आरटीआई के 21 साल: सच की कीमत जान क्यों?

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सूचना मांगने का अधिकार तभी सार्थक, जब सवाल पूछने वाला नागरिक भी सुरक्षित हो

बाबूलाल नागा

सूचना का अधिकार अधिनियम को 12 अक्टूबर, 2026 को 21 वर्ष पूरे हो रहे हैं। यह अवसर उसकी उपलब्धियों के साथ उन चुनौतियों पर भी विचार करने का है, जिनका सामना इस कानून का इस्तेमाल करने वाले नागरिकों को करना पड़ता है। 12 अक्टूबर, 2005 को पूरी तरह लागू हुए इस कानून ने भारतीय लोकतंत्र में पारदर्शिता और जवाबदेही की नई राह खोली। आम नागरिक को सरकारी कामकाज, सार्वजनिक धन के उपयोग और प्रशासनिक निर्णयों से जुड़ी जानकारी मांगने का कानूनी अधिकार मिला। शासन से सवाल पूछना केवल जनप्रतिनिधियों तक सीमित नहीं रहा; सामान्य नागरिक भी सरकारी दस्तावेजों के आधार पर व्यवस्था से जवाब मांगने लगा।

इस कानून के माध्यम से भ्रष्टाचार, सरकारी योजनाओं में गड़बड़ी और सार्वजनिक संसाधनों के दुरुपयोग के अनेक मामले सामने आए। लेकिन इन उपलब्धियों के बीच एक गंभीर प्रश्न आज भी खड़ा है—जानकारी मांगने और अनियमितताओं को उजागर करने वाले नागरिकों की सुरक्षा की जिम्मेदारी कौन लेगा? यदि सच सामने लाने की कोशिश किसी की जान के लिए खतरा बन जाए, तो सूचना के अधिकार की सफलता अधूरी ही मानी जाएगी।

पारदर्शिता की राह में खतरे

आरटीआई आम नागरिक के हाथ में ऐसा औजार है, जिससे वह सरकारी व्यवस्था से सवाल पूछ सकता है और सार्वजनिक धन का हिसाब मांग सकता है। विशेष रूप से ग्रामीण क्षेत्रों में सामाजिक कार्यकर्ताओं ने इसके जरिए गरीबों, वंचितों और जरूरतमंदों के अधिकारों से जुड़े मुद्दे उठाए हैं। किसी गांव में सड़क निर्माण पर कितना खर्च हुआ, पात्र व्यक्ति को योजना का लाभ क्यों नहीं मिला अथवा किसी विकास कार्य की वास्तविक स्थिति क्या है—ऐसे प्रश्न प्रशासनिक जवाबदेही की बुनियाद हैं।

लेकिन इन सवालों को उठाने की राह हमेशा आसान नहीं रही। अनियमितताओं को सामने लाने वाले कई कार्यकर्ताओं को धमकियों, उत्पीड़न और हिंसा का सामना करना पड़ा है। कुछ मामलों में उनकी हत्या तक हुई है। ऐसी घटनाएं बताती हैं कि केवल सूचना मांगने का अधिकार दे देना पर्याप्त नहीं है। उस अधिकार का उपयोग करने के लिए सुरक्षित वातावरण भी जरूरी है।

जहां सवाल पूछने वाला व्यक्ति स्थानीय स्तर पर प्रभावशाली हितों से टकराता है, वहां उसकी असुरक्षा और बढ़ सकती है। ऐसे में प्रशासन की संवेदनशीलता और समय पर कार्रवाई निर्णायक महत्व रखती है।

हमला व्यक्ति पर, असर लोकतंत्र पर

आरटीआई कार्यकर्ता पर हमला केवल एक व्यक्ति के खिलाफ हिंसा नहीं है। उसका असर दूसरे नागरिकों के मनोबल और लोकतांत्रिक भागीदारी पर भी पड़ता है। जब जानकारी मांगने वाले को धमकाया जाता है, तो आसपास के लोगों तक यह संदेश पहुंचता है कि व्यवस्था से सवाल पूछना जोखिम भरा हो सकता है। परिणामस्वरूप कई नागरिक अपने अधिकार का इस्तेमाल करने से पीछे हट सकते हैं।

यह डर पारदर्शिता और जवाबदेही, दोनों को कमजोर करता है। लोकतंत्र में नागरिक की भूमिका केवल मतदान तक सीमित नहीं हो सकती। उसे यह जानने का भी अधिकार है कि उसके नाम पर बनी योजनाएं कैसे चल रही हैं और सार्वजनिक धन कहां खर्च हो रहा है।

इसलिए आरटीआई कार्यकर्ताओं की सुरक्षा को केवल कानून-व्यवस्था का मामला मानना पर्याप्त नहीं होगा। इसे नागरिक अधिकारों और लोकतांत्रिक विश्वास की रक्षा से जोड़कर देखना चाहिए। सवाल पूछने वाले की आवाज दबती है, तो व्यवस्था में सुधार की एक संभावना भी कमजोर पड़ती है।

सूचना खुलेगी तो दबाव घटेगा

नागरिकों की सुरक्षा और सूचना तक उनकी पहुंच बढ़ाने का एक महत्वपूर्ण रास्ता सरकारी जानकारियों का नियमित सार्वजनिक प्रकटीकरण है। सूचना का अधिकार अधिनियम की धारा 4 में सार्वजनिक प्राधिकरणों द्वारा अनेक प्रकार की सूचनाएं स्वतः सार्वजनिक करने का प्रावधान है। इसका उद्देश्य ऐसी व्यवस्था बनाना भी है, जिसमें नागरिकों को सामान्य जानकारियों के लिए बार-बार आवेदन न करना पड़े।

