आस्था, संयम और साधना के साथ लोकसंस्कृति का उत्सव
चन्द्र प्रभा सूद

शारदीय नवरात्र माँ दुर्गा की आराधना, आत्मसंयम और श्रद्धा का पावन पर्व है। ‘नवरात्र’ संस्कृत का शब्द है, जिसका शाब्दिक अर्थ है—नौ रातों का समय। इन नौ दिनों और रातों में आदिशक्ति माँ दुर्गा के नौ अलग-अलग स्वरूपों की पूजा का विधान है। भक्त अपनी आस्था और पारिवारिक परम्पराओं के अनुसार व्रत, पूजन, दुर्गा सप्तशती के पाठ और भजन-कीर्तन के माध्यम से देवी की उपासना करते हैं।
नवदुर्गा के स्वरूपों का वर्णन इस प्रकार किया गया है—
प्रथमं शैलपुत्री च द्वितीयं ब्रह्मचारिणी।
तृतीयं चन्द्रघण्टेति कूष्माण्डेति चतुर्थकम्॥
पञ्चमं स्कन्दमातेति षष्ठं कात्यायनीति च।
सप्तमं कालरात्रिश्च महागौरीति चाष्टमम्॥
नवमं सिद्धिदात्री च नवदुर्गाः प्रकीर्तिताः॥
अर्थात् प्रथम दिन माँ शैलपुत्री, दूसरे दिन ब्रह्मचारिणी, तीसरे दिन चन्द्रघण्टा, चौथे दिन कूष्माण्डा, पाँचवें दिन स्कन्दमाता, छठे दिन कात्यायनी, सातवें दिन कालरात्रि, आठवें दिन महागौरी और नौवें दिन सिद्धिदात्री की आराधना की जाती है। देवी के ये नौ स्वरूप ‘नवदुर्गा’ के नाम से प्रसिद्ध हैं। इनकी उपासना जीवन में धैर्य, साहस, करुणा, विवेक और सदाचार की प्रेरणा देती है।
चार नवरात्र, विविध परम्पराएँ
हिन्दू धार्मिक परम्परा में वर्ष में चार नवरात्र माने जाते हैं। चैत्र और आश्विन मास के नवरात्र प्रकट नवरात्र कहलाते हैं, जबकि माघ और आषाढ़ के नवरात्र गुप्त नवरात्र के रूप में जाने जाते हैं। इनमें चैत्र और शारदीय नवरात्र व्यापक स्तर पर मनाए जाते हैं। आश्विन मास में आने वाले शारदीय नवरात्र का प्रभाव देश के विभिन्न भागों की धार्मिक और सांस्कृतिक गतिविधियों में दिखाई देता है।
इन दिनों कहीं घरों में कलश स्थापना होती है, कहीं मंदिरों में विशेष अनुष्ठान किए जाते हैं और कहीं दुर्गापूजा के भव्य पंडाल सजते हैं। पूजा की विधियों में क्षेत्रीय विविधता होने पर भी श्रद्धा और शक्ति की उपासना का भाव सबको जोड़ता है।
खेतड़ी में हरियाली और समृद्धि का भाव
नवरात्र में खेतरी या खेतड़ी बोने की परम्परा अनेक परिवारों में प्रचलित है। इसे ज्वारे या जयंती भी कहा जाता है। श्रद्धालु इसे सुख, समृद्धि, हरियाली और माँ दुर्गा की कृपा का प्रतीक मानते हैं।
प्रतिपदा को साफ मिट्टी के पात्र, कसोरे या गमले में मिट्टी भरकर जौ अथवा स्थानीय परम्परा के अनुसार गेहूँ के बीज बोए जाते हैं। पूजन के साथ इनमें आवश्यकतानुसार हल्का जल दिया जाता है। धीरे-धीरे अंकुरित होते ये बीज जीवन के विकास और नवसृजन का भाव जगाते हैं। खेतड़ी के विसर्जन का दिन पारिवारिक और क्षेत्रीय परम्पराओं के अनुसार अलग-अलग हो सकता है।
अष्टमी अथवा नवमी को कन्या पूजन की परम्परा भी प्रचलित है। कन्याओं को देवी का स्वरूप मानकर उनके चरण धोए जाते हैं तथा आदरपूर्वक भोजन, उपहार और दक्षिणा दी जाती है। इस पूजन का भाव तभी सार्थक होता है, जब कन्याओं के प्रति सम्मान हमारे दैनिक व्यवहार में भी दिखाई दे। उनकी शिक्षा, सुरक्षा और गरिमा के प्रति संवेदनशीलता भी इसी श्रद्धा की अभिव्यक्ति है।
दुर्गापूजा से गरबा तक
