15 अक्टूबर को विश्व छात्र दिवस विशेष : अंकों की होड़ में कहीं खो तो नहीं रहा सीखने का मकसद

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राजेश जैन

शिक्षा किसी देश का भविष्य गढ़ती है, लेकिन जब शिक्षा का मकसद अच्छे अंक, ऊंची रैंक और प्रतिष्ठित संस्थान में दाखिले तक सिमट जाए तो उसके उद्देश्यों पर सवाल उठना स्वाभाविक है। भारत में विद्यार्थियों के सामने आज यही चुनौती है। उनसे बेहतर प्रदर्शन की अपेक्षा की जाती है लेकिन क्या शिक्षा व्यवस्था उन्हें स्वतंत्र सोचने, अपनी रुचि पहचानने और असफलता से उबरने का पर्याप्त अवसर देती है? क्या हम ज्ञानवान पीढ़ी तैयार कर रहे हैं या परीक्षा में सफल होने वाले विद्यार्थी?

15 अक्टूबर को विश्व छात्र दिवस पर इन सवालों से मुंह नहीं मोड़ा जा सकता। पूर्व राष्ट्रपति डॉ. एपीजे अब्दुल कलाम की जयंती से जुड़ा यह दिन विद्यार्थियों की क्षमताओं, उनके सपनों और देश के भविष्य पर विचार करने का अवसर है। कलाम विद्यार्थियों में बड़े सपने देखने और उन्हें पूरा करने का विश्वास जगाते थे। लेकिन सपनों की चर्चा तभी सार्थक है, जब उन्हें पूरा करने के लिए जरूरी अवसर भी उपलब्ध हों। केवल प्रेरणा से शिक्षा की बुनियादी समस्याएं दूर नहीं होंगी।

शिक्षा का पैमाना केवल परीक्षा क्यों?

भारतीय शिक्षा व्यवस्था में परीक्षा का महत्व असंदिग्ध है। सीमित सीटों और बड़ी संख्या में अभ्यर्थियों के बीच चयन के लिए प्रतियोगी परीक्षाओं की जरूरत से इनकार नहीं किया जा सकता। समस्या परीक्षा से नहीं बल्कि उसे शिक्षा का अंतिम उद्देश्य बना देने से है। अंकों और रैंक की होड़ में विषय की समझ, जिज्ञासा और रचनात्मकता पीछे छूटने लगती हैं।

अच्छे अंक हासिल करना और किसी विषय को गहराई से समझना एक ही बात नहीं है। शिक्षा की गुणवत्ता इस बात से भी तय होनी चाहिए कि विद्यार्थी सीखी हुई जानकारी का इस्तेमाल कैसे करता है, किसी समस्या पर कितना तार्किक विचार करता है और नए सवाल उठाने का कितना साहस रखता है। यदि विद्यार्थी का मूल्यांकन केवल सही उत्तर देने की क्षमता से होगा, तो उसकी स्वतंत्र सोच को विकसित करने की गुंजाइश सीमित रह जाएगी।

प्रतियोगिता जरूरी हो सकती है, लेकिन उसे विद्यार्थी की पूरी पहचान नहीं बनना चाहिए। किसी परीक्षा में मिली रैंक उसकी एक उपलब्धि है, उसकी संपूर्ण योग्यता का प्रमाणपत्र नहीं।

तकनीक ने अवसर दिए, ध्यान भी छीना

विद्यार्थियों की चुनौतियां अब कक्षा और परीक्षा कक्ष तक सीमित नहीं हैं। मोबाइल फोन और सोशल मीडिया ने जानकारी तक पहुंच आसान की है लेकिन लगातार मिलने वाले नोटिफिकेशन, छोटे वीडियो और ऑनलाइन मनोरंजन एकाग्रता को प्रभावित कर सकते हैं। कुछ मिनट के लिए खोला गया मोबाइल कब पढ़ाई के लंबे समय को निगल जाता है, इसका पता भी नहीं चलता।

सोशल मीडिया पर दूसरों की उपलब्धियां देखकर अपनी तुलना करना भी विद्यार्थियों के आत्मविश्वास को प्रभावित कर सकता है। ऐसे में पूरी जिम्मेदारी विद्यार्थी पर डालना उचित नहीं होगा। डिजिटल मंचों की कार्यप्रणाली भी उपयोगकर्ता को अधिक समय तक जोड़े रखने के लिए बनाई जाती है।

जरूरत तकनीक से दूरी बनाने की नहीं, उसके विवेकपूर्ण इस्तेमाल की है। परिवारों और शिक्षण संस्थानों को विद्यार्थियों में समय प्रबंधन और डिजिटल साक्षरता विकसित करनी होगी। उन्हें यह समझना होगा कि ऑनलाइन उपलब्ध हर जानकारी सही नहीं होती और हर आकर्षक सामग्री उनके समय के योग्य नहीं होती।

रोजगार की तैयारी कहां है?

