असहमति, शांतिपूर्ण प्रदर्शन और स्वतंत्र पत्रकारिता के प्रति सत्ता का व्यवहार तय करता है लोकतंत्र की मजबूती
डॉ. शैलेश शुक्ला

लोकतंत्र की वास्तविक परीक्षा केवल चुनाव जीतने में नहीं, बल्कि सत्ता में आने के बाद असहमति को स्वीकार करने में होती है। बहुमत किसी सरकार को नागरिकों की आवाज दबाने, आलोचकों को शत्रु समझने या प्रशासनिक शक्तियों से विरोध समाप्त करने का अधिकार नहीं देता। लोकतंत्र की आत्मा अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता, शांतिपूर्ण सभा, निष्पक्ष चुनाव और सरकार की जवाबदेही में बसती है। जब विरोध पर रोक शासन का सामान्य तरीका बनने लगे, तब यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि क्या लोकतांत्रिक व्यवस्था में तानाशाही की प्रवृत्तियां बढ़ रही हैं।
दिल्ली में 10 अक्टूबर 2026 को प्रस्तावित प्रदर्शन के आसपास हुई व्यापक पुलिस कार्रवाई ने इसी प्रश्न को फिर सामने ला दिया है। यह बहस किसी एक संगठन की मांगों से सहमति या असहमति तक सीमित नहीं है। मूल प्रश्न यह है कि नागरिक अपनी शिकायत लेकर सार्वजनिक स्थान पर किस हद तक जुट सकते हैं और उन्हें रोकने के लिए राज्य की शक्ति का इस्तेमाल किन परिस्थितियों में उचित माना जाएगा।
विरोध और व्यापक रोक
रॉयटर्स की 10 अक्टूबर की रिपोर्ट के अनुसार, दिल्ली में दो हजार से अधिक प्रदर्शनकारियों को हिरासत में लिया गया। कॉकरोच जनता पार्टी के प्रस्तावित प्रदर्शन को रोकने के लिए भारी सुरक्षा व्यवस्था की गई। मध्य दिल्ली के कुछ हिस्सों में मोबाइल इंटरनेट सेवाएं निलंबित हुईं और अनेक मेट्रो स्टेशन तथा बाजार बंद किए गए। प्रदर्शनकारी मुख्य निर्वाचन आयुक्त ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की मांग कर रहे थे।
आंदोलन का प्रमुख मुद्दा मतदाता सूचियों का विशेष गहन पुनरीक्षण है। आंदोलनकारियों और विपक्षी दलों का आरोप है कि इस प्रक्रिया में पात्र मतदाता भी बाहर हुए और इससे चुनावी निष्पक्षता प्रभावित हो सकती है। निर्वाचन आयोग ने पक्षपात के आरोपों को खारिज किया है और गलत तरीके से हटे मतदाताओं के दोबारा नाम जुड़वाने की बात कही है। भाजपा भी चुनावी प्रक्रिया पर लगाए जा रहे आरोपों का विरोध करती रही है।
इन परस्पर विरोधी दावों के बीच जरूरी है कि तथ्य और राजनीतिक निष्कर्ष अलग रखे जाएं। मतदाता सूची में सुधार आवश्यक है, लेकिन पात्र नागरिक का नाम हटने की शिकायत भी गंभीर है। ऐसी शिकायतों का उत्तर अभिलेख, स्पष्ट प्रक्रिया और समयबद्ध समाधान से दिया जाना चाहिए। आरोप अपने आप प्रमाण नहीं होते, पर शिकायत करने वाले को चुप करा देना भी समाधान नहीं है।
हिरासत की जवाबदेही
इंडियन एक्सप्रेस के अनुसार, कॉकरोच जनता पार्टी के संस्थापक अभिजीत दीपके तथा उनके सहयोगी सौरव दास और आशुतोष रांका को 10 अक्टूबर को मुंबई से दिल्ली पहुंचने पर हवाई अड्डे पर हिरासत में लिया गया। वे प्रस्तावित प्रदर्शन में शामिल होने आए थे।
उनकी शुरुआती रिहाई के बाद दिल्ली पुलिस ने बताया कि कार्रवाई भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता की धाराओं 126 और 170 के अंतर्गत निवारक गिरफ्तारी के रूप में की गई थी। इसलिए यह कहना सही नहीं होगा कि पुलिस की ओर से कोई कानूनी आधार बताया ही नहीं गया। हालांकि, किसी प्रावधान का उल्लेख भर कार्रवाई की आवश्यकता और उसके अनुपात से जुड़े सभी प्रश्न समाप्त नहीं करता।
घटनाक्रम शुरुआती रिहाई पर समाप्त नहीं हुआ। 13 अक्टूबर को जंतर-मंतर में प्रवेश करने पर सौरव दास और आशुतोष रांका सहित कुछ लोगों को फिर हिरासत में लिया गया। पुलिस ने प्रतिबंधित स्थल में प्रवेश और पहले दी गई शर्तों के उल्लंघन का पक्ष रखा। इसलिए पहली हिरासत, उसके बाद की रिहाई और नई कार्रवाई को अलग-अलग घटनाओं के रूप में समझना आवश्यक है।
