कच्चे कर्मचारियों के नियमितीकरण पर सरकार की कथनी और करनी में अंतर : विद्रोही

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नियमितीकरण के मामले में सर्वोच्च न्यायालय जाने की कथित तैयारी पर उठाए सवाल

स्थायी और अस्थायी कर्मचारियों से अपने हितों के लिए एकजुट होने का आह्वान

चंडीगढ़/रेवाडी, 28 अक्टूबर। स्वयंसेवी संस्था ग्रामीण भारत के अध्यक्ष वेदप्रकाश विद्रोही ने हरियाणा सरकार पर कर्मचारी विरोधी नीतियां अपनाने का आरोप लगाया है। जारी बयान में उन्होंने कहा कि एक ओर हरियाणा कौशल रोजगार निगम के माध्यम से नियुक्त कर्मचारियों को 58 वर्ष की आयु तक रोजगार सुरक्षा देने का प्रचार किया जा रहा है, वहीं दूसरी ओर कच्चे कर्मचारियों के नियमितीकरण के मामले में सरकार सर्वोच्च न्यायालय जाने की तैयारी कर रही है। उन्होंने इसे सरकार की कथनी और करनी में अंतर बताया।

विद्रोही ने कहा कि तत्कालीन भूपेंद्र सिंह हुड्डा सरकार ने वर्ष 2014 में कच्चे कर्मचारियों को नियमित करने के लिए अधिसूचनाएं जारी की थीं, जिनके तहत हजारों कर्मचारियों की सेवाएं नियमित हुईं। उनके अनुसार, वर्ष 2014 में सत्ता में आने के बाद भाजपा सरकार ने वर्ष 2015 में इन नियमितीकरण नीतियों पर रोक लगा दी। इससे नियमित हो चुके कर्मचारियों और आगे पात्रता पूरी करने वाले कर्मचारियों में नौकरी को लेकर अनिश्चितता पैदा हुई।

उन्होंने आरोप लगाया कि सरकार ने इन नीतियों के पक्ष में प्रभावी पैरवी नहीं की और मई 2018 में उच्च न्यायालय ने संबंधित अधिसूचनाएं रद्द कर दीं। विद्रोही ने दावा किया कि सर्वोच्च न्यायालय ने 16 अप्रैल 2026 को दिए फैसले में 16 और 18 जून 2014 की नीतियों को वैध ठहराया, जिससे विभिन्न विभागों में वर्षों से कार्यरत कच्चे कर्मचारियों के नियमितीकरण का रास्ता खुला।

विद्रोही ने सवाल उठाया कि जब सर्वोच्च न्यायालय इन नीतियों को वैध मान चुका है तो सरकार को कर्मचारियों को नियमितीकरण का लाभ देने में क्या आपत्ति है। उन्होंने कहा कि लंबे समय से सेवा दे रहे कर्मचारियों को स्थायी रोजगार उपलब्ध कराने के लिए सरकार को कदम उठाने चाहिए।

हरियाणा कौशल रोजगार निगम की व्यवस्था पर सवाल उठाते हुए विद्रोही ने आरोप लगाया कि जिन पदों पर नियमित भर्ती होनी चाहिए, उन्हें अनुबंध के आधार पर भरा जा रहा है। उनके मुताबिक, इससे युवाओं की आर्थिक सुरक्षा और भविष्य प्रभावित होता है।

बिजली वितरण के निजीकरण के मुद्दे का उल्लेख करते हुए उन्होंने आरोप लगाया कि गुरुग्राम और नूंह में निजी कंपनियों को अनुज्ञप्ति देने की पहल भी सरकार की इसी नीति का हिस्सा थी। उन्होंने दावा किया कि कर्मचारियों के विरोध के कारण यह कदम फिलहाल टला है।

विद्रोही ने प्रदेश के स्थायी और अस्थायी कर्मचारियों से अपने अधिकारों के लिए एकजुट होने का आह्वान किया। उन्होंने कहा कि कर्मचारियों, किसानों और व्यापारियों को सरकारी नीतियों का अपने हितों पर पड़ने वाला प्रभाव परखना चाहिए और चुनावों में समर्थन देने से पहले उसका मूल्यांकन करना चाहिए।

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Author: Bharat Sarathi

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