विधान परिषद चुनावों ने बढ़ाया विपक्ष का उत्साह, लेकिन विधानसभा की लड़ाई में संगठन और गठबंधन की होगी असली परीक्षा
राजेश श्रीवास्तव

भारतीय जनता पार्टी को घेरने के लिए विपक्ष लगातार अपनी रणनीति धारदार बनाने में जुटा है। महंगाई, रोजगार और चुनावी पारदर्शिता जैसे सवालों के बीच उत्तर प्रदेश तथा महाराष्ट्र के विधान परिषद चुनावों ने इस राजनीतिक बहस को नई दिशा दी है। सवाल उठ रहा है कि क्या भाजपा के प्रभाव वाले मतदाता समूहों में बदलाव के संकेत दिखाई देने लगे हैं? क्या विपक्ष का दबाव चुनावी परिणामों में भी बदल रहा है? इन सवालों का जवाब तलाशते समय उत्साह और वास्तविकता के बीच अंतर करना जरूरी है।
उत्तर प्रदेश विधान परिषद की ११ सीटों पर हुए चुनावों में भाजपा ने छह और समाजवादी पार्टी ने पांच सीटें जीती हैं। पिछली बार के मुकाबले भाजपा की कुल संख्या छह पर बनी रही, जबकि सपा तीन से बढ़कर पांच पर पहुंच गई। इसलिए इन परिणामों को भाजपा की व्यापक पराजय कहना सही नहीं होगा। हालांकि सपा की बढ़ी हुई ताकत और लखनऊ स्नातक सीट पर उसकी जीत भाजपा के लिए समीक्षा का विषय जरूर हैं। वाराणसी की शिक्षक और स्नातक सीटों पर भी सपा ने अपना कब्जा बनाए रखा है।
इन चुनावों का राजनीतिक महत्त्व इसलिए भी है कि इनमें शिक्षक और स्नातक मतदाता भाग लेते हैं। फिर भी इस सीमित मतदाता वर्ग को पूरे शिक्षित समाज का प्रतिनिधि अथवा किसी एक दल का स्थायी समर्थक मान लेना उचित नहीं होगा। प्रत्याशी की व्यक्तिगत पकड़, शिक्षक संगठनों की भूमिका, स्थानीय संपर्क और मतदाता पंजीकरण जैसे तत्व भी परिणामों को प्रभावित करते हैं। लिहाजा विधान परिषद के नतीजों से सीधे विधानसभा चुनाव का निष्कर्ष निकालना जल्दबाजी होगी।
भाजपा के सामने चुनौती यह जरूर है कि विपक्ष इन परिणामों को उसके प्रभावशाली राजनीतिक केंद्रों में चुनौती के रूप में प्रस्तुत कर रहा है। लखनऊ और वाराणसी जैसे नाम किसी भी चुनावी बहस को प्रतीकात्मक महत्त्व दे देते हैं। लेकिन राजनीतिक प्रतीक और निर्वाचन क्षेत्र की वास्तविक स्थिति अलग-अलग समझनी होगी। किसी क्षेत्र की शिक्षक या स्नातक सीट का परिणाम वहां की सभी विधानसभा सीटों के रुझान का प्रमाण नहीं होता।
महाराष्ट्र में भी विपक्षी महाविकास अघाड़ी ने विधान परिषद की पांच में से तीन सीटें जीतीं, जबकि सत्तारूढ़ महायुति को दो सीटें मिलीं। कांग्रेस ने नागपुर स्नातक सीट बरकरार रखी और शरद पवार के नेतृत्व वाली राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी ने पुणे तथा छत्रपति संभाजीनगर की स्नातक सीटें जीतीं। दूसरी ओर भाजपा को पुणे शिक्षक सीट पर सफलता मिली। इन परिणामों ने विपक्ष को राजनीतिक संबल दिया है, लेकिन यहां भी तस्वीर एकतरफा नहीं है।
ऐसे परिणाम सत्तारूढ़ दल के लिए आत्ममंथन का अवसर होते हैं। लंबे समय तक सत्ता में रहने के बाद संगठन की सक्रियता, कार्यकर्ताओं की सुनवाई और स्थानीय शिकायतों के समाधान का महत्त्व बढ़ जाता है। केवल राष्ट्रीय नेतृत्व की लोकप्रियता के भरोसे हर स्तर का चुनाव नहीं जीता जा सकता। मतदाता सरकार के व्यापक दावों के साथ अपने रोजमर्रा के अनुभवों का भी आकलन करता है।