सरकारी विभाग अपने बजट, योजनाओं, कार्यप्रणाली और विकास कार्यों से संबंधित जानकारी समय पर, स्पष्ट तथा सुलभ रूप में उपलब्ध कराएं, तो पारदर्शिता मजबूत होगी। केवल वेबसाइट पर दस्तावेज डाल देना पर्याप्त नहीं है। जानकारी ऐसी भाषा और स्वरूप में होनी चाहिए, जिसे सामान्य नागरिक समझ सके। ग्रामीण और डिजिटल सुविधाओं से वंचित लोगों तक पहुंच के लिए स्थानीय स्तर पर सूचना उपलब्ध कराने के उपाय भी जरूरी हैं।

यदि सार्वजनिक हित की जानकारी मांगने के बाद किसी आवेदक को धमकी मिलती है या उस पर हमला होता है, तो संबंधित सूचना को कानून के दायरे में सार्वजनिक करने की प्रभावी व्यवस्था पर विचार किया जाना चाहिए। इससे व्यक्ति को डराकर सूचना दबाने की कोशिश का उद्देश्य कमजोर पड़ सकता है। हालांकि, इस प्रक्रिया में व्यक्तिगत गोपनीयता और वैधानिक अपवादों का सम्मान भी आवश्यक है।

सुरक्षा का भरोसा व्यवहार में दिखे

भ्रष्टाचार उजागर करने वालों के संरक्षण के उद्देश्य से व्हिसलब्लोअर्स प्रोटेक्शन एक्ट, 2014 बनाया गया था। लेकिन किसी कानून का बनना और जरूरतमंद व्यक्ति को समय पर प्रभावी संरक्षण मिलना दो अलग बातें हैं। सूचना मांगने वाले नागरिकों और भ्रष्टाचार का खुलासा करने वालों की सुरक्षा के लिए ऐसा तंत्र चाहिए, जिसकी सहायता खतरा सामने आते ही ली जा सके।

धमकी की शिकायत दर्ज करने, खतरे का आकलन करने और आवश्यक सुरक्षा देने की प्रक्रिया स्पष्ट तथा सुलभ होनी चाहिए। किसी नागरिक को मदद पाने के लिए कार्यालयों के चक्कर न लगाने पड़ें। पुलिस और प्रशासन को शिकायत की गंभीरता समझते हुए समय पर कार्रवाई करनी चाहिए। हमले होने पर निष्पक्ष जांच और दोषियों के विरुद्ध कार्रवाई भी उतनी ही जरूरी है।

राज्य सरकारों को इस दिशा में प्रभावी व्यवस्था विकसित करनी चाहिए। नागरिक समाज और सामाजिक संगठनों की भूमिका भी महत्वपूर्ण है। खतरे का सामना कर रहे व्यक्ति को अकेला छोड़ देने के बजाय उसकी शिकायत उचित मंच तक पहुंचाने और मामले पर सार्वजनिक निगरानी बनाए रखने के प्रयास होने चाहिए।

समय पर सूचना भी जरूरी

आरटीआई की प्रभावशीलता सुरक्षा के साथ-साथ समय पर जानकारी मिलने पर भी निर्भर करती है। सूचना आयोगों में रिक्त पदों को समय पर भरना, अपीलों और शिकायतों का शीघ्र निस्तारण करना तथा आवेदन प्रक्रिया को सरल बनाना आवश्यक है। सूचना के लिए लंबा इंतजार नागरिक को हतोत्साहित करता है और कई मामलों में जानकारी की उपयोगिता भी घटा देता है।

पारदर्शिता को केवल आवेदन का जवाब देने की औपचारिकता नहीं बनाया जा सकता। उसे प्रशासन की कार्यसंस्कृति का हिस्सा बनाना होगा। नागरिक के सवाल को व्यवधान मानने के बजाय जवाबदेही के अवसर के रूप में स्वीकार करना इस बदलाव की पहली शर्त है।

जवाब के साथ सुरक्षा भी मिले

आरटीआई के 21 वर्ष पूरे होना उसकी उपलब्धियों पर संतोष करने के साथ उसकी कमजोरियों को दूर करने का अवसर है। इस कानून ने नागरिक को शासन से सवाल पूछने की ताकत दी है। अब उस ताकत का इस्तेमाल करने वालों को सुरक्षा और न्याय का भरोसा देना जरूरी है।

सरकार, प्रशासन, सूचना आयोगों और नागरिक समाज को मिलकर ऐसा वातावरण बनाना होगा, जिसमें सार्वजनिक हित का प्रश्न उठाने वाला व्यक्ति भय महसूस न करे। सूचना का अधिकार केवल सरकारी दस्तावेज हासिल करने का माध्यम नहीं, नागरिक और शासन के बीच जवाबदेही का संबंध मजबूत करने वाला कानून है।

इसकी वास्तविक सफलता तभी होगी, जब सूचना मांगने वाले नागरिक को समय पर जवाब भी मिले और सुरक्षा भी। सच उजागर करने का साहस किसी के लिए मौत का खतरा नहीं बनना चाहिए। लोकतंत्र में सवाल पूछने की कीमत जान नहीं हो सकती।

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Author: Bharat Sarathi

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