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श्रम अधिकारों के हनन के खिलाफ एआईयूटीयूसी ने विरोध ऐलान किया

मंडन मिश्रा   

 भिवानी :  सरकार की मजदूर-विरोधी नीतियों, रोजगार पर हमलों और श्रम अधिकारों के हनन के खिलाफ एआईयूटीयूसी ने 1 से 7 अक्तूबर 2020 तक एक सप्ताह भर विरोध कार्यक्रम का ऐलान किया है।

इस दौरान प्रदेश में एआईयूटीयूसी से जुड़ी तमाम यूनियनें जिनमें मिड-डे-मील, आशा, आंगनवाड़ी, आदि स्कीम वर्कर, औद्योगिक श्रमिक, दिहाङीदार, असंगठित क्षेत्र के श्रमिक, निर्माण मजदूर, कच्चे व  ठेका के कर्मचारी, मनरेगा मजदूर अपनी ज्वलंत मांगों को लेकर जिला स्तर पर धरना-प्रदर्शनों के माध्यम से सरकार को ज्ञापन देंगे। वे सरकार की मजदूर-विरोधी नीतियों और निर्णयों के खिलाफ अपना प्रतिवाद दर्ज कराएंगे। इसके तहत रेलवे व अन्य सरकारी क्षेत्र, बैंक व अन्य वित्तीय संस्थानों, बिजली, कोयला, पेट्रोलियम, स्टील व अन्य सार्वजनिक उद्यमों-उपक्रमों व सेवाओं के निजीकरण, भवन निर्माण, मनरेगा सहित असंगठित क्षेत्र के श्रमिकों, प्रवासी श्रमिकों व स्कीम वर्करों की समस्याओं और श्रम कानूनों में मालिक-परस्त संशोधन कर चार लेबर कोड पारित करने के खिलाफ व काम के अधिकार के लिए आवाज बुलंद की जाएगी।   

    श्रमिक नेता हरिप्रकाश ने कहा कि केंद्र व राज्य सरकार एक पर एक मजदूर कर्मचारी विरोधी नीतियां और निर्णय लेती ही जा रही हैं। रेलवे, बैंक, बीमा, कोयला, बिजली, प्रतिरक्षा, पेट्रोलियम, बीएसएनएल (दूरसंचार), शिक्षा, स्वास्थ्य आदि सार्वजनिक या सरकारी उद्यमों, उपक्रमों व सेवाओं का निजीकरण-निगमीकरण कर इनको देसी-विदेशी पूंजीपतियों के लिए खोल दिया है। देशभर में ट्रेड यूनियनों और मज़दूर-कर्मचारियों के विरोध के बावजूद पारित किए गए चार लेबर कोड श्रम कानून मज़दूरों के हड़ताल करने व ट्रेड यूनियन बनाने के अधिकारों तथा सामाजिक सुरक्षा के अधिकारों पर बेरहम हमला हैं। बड़े कष्टों से हासिल किए गए जनवादी अधिकारों व ट्रेड यूनियन अधिकारों को छीन कर सरकार श्रमिकों को निहत्थे कर रही है। यह मजदूरों का निर्मम शोषण और जब चाहे मनमानी छंटनी करने यानी ‘हायर एण्ड फायर’ का अधिकार मालिकों को दे दिया है।

कोरोना महामारी की आड़ में लगभग सभी श्रम कानूनों को अगले 1000 दिनों के लिए सस्पेंड कर दिया है। कार्य दिवस 8 घंटे से बढ़ाकर 12 घंटे कर रही है। कर्मचारियों को जबरन रिटायर करने के लिए 55 वर्ष की उम्र या 30 वर्ष की नौकरी का बेतुका आधार बनाया गया है। नौकरी की कोई सुरक्षा नहीं है। पेन्शन स्कीम पहले ही रद्द कर दी थी। डीए और डीआर भी फ्रीज कर दिया है। स्कीम वर्करों को न तो सरकारी कर्मचारी का दर्जा दिया जाता है, न ही 21000 रुपये प्रतिमाह न्यूनतम वेतन। निर्माण श्रमिकों के पंजीकरण व हितलाभ देने की प्रक्रिया जटिल कर दी है। कारीगर-मजदूर के कार्य संबंधी तस्दीक कराने जैसी नाजायज शर्तें थोप दी हैं। इसी तरह संसद में ज़ोर-जबरदस्ती से किसान-विरोधी विधेयक पारित कर दिए हैं जिनके खिलाफ किसान सड़कों पर हैं। सरकार हर तरह के प्रतिवाद और विरोधी आवाज को दबा रही है। सरकार ये घोर मजदूर-विरोधी कदम इनके आका पूंजीपतियों व कारपोरेट घरानों को खुश करने के लिए उठा रही हैं।

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