बंगाल में दुर्गापूजा अत्यन्त उल्लास और भव्यता के साथ मनाई जाती है। देवी की प्रतिमाएँ, कलात्मक पंडाल और सांस्कृतिक आयोजन इस पर्व को विशेष पहचान देते हैं। विजयादशमी पर माँ दुर्गा की प्रतिमाओं का विसर्जन किया जाता है।
गुजरात में गरबा और डांडिया के आयोजन भक्ति तथा लोकसंस्कृति को एक साथ अभिव्यक्त करते हैं। सामूहिक नृत्य, संगीत और देवी के गीत वातावरण को उल्लास से भर देते हैं। अनेक श्रद्धालु इन दिनों माँ वैष्णो देवी सहित विभिन्न शक्तिपीठों और देवी मंदिरों में दर्शन के लिए भी जाते हैं। इस प्रकार नवरात्र व्यक्तिगत साधना के साथ सामुदायिक उत्सव का रूप ले लेते हैं।
साधना में अनुशासन का महत्त्व
नवरात्र का विशेष महत्त्व शाक्त और तान्त्रिक परम्पराओं में भी माना जाता है। इन परम्पराओं के साधक मंत्र, यंत्र, ध्यान और अनुशासन के माध्यम से देवी की उपासना करते हैं। गुप्त नवरात्र विशेष साधना से जुड़े माने जाते हैं, जबकि प्रकट नवरात्र में सार्वजनिक पूजा और पारिवारिक अनुष्ठानों की व्यापकता दिखाई देती है।
तन्त्र को लेकर समाज में अनेक भ्रान्तियाँ भी हैं। इसके साधक इसे एक अनुशासित आध्यात्मिक मार्ग मानते हैं। ऊर्जा-जागरण और सिद्धियों सम्बन्धी धारणाएँ इन धार्मिक परम्पराओं की मान्यताओं का हिस्सा हैं। साधना का मूल भाव मन की एकाग्रता, आत्मसंयम और आराध्य के प्रति समर्पण से जुड़ा है।
व्रत का आधार संयम
नवरात्र में व्रत रखने वाले श्रद्धालु अपनी परम्परा और सामर्थ्य के अनुसार आहार ग्रहण करते हैं। कुछ फलाहार करते हैं, कुछ साँवा या सामक के चावल तथा कुट्टू के आटे से बने व्यंजन लेते हैं और कुछ एक समय भोजन करते हैं। व्रत की पद्धतियाँ अलग-अलग हो सकती हैं, लेकिन उसका उद्देश्य जीवन में संयम और अनुशासन लाना है।
अनेक परिवार इन दिनों मांसाहार से परहेज करते हैं। कुछ लोग प्याज और लहसुन का भी सेवन नहीं करते। धार्मिक आहार-परम्पराओं में इसे सात्त्विक जीवनचर्या अपनाने का प्रयास माना जाता है। लोक में कहा भी जाता है—‘जैसा खाओ अन्न, वैसा होगा मन।’
यह उक्ति केवल भोजन के चयन तक सीमित नहीं है। इसके व्यापक भाव में विचारों की शुद्धता, वाणी की मधुरता और व्यवहार की सहजता भी शामिल है। व्रत के साथ क्रोध, कटुता और अहंकार पर संयम रखा जाए तो साधना अधिक अर्थपूर्ण बनती है। कुछ परिवारों में इन दिनों बाल न कटवाने और दाढ़ी न बनवाने जैसी परम्पराएँ भी निभाई जाती हैं।
भक्ति के साथ सेवा का संदेश
नवरात्र में मंदिरों की चहल-पहल बढ़ जाती है। भजन-कीर्तन, माता की चौकी और जागरण के आयोजन होते हैं। अनेक स्थानों पर भंडारे लगाए जाते हैं, जहाँ श्रद्धालु भोजन और प्रसाद वितरण में सेवा करते हैं। इन आयोजनों से सहयोग, सहभागिता और अपनत्व का भाव मजबूत होता है।
माँ दुर्गा की आराधना हमें अपने भीतर की दुर्बलताओं पर विजय पाने की प्रेरणा देती है। देवी के सम्मुख दीप प्रज्वलित करने के साथ यदि हम किसी जरूरतमंद के जीवन में आशा का प्रकाश पहुँचा सकें, तो यह भी उपासना का सार्थक रूप होगा। नवरात्र की श्रद्धा जब करुणा, सेवा, नारी-सम्मान और सदाचार में दिखाई देती है, तभी इस पर्व का संदेश जीवन में उतरता है।









