जंतर-मंतर से उठी बहस का संदेश—युवाओं को आश्वासन नहीं, जवाब चाहिए; क्या 2027 में बदलेंगे चुनावी समीकरण?
एडवोकेट किशन सनमुखदास भावनानी
गोंदिया, महाराष्ट्र – लोकतंत्र में युवा केवल भविष्य नहीं, वर्तमान की जवाबदेही मांगने वाली ताकत भी हैं। जब रोजगार की उम्मीदें कमजोर पड़ती हैं, भर्ती प्रक्रियाओं पर सवाल उठते हैं और अपनी आवाज अनसुनी महसूस होती है, तब असंतोष राजनीतिक चुनौती बन सकता है। आज जेन ज़ेड यानी नई पीढ़ी को लेकर उठ रही बहस का केंद्रीय प्रश्न यही है—क्या राजनीतिक दल युवाओं को केवल मतदाता मानेंगे या निर्णय प्रक्रिया में भागीदार भी बनाएंगे?
दिल्ली में चुनावी पारदर्शिता को लेकर विरोध और जंतर-मंतर को निर्धारित प्रदर्शन स्थलों की सूची से हटाए जाने ने इस प्रश्न को नई धार दी है। दिल्ली पुलिस के 11 अक्टूबर के आदेश में रामलीला मैदान, बुराड़ी मैदान और पूर्वी दिल्ली के सीबीडी ग्राउंड को वैकल्पिक स्थल बनाया गया है। फैसला गृह मंत्रालय की समिति की सिफारिशों पर आधारित बताया गया है।
जगह बदली, सवाल कायम
जंतर-मंतर की पहचान केवल एक स्थान की नहीं, सत्ता तक नागरिकों की आवाज पहुंचाने वाले मंच की रही है। इसलिए प्रदर्शन स्थल बदलने का मूल्यांकन सिर्फ उपलब्ध जमीन से नहीं होगा। देखना होगा कि नई व्यवस्था में पहुंच, अनुमति, सुविधाएं और सार्वजनिक दृश्यता कितनी प्रभावी रहती हैं।
इसे सीधे सरकार के भय का प्रमाण कहना उचित नहीं होगा। लेकिन प्रशासन की जिम्मेदारी है कि व्यवस्था बनाने की प्रक्रिया में असहमति की आवाज हाशिये पर न चली जाए। लोकतंत्र की कसौटी यही है कि विरोध को सुना कितना जाता है।
आरोपों का उत्तर प्रमाण से
मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण को लेकर विपक्ष के आरोप और मुख्य निर्वाचन आयुक्त के इस्तीफे की मांग ने राजनीतिक टकराव बढ़ाया है। निर्वाचन आयोग और भाजपा ने पक्षपात के आरोपों को खारिज किया है। ऐसे में जनविश्वास बहाल करने के लिए पारदर्शी जानकारी और शिकायतों का विश्वसनीय निस्तारण आवश्यक है।
मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत ने विपक्षी नेताओं से मुलाकात का अनुरोध न्यायिक मर्यादा और संबंधित विषयों के अदालत में विचाराधीन होने का हवाला देते हुए ठुकराया तथा औपचारिक याचिका का रास्ता बताया। इसका संदेश स्पष्ट है—राजनीतिक असहमति की अभिव्यक्ति और न्यायिक निर्णय की प्रक्रिया की अपनी-अपनी भूमिका है।
क्या युवा बनेंगे किंगमेकर?
2027 की चुनावी राजनीति में युवाओं की भूमिका महत्वपूर्ण हो सकती है, लेकिन सड़क का आक्रोश स्वतः मतपेटी का परिणाम नहीं बनता। उसके लिए मतदाता पंजीकरण, मतदान में भागीदारी, स्थानीय संगठन और भरोसेमंद राजनीतिक विकल्प जरूरी हैं।
जेन ज़ेड को एक जैसा सोचने वाला समूह मानना भी भूल होगी। ग्रामीण बेरोजगार युवक, प्रतियोगी परीक्षा की तैयारी करती युवती और निजी क्षेत्र में असुरक्षित नौकरी करने वाले युवा की प्राथमिकताएं अलग हो सकती हैं। इन्हें जोड़ने वाले प्रश्न हैं—अवसर, निष्पक्षता, सम्मान और भविष्य की सुरक्षा।
सत्तापक्ष के सामने चुनौती है कि वह शिकायतों को सुने और अपने काम का भरोसेमंद हिसाब दे। विपक्ष की परीक्षा है कि वह आक्रोश को केवल नारे में बदलने के बजाय रोजगार, शिक्षा और सुशासन की व्यावहारिक योजना प्रस्तुत करे।
युवाओं का समर्थन किसी दल की स्थायी संपत्ति नहीं है। उसे काम, संवाद और विश्वसनीयता से अर्जित करना होगा। प्रदर्शन का पता बदला जा सकता है, पीढ़ी के सवाल नहीं। 2027 की असली परीक्षा यही होगी—कौन युवाओं की आवाज सुनता है और कौन उसका उत्तर अपने काम से देता है।