लोकतांत्रिक जवाबदेही की मांग है कि ऐसी कार्रवाइयों का आधार, समयक्रम और संबंधित आदेश स्पष्ट हों। प्रशासन बताए कि किस खतरे को रोकना आवश्यक था, किन व्यक्तियों के व्यवहार से वह खतरा जुड़ा था और कम कठोर उपाय पर्याप्त क्यों नहीं थे। इससे वैध कार्रवाई पर भरोसा बढ़ेगा और अनुचित कार्रवाई होने पर उसे चुनौती देने का रास्ता खुलेगा।
मानवाधिकारों पर उठे सवाल
संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार कार्यालय ने प्रदर्शनकारियों, नागरिक समाज के सदस्यों, वकीलों और पत्रकारों की सामूहिक हिरासत की खबरों पर चिंता जताई। प्रवक्ता थामीन अल-खीतेन ने शांतिपूर्ण सभा के अधिकार का सम्मान करने और मनमाने ढंग से हिरासत में लिए गए लोगों की रिहाई का आह्वान किया। भारत के स्थायी मिशन ने इस प्रतिक्रिया को अनुचित हस्तक्षेप बताते हुए खारिज किया।
संयुक्त राष्ट्र की टिप्पणी किसी अदालत का अंतिम निर्णय नहीं है। उससे प्रत्येक गिरफ्तारी अपने आप गैरकानूनी सिद्ध नहीं होती। फिर भी, ऐसी चिंता का सबसे प्रभावी उत्तर केवल प्रतिवाद नहीं, बल्कि कार्रवाई से जुड़े तथ्य और प्रक्रिया सार्वजनिक करना है। लोकतांत्रिक व्यवस्था की विश्वसनीयता इस बात से मजबूत होती है कि वह अपने निर्णयों की जांच और आलोचना के लिए कितनी खुली है।
सार्वजनिक व्यवस्था बनाए रखना प्रशासन का दायित्व है। लेकिन नागरिक स्वतंत्रताओं का सम्मान भी उसी दायित्व का हिस्सा है। इन दोनों जिम्मेदारियों को एक-दूसरे का विरोधी मान लेने से संवाद की गुंजाइश कम होती है और अविश्वास बढ़ता है।
पत्रकारिता पर रोक की चिंता
इस घटनाक्रम में पत्रकारों के साथ व्यवहार का प्रश्न भी महत्वपूर्ण है। रॉयटर्स की 12 अक्टूबर की रिपोर्ट में लगभग तीन दर्जन पत्रकारों को कुछ समय के लिए हिरासत में लिए जाने तथा कुछ के साथ धक्कामुक्की और उनके फोन लिए जाने का विवरण आया। पत्रकार संगठनों ने कार्रवाई की आलोचना की। रिपोर्ट के अनुसार, पुलिस ने संबंधित कार्रवाइयों के कारणों पर स्पष्टीकरण नहीं दिया था।
पत्रकार की भूमिका घटनाओं का स्वतंत्र विवरण जनता तक पहुंचाना है। उसका काम सत्ता और प्रदर्शनकारियों, दोनों के दावों की पड़ताल करना है। यदि घटनास्थल से रिपोर्टिंग बाधित होती है, तो नुकसान केवल पत्रकार का नहीं होता; नागरिक भी स्वतंत्र जानकारी से वंचित होते हैं।
पत्रकारों के साथ दुर्व्यवहार, उपकरण लिए जाने या पेशेवर काम में बाधा डालने की शिकायतों की निष्पक्ष जांच होनी चाहिए। जांच का उद्देश्य पहले से दोष तय करना नहीं, बल्कि यह स्पष्ट करना होना चाहिए कि क्या हुआ, किसके आदेश पर हुआ और संबंधित कार्रवाई का औचित्य क्या था।
अधिकार और प्रतिबंध
भारतीय संविधान का अनुच्छेद 19 नागरिकों को अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और शांतिपूर्वक, बिना हथियार सभा करने का अधिकार देता है। संविधान इन अधिकारों पर निर्धारित आधारों के अंतर्गत उचित प्रतिबंधों की व्यवस्था भी करता है। इसलिए अधिकारों के साथ प्रतिबंधों की संवैधानिक सीमा को समझना आवश्यक है।
व्यावहारिक प्रश्न यह है कि किसी विशेष परिस्थिति में प्रशासन ने उपलब्ध विकल्पों पर कितना विचार किया। क्या आयोजकों से संवाद हुआ? क्या समय, मार्ग और संख्या से जुड़ी शर्तों पर सहमति बन सकती थी? क्या ऐसा वैकल्पिक स्थान उपलब्ध कराया जा सकता था, जहां प्रदर्शन की आवाज भी सुनी जाती और सामान्य जनजीवन भी सुरक्षित रहता?