शिक्षा का एक प्रमुख उद्देश्य युवाओं को आत्मनिर्भर बनाना है। इसके लिए केवल डिग्री हासिल करना पर्याप्त नहीं। विद्यार्थी को व्यावहारिक ज्ञान, संवाद कौशल, तकनीकी दक्षता और समस्याओं का समाधान खोजने की क्षमता भी चाहिए। यदि पढ़ाई के दौरान इन क्षमताओं के विकास पर पर्याप्त ध्यान नहीं दिया जाता, तो शिक्षा और रोजगार के बीच दूरी बनी रह सकती है।

इसका अर्थ डिग्री की उपयोगिता को नकारना नहीं है। सवाल यह है कि क्या पाठ्यक्रम बदलती अर्थव्यवस्था और कामकाज की जरूरतों के अनुरूप हैं? क्या विद्यार्थियों को वास्तविक परियोजनाओं, इंटर्नशिप, प्रयोगशालाओं और उद्योगों से जुड़ने के पर्याप्त अवसर मिलते हैं?

शिक्षा को नौकरी पाने का माध्यम मानना स्वाभाविक है लेकिन इसे केवल नौकरी तक सीमित करना दूरदर्शिता नहीं होगी। तकनीक के बदलते स्वरूप में वही युवा बेहतर ढंग से आगे बढ़ सकेंगे, जिनमें लगातार सीखने और नए अवसर तलाशने की क्षमता होगी। उद्यमिता और स्वरोजगार के रास्तों को भी शिक्षा व्यवस्था में उचित स्थान मिलना चाहिए।

एआई से आसान हुई पढ़ाई, लेकिन समझ की परीक्षा बाकी

आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस विद्यार्थियों को कठिन विषय समझने, भाषा का अभ्यास करने और अपनी गलतियां पहचानने में मदद कर सकता है। लेकिन तकनीक से उत्तर हासिल कर लेना ज्ञान हासिल करने के बराबर नहीं है। एआई की जानकारी में त्रुटियां हो सकती हैं। यदि विद्यार्थी बिना जांचे उसके उत्तर स्वीकार करने लगे, तो सुविधा उसकी स्वतंत्र सोच को कमजोर कर सकती है।

इस दौर में शिक्षक की भूमिका और महत्वपूर्ण हो जाती है। शिक्षक का काम केवल जानकारी देना नहीं, बल्कि विद्यार्थी को सही सवाल पूछना, तथ्यों की पुष्टि करना और तर्क के आधार पर निष्कर्ष निकालना सिखाना भी है। शिक्षण संस्थानों को एआई के जिम्मेदार इस्तेमाल के स्पष्ट नियम बनाने चाहिए। तकनीक का उपयोग सीखने के लिए हो, अपनी समझ के स्थान पर तैयार उत्तर पेश करने के लिए नहीं।

इसके साथ यह भी देखना होगा कि आधुनिक तकनीक का लाभ किन विद्यार्थियों तक पहुंच रहा है। जिनके पास अच्छे उपकरण, इंटरनेट और मार्गदर्शन उपलब्ध नहीं हैं, वे पीछे छूट सकते हैं। तकनीक तभी शिक्षा में समानता लाएगी, जब उसकी पहुंच आर्थिक रूप से कमजोर विद्यार्थियों तक भी सुनिश्चित होगी।

असफलता का डर शिक्षा की विफलता न बने

प्रतियोगी परीक्षाओं में सीमित सीटों के लिए बड़ी संख्या में विद्यार्थी प्रयास करते हैं। ऐसे में सभी का चयन संभव नहीं है। फिर भी सामाजिक और पारिवारिक अपेक्षाएं कई बार परीक्षा के परिणाम को जीवन की सफलता से जोड़ देती हैं। वर्षों की मेहनत, परिवार का खर्च और भविष्य की चिंता विद्यार्थी पर दबाव बढ़ा सकते हैं।

यहां परिवार और शिक्षण संस्थानों की जिम्मेदारी महत्वपूर्ण हो जाती है। बच्चों की तुलना दूसरों से करना और हर बातचीत को अंकों या रैंक तक सीमित कर देना उनके आत्मविश्वास को नुकसान पहुंचा सकता है। संस्थानों को भी केवल सफल विद्यार्थियों के आंकड़ों से अपनी उपलब्धियां तय करने के बजाय उन विद्यार्थियों की समस्याओं पर ध्यान देना चाहिए, जिन्हें कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है। जरूरत के समय प्रशिक्षित परामर्शदाताओं की सहायता उपलब्ध होनी चाहिए।

