह छुपाकर व्यंग वाक्य फेंक देती ।     

 एक रोज, रिक्शे से वह बाजार जा रही थी । रिक्शे वाले को चुहल करती वह छेड भी रही थी । भीड़ के कारण रिक्शा थोड़ा धीमा हुआ । एक मोटा तोदियल जोड़ा उसके रिक्शे से सटकर निकलने लगा ।  कामिनी उन्हें देखकर अपनी हँसी नहीं रोक पाई और खिलखिला कर हँसने लगी । तोदियल जोडी को खीज हुई । व्यक्ति कूढ गया। चिढ़कर वह पूछने लगा, “मुझे देखकर हंस क्यों रही हो ?” 

        “ऐसे ही ।…तुम्हारा पेट देखकर हंसी आ गई ।”        

  पीछे उसकी पत्नी थी । रिक्शे के हैडिल का सहारा लेकर जब वह सामने आई तो उसे देखकर भी कामिनी जोर-जोर से हंसने लगी और चुुहक करने लगी । वह भी अपने पति की तरह तोदियल थी । उसने तपाक से आंखें तरेरी और कहा– “दांत फाड़ने के अलावा कोई दूसरा काम नहीं तुझे ?”

 “हँसने से पेट छोटा होता है और वह मैं कर रही हूं । आप भी ऐसे ही खिलखिलाया करो, कंंच हो जाओगी ।”          

  दोनों पति-पत्नी इस शरारती लड़की को गुस्से की नजर से देखते हुए निकल गए । कामिनी का रिक्शा भी आगे बढ़ने लगा । बाजार से उसे जल्दी घर पहुंचना था । उसकी अम्मा उसे तीन बार फोन भी कर चुकी थी । वह उसे बता चुकी थी कि उसे देखने कोई आने वाला है, सो जल्दी घर लौटना है ।                 

  रास्ते में, उसकी एक नटखट सहेली उसे मिल गई । उसने हाथ पकड़कर उसे भी रिक्शा में बैठा लिया था । दोनों ने बाजार से छोटा-मोटा सामान खरीदा, चुहलबाजी की और घर लौटने लगे । इस बीच मां का कई बार फोन फिर से आ चुका था । वह उसे जल्दी घर लौट आने की हिदायत बार-बार दे रही थी । सो, पुन: रिक्शा लिया और घर के लिए चल पडी ।       

  मामा की किसी रिश्तेदारी में उसके विवाह की बात चल रही थी । वे लोग अचानक घर आ पहुँचे थे । माँ को जल्दी थी, इसीलिए घर आने को बार-बार कह रही थी ।         

 खैर ! रिक्शा घर की तरफ बढ़ रहा था । रास्ते में उसने अपनी सखि को उतारा और फिर सामान को सहेजकर ठीक से गोद में रख लिया । उसका मन आशंकित होने लगा । वह सोचने लगी–“कैसे होंगे वे लोग, उनका बेटा कैसा होगा ? ससुराल कैसी होगी और अनेक प्रश्न दिमाग में कौधने लगे थे । तारीफ तो उसने बहुत सुनी थी । आज उन्हें सामने से देख भी पाएगी । इसी आशंका और  खुशी में वह आगे बढ़ रही थी ।  रिक्शे वाले को बार-बार तेेज चलाने को भी कह रही थी ।    

 रिक्शा घर के सामने आकर रुक गया । कामिनी ने रिक्शे वाले को पैसे दिए और सामान समेटकर घर में घुस गई । सोच रही थी, ‘मां बहुत गुस्सा होगी । काफी देर से वे लोग बैठे हैं, क्या सोचते होंगे ।… जिसे देखने आए, वही गायब है ।…हे राम ।’       

 घर में घुसी तो हठात् ! वह चौंक गई ।… वहीं दंपत्ति–तोदियल,  जिन्हें देखकर उसने चुहल की थी । सामने सोफे पर बैठे हैं । उसे करन्ट-सा छू गया । नव-आगंतुकों की आंखें भी उसे देखकर फटी की फटी रह गई ।

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