यातायात, अस्पतालों तक पहुंच और आम नागरिकों की सुरक्षा वास्तविक चिंताएं हैं। प्रदर्शनकारियों की भी जिम्मेदारी है कि वे शांतिपूर्ण आचरण करें और दूसरों के अधिकारों का सम्मान करें। लेकिन प्रशासनिक सुविधा को ही अंतिम मानक बना देने से सार्वजनिक विरोध का अधिकार धीरे-धीरे अर्थहीन हो सकता है।
चुनाव से आगे लोकतंत्र
तानाशाही की प्रवृत्तियां हमेशा संविधान को औपचारिक रूप से समाप्त करके सामने नहीं आतीं। चुनाव होते रहने और संस्थाएं मौजूद रहने के बावजूद लोकतांत्रिक संस्कृति कमजोर हो सकती है, यदि आलोचना के लिए सार्वजनिक स्थान लगातार घटते जाएं और नागरिक सवाल पूछने से डरने लगें।
विरोध को राष्ट्रविरोध से जोड़ना, आलोचकों को शत्रु मानना और स्वतंत्र पत्रकारिता को संदेह की दृष्टि से देखना किसी भी शासन के लिए चिंताजनक प्रवृत्तियां हैं। उनका मूल्यांकन राजनीतिक पसंद के आधार पर नहीं, बल्कि ठोस कार्रवाई, संस्थागत व्यवहार और नागरिक अधिकारों की वास्तविक स्थिति के आधार पर होना चाहिए।
यही कसौटी सभी दलों और सरकारों पर समान रूप से लागू होनी चाहिए। विपक्ष में रहते हुए प्रदर्शन का अधिकार मांगना और सत्ता में आकर उसी अधिकार को असुविधा मानना लोकतांत्रिक प्रतिबद्धता नहीं कहलाएगा। अधिकारों की रक्षा तभी विश्वसनीय होती है, जब वे अपने विरोधियों के लिए भी स्वीकार किए जाएं।
पारदर्शिता से बनेगा भरोसा
मतदाता सूचियों से जुड़े विवाद में सबसे आवश्यक है कि पात्र नागरिक को अपनी स्थिति जानने, गलती सुधरवाने और शिकायत का निर्णय प्राप्त करने का सुलभ अवसर मिले। नाम जोड़ने या हटाने की प्रक्रिया आम मतदाता की समझ में आने वाली होनी चाहिए। जिस नागरिक की आजीविका, शिक्षा या संसाधन सीमित हैं, उसके लिए सुधार की प्रक्रिया अतिरिक्त बाधा नहीं बननी चाहिए।
इसी तरह, हिरासत और प्रतिबंधों पर प्रशासन को स्पष्ट विवरण देना चाहिए। कितने लोगों को रोका गया, किन आधारों पर कार्रवाई हुई और संबंधित मामलों की स्थिति क्या है—इन प्रश्नों के उत्तर सार्वजनिक भरोसा मजबूत कर सकते हैं। जहां अधिकारों के उल्लंघन की शिकायत है, वहां निष्पक्ष समीक्षा और सुधार होना चाहिए।
10 अक्टूबर और उसके बाद की घटनाओं को भारतीय लोकतंत्र के लिए गंभीर आत्मपरीक्षण का अवसर माना जाना चाहिए। इनके आधार पर पूरे देश को तानाशाही घोषित कर देना जल्दबाजी होगी। लेकिन व्यापक हिरासत और पत्रकारों के काम में बाधा की शिकायतों को सामान्य प्रशासनिक कार्रवाई मानकर अनदेखा करना भी उचित नहीं होगा।
भारत के स्वतंत्रता आंदोलन ने नागरिक स्वतंत्रता, प्रतिनिधित्व और जवाबदेह शासन की आकांक्षा को शक्ति दी थी। उन आदर्शों की रक्षा के लिए जरूरी है कि शांतिपूर्ण असहमति के लिए वास्तविक जगह बनी रहे और चुनावी प्रक्रिया से जुड़े प्रश्नों का उत्तर प्रमाणों से दिया जाए।
लोकतंत्र की शक्ति नागरिकों की आवाज सुनने और उचित प्रश्नों का उत्तर देने में है। सत्ता को यह समझना होगा कि आलोचना से उसकी वैधता समाप्त नहीं होती; आलोचना के प्रति उसका व्यवहार उसकी लोकतांत्रिक प्रतिबद्धता को सामने लाता है। बहुमत सरकार बनाने का अधिकार देता है, जबकि असहमति का सम्मान लोकतंत्र को जीवित रखता है।