असफलता को न तो महिमामंडित करने की जरूरत है, न उसे जीवन का अंत मानने की। उसे सुधार और नए विकल्प तलाशने का अवसर समझना चाहिए। विद्यार्थी का सम्मान किसी एक परीक्षा के परिणाम पर निर्भर नहीं हो सकता।

समान अवसर के बिना प्रतिभा का विकास अधूरा

भारत में शिक्षा की सबसे बड़ी चुनौतियों में अवसरों की असमानता भी शामिल है। एक विद्यार्थी को अच्छे स्कूल, अनुभवी शिक्षक, आधुनिक प्रयोगशाला और डिजिटल संसाधन मिलते हैं, जबकि दूसरे के लिए पुस्तकें, इंटरनेट और पढ़ाई का अनुकूल वातावरण जुटाना भी कठिन हो सकता है। ऐसी परिस्थितियों में केवल परिणामों की तुलना करके प्रतिभा का आकलन करना न्यायसंगत नहीं होगा।

प्रतिभा किसी खास शहर या आर्थिक वर्ग तक सीमित नहीं है। उसे विकसित करने के अवसर जरूर असमान हो सकते हैं। इसलिए सरकारी स्कूलों में गुणवत्तापूर्ण शिक्षण, शिक्षकों की उपलब्धता, पुस्तकालयों, प्रयोगशालाओं और छात्रवृत्तियों पर गंभीरता से काम करना होगा। आर्थिक रूप से कमजोर विद्यार्थियों को प्रवेश दिलाना ही पर्याप्त नहीं, उन्हें आगे बढ़ने के लिए जरूरी सहायता भी मिलनी चाहिए।

समान अवसर का अर्थ सभी को एक जैसी सुविधा देना भर नहीं है। जिन विद्यार्थियों की परिस्थितियां अधिक बाधाएं पैदा करती हैं, उनके लिए अतिरिक्त सहायता की व्यवस्था भी जरूरी है। शिक्षा तभी सामाजिक असमानता कम करने का प्रभावी माध्यम बन सकती है।

सवाल पूछने वाला विद्यार्थी ही आगे बढ़ेगा

शिक्षा व्यवस्था में बदलाव का अर्थ केवल पाठ्यक्रम में नए विषय जोड़ना या परीक्षा के तरीके बदलना नहीं है। कक्षा में सवाल पूछने की स्वतंत्रता, प्रयोग करने का अवसर और गलतियों से सीखने का वातावरण भी उतना ही जरूरी है। यदि तय उत्तर से अलग सोचने वाले विद्यार्थी को हतोत्साहित किया जाएगा, तो रचनात्मकता के विकास की उम्मीद कैसे की जा सकती है?

मूल्यांकन में अंकों का महत्व बना रह सकता है, लेकिन समझ, तर्कशक्ति, व्यावहारिक ज्ञान और रचनात्मकता को भी स्थान मिलना चाहिए। साथ ही समाज को सफलता की अपनी परिभाषा पर पुनर्विचार करना होगा। हर विद्यार्थी आईआईटी, मेडिकल या आईआईएम जैसे प्रतिष्ठित संस्थान का छात्र नहीं बनना चाहता। विज्ञान, कला, खेल, शोध, तकनीकी कौशल और उद्यमिता जैसे क्षेत्रों में भी देश के विकास की व्यापक संभावनाएं हैं।

विश्व छात्र दिवस का संदेश केवल विद्यार्थियों को बड़े सपने देखने की प्रेरणा देना नहीं है। असली कसौटी यह है कि शिक्षा व्यवस्था उन सपनों को पूरा करने के लिए कितनी तैयार है। सरकार को गुणवत्तापूर्ण शिक्षा और समान अवसर सुनिश्चित करने होंगे, शिक्षकों को जिज्ञासा को प्रोत्साहित करना होगा, अभिभावकों को अपेक्षाओं और बच्चों की क्षमताओं में संतुलन बनाना होगा और संस्थानों को परीक्षा परिणामों से आगे बढ़कर सीखने की गुणवत्ता पर ध्यान देना होगा। डॉ. एपीजे अब्दुल कलाम विद्यार्थियों की क्षमता पर भरोसा करते थे। उस भरोसे को सार्थक करने के लिए प्रेरक भाषणों से आगे बढ़ना होगा। देश का भविष्य केवल अंकों और रैंक से तय नहीं होगा। असली सवाल यह है कि शिक्षा विद्यार्थियों को कितना सक्षम, विवेकशील और स्वतंत्र विचार वाला नागरिक बना रही है।

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Author: Bharat Sarathi

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