पंखों की उड़ान अभी बाकी है

-कमलेश भारतीय

ये तो आज चला है न कि बेटी बचाओ , बेटी पढ़ाओ । आप सोचो लगभग स्वतंत्रता के बिल्कुल शुरू में कौन कहता था कि बेटी पढ़ाओ ? कोई नहीं । अगर याद आए तो याद कीजिए कि लड़कियों की पढ़ाई मुश्किल से प्राइमरी या फिर मैट्रिक तक । उसके बाद घर की चारदीवारी मे सिलाई मशीन या कढ़ाई बुनाई । फिर एक दूल्हे की तलाश और बात खत्म । मेरी मां आठवीं तक पढ़ी थीं और यह मेरी नानी बहुत बड़ी उपलब्धि मानती थी । मेरी बुआएं भी कम ही शिक्षा पा सकीं । एक ने जेबीटी तक की और नौकरी भी की । दूसरी घर ही रहीं और सिलाई करती रहतीं । मैं उनके पास बैठा मशीन का हैंडल घुमा कर मदद करता । आज वक्त बदल गया । लड़कियों के लिए शिक्षा के द्वार खुले हैं और वे अपने मन की उड़ान भर सकती हैं ।

फिर भी सत्तर साल पहले चंडीगढ़ के पंजाब यूनिवर्सिटी के पॉलिटिकल साइंस के प्रोफेसर जे सी आनंद ने अपनी तीन बेटियों को उच्च शिक्षा दिलाई और तीनों ने हर आयु में नये नये कीर्तिमान बनाये । तीनों बहनों के नाम हैं : केशनी आनंद अरोड़ा, मीनाक्षी आनंद चौधरी और उर्वशी गुलाटी । तीनों ने पहले आईएएस बन कर कीर्तिमान बनाया और फिर हरियाणा के मुख्य सचिव के पद तक पहुंच कर इतिहास रचा । यह कीर्तिमान किसी भी प्रदेश के लिए बहुत गौरव और गर्व का विषय हो सकता है । मुझे इस परिवार में से श्रीमती उर्वशी गुलाटी के निकट होने का सुअवसर मिलता रहा । वे जब भी अपने पद के हिसाब से किसी केस की जांच के लिए हिसार आतीं तो जरूर मुलाकात का समय निकालतीं । एक बार तो केनाल रेस्ट हाउस में औपचारिक मुलाकात के दौरान सिंचाई विभाग और नहरों की ऐसी जानकारी दी कि मेरी इस बारे में रिपोर्ट प्रकाशित होने पर संपादक विजय सहगल भी चौंक गये । फिर उन्होंने चंडीगढ़ बुला कर मुझसे केशनी आनंद अरोड़ा की इंटरव्यू भी करवाई ।

वे उन दिनों हरियाणा के बिजली विभाग की सचिव थीं । दोनों बहनों में जो बात काॅमन रही वह यह कि टाइम की पाबंदी और अपने विभाग की जानकारी टिप्स पर । मैं केशनी जी के दिये गये समय से कुछ लेट पहुंचा तो हंस कर कहने लगीं कि मैंने आपकी इंतज़ार में चाय भी लेट कर ली । फिर मैंने बताया कि अब मैं चंडीगढ़ मे पोस्टिड नहीं हूं । मुझे सेक्रेटेरियट पहुंचने मे कुछ दिक्कत आई । बस । फिर वे नार्मल हुईं और बहुत गहरी जानकारी दी विभाग के बारे में । बाद में उर्वशी गुलाटी जी व हेमंत अत्री मेरे पत्रकार मित्र राज्य सूचना आयुक्त लग गये और मैं भी खुशकिस्मती से हरियाणा ग्रंथ अकादमी का उपाध्यक्ष बना । हमारी पत्रिका कथा समय इनके ऑफिस के निकट ही सेक्टर आठ में संपादित होती थी और मैं लंच के समय उर्वशी जी को फोन लगाता और वे एक सुलझी व अनुभवी महिला होने के नाते मेरे उनके ऑफिस में पहुंचने से पहले भी लंच लायक कुछ मंगवा चुकी होतीं । हेमंत भी आ जाते और खूब साहित्य चर्चा होती । वे साहित्य से बहुत गहरे तक जुड़ी हैं ।

खैर । जो कीर्तिमान इन तीनों बहनों ने बनाये वे किसी भी परिवार के लिए ही गर्व का विषय नहीं बल्कि हरियाणा भर के लिए गर्व और गौरव की बात है । मध्यवर्गीय परिवारों की सपने देखने वाली लड़कियों के लिए बहुत प्रेरणाप्रद कहानी की तरह । यहां मुझे वरिष्ठ आईएएस महिला अधिकारी व हिसार की उपायुक्त रहीं श्रीमती दीप्ति उमाशंकर भी याद आ रही हैं जो आजकल अम्बाला कमिश्नरी की आयुक्त हैं । उनसे पूछा था कि आईएएस बनने के लिए कितनी मेहनत की ? तब उन्होंने मुस्कुरा कर बताया था कि कोई लड़की अपने बालों से कितना प्रेम करती होगी पर मैं अपने बालों को संवारना भूल ही गयी थी और ये किसी बाबा की तरह जटायें बन गये थे । मैं तैयारी मे इतना डूब गयी थी । यह है मंत्र कुछ बनने का । बस भूल जाओ । बस जो बनना है उस पर अर्जुन की तरह चिड़िया की आंख पर नज़र रखो ।

इन तीन बहनों की कहानी से प्रेरणा लेकर लड़कियां अपना मकसद पा सकती हैं और मकसद तय भी कर सकते हैं ।
हौंसले की उड़ान अभी बाकी है
पंखों की उड़ान अभी बाकी है,,,

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