उत्तर प्रदेश में भाजपा की बढ़ती संगठनात्मक सक्रियता को इसी संदर्भ में देखा जा सकता है। लखनऊ में प्रदेश कार्यसमिति की बैठक में अमित शाह ने संगठन को मजबूत करने पर जोर दिया। उनके प्रदेश के सभी १८ मंडलों में कार्यक्रमों की तैयारी की खबरें भी सामने आई हैं। इससे संकेत मिलता है कि पार्टी २०२७ के विधानसभा चुनाव को गंभीरता से लेते हुए कार्यकर्ताओं को सक्रिय करना चाहती है।
हालांकि केंद्रीय नेतृत्व की सक्रियता को केवल योगी आदित्यनाथ के साथ राजनीतिक प्रतिस्पर्धा या भावी जीत का श्रेय बांटने की कोशिश मान लेना अनुमान होगा। संगठनात्मक तैयारी और नेतृत्व के बीच कथित खींचतान दो अलग विषय हैं। पर्याप्त प्रमाण के बिना दोनों को जोड़ने से राजनीतिक विश्लेषण कमजोर होता है। भाजपा के लिए वास्तविक कसौटी यह होगी कि उसका केंद्रीय नेतृत्व, प्रदेश सरकार और स्थानीय संगठन चुनावी मैदान में कितना प्रभावी समन्वय बना पाते हैं।
इसी तरह यह धारणा भी प्रमाणहीन है कि भाजपा ने चुनाव आयोग पर उठते सवालों को शांत कराने के लिए जानबूझकर कुछ सीटें हारी होंगी। किसी दल की जीत या हार अपने आप में चुनावी प्रक्रिया की निष्पक्षता का अंतिम प्रमाण नहीं होती। चुनाव आयोग से जुड़े सवालों की जांच प्रक्रियाओं, दस्तावेजों और ठोस साक्ष्यों के आधार पर होनी चाहिए।
राष्ट्रीय स्तर की तस्वीर भी भाजपा के पूरी तरह घिर जाने के निष्कर्ष का समर्थन नहीं करती। पश्चिम बंगाल के २०२६ विधानसभा चुनाव में भाजपा ने २०७ सीटें जीतकर बड़ी सफलता हासिल की है। यह परिणाम बताता है कि एक राज्य अथवा सीमित निर्वाचन क्षेत्रों में सामने आई चुनौती को पूरे देश में पार्टी के पतन का संकेत नहीं माना जा सकता। अलग-अलग राज्यों में राजनीतिक परिस्थितियां और मतदाताओं की प्राथमिकताएं अलग होती हैं।
दूसरी ओर समाजवादी पार्टी के लिए भी इन परिणामों का संदेश केवल उत्सव मनाने का नहीं है। पांच सीटों की जीत कार्यकर्ताओं का मनोबल बढ़ा सकती है, लेकिन विधानसभा में बहुमत के लिए कहीं व्यापक सामाजिक समर्थन और मजबूत संगठन चाहिए। यदि उत्साह आत्मसंतोष में बदल गया तो यही उपलब्धि आगे की तैयारी में बाधा बन सकती है।
सपा और कांग्रेस के संभावित चुनावी तालमेल की गुणवत्ता भी महत्त्वपूर्ण होगी। सीटों के बंटवारे से आगे बढ़कर स्थानीय कार्यकर्ताओं के बीच सहयोग, साझा अभियान और मतों का वास्तविक हस्तांतरण सुनिश्चित करना होगा। सहयोगी दलों के बीच अविश्वास या सार्वजनिक खींचतान रही तो उसका लाभ सत्तारूढ़ पक्ष को मिल सकता है। हालांकि अभी से गठबंधन की सफलता या विफलता तय कर देना उचित नहीं होगा।
इस समय भाजपा के सामने कुछ स्पष्ट चुनौतियां हैं और विपक्ष को कुछ महत्त्वपूर्ण सफलताएं मिली हैं। लेकिन चौतरफा राजनीतिक दबाव और सत्ता गंवाने की स्थिति एक ही बात नहीं हैं। उत्तर प्रदेश में २०२७ का चुनाव दोनों पक्षों की परीक्षा लेगा। भाजपा को अपने संगठन और शासन के प्रति भरोसा मजबूत करना होगा, जबकि विपक्ष को यह साबित करना होगा कि वह चुनावी उत्साह को विश्वसनीय विकल्प में बदल सकता है।








