दिल्ली में पाबंदियों पर विद्रोही ने उठाए सवाल

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वोट चोरी के आरोपों पर हो रहे आंदोलन को दबाने के लिए सत्ता के दुरुपयोग का आरोप

रेवाडी, 10 अक्टूबर। स्वयंसेवी संस्था ग्रामीण भारत के अध्यक्ष वेदप्रकाश विद्रोही ने केंद्र सरकार पर आरोप लगाया कि वोट चोरी के आरोपों को लेकर चल रहे आंदोलन को रोकने के लिए राजधानी दिल्ली में व्यापक पाबंदियां लगाई गई हैं। उन्होंने कहा कि प्रदर्शनकारियों को रोकने के नाम पर आम नागरिकों की आवाजाही और दैनिक गतिविधियों को प्रभावित करना लोकतांत्रिक अधिकारों पर प्रहार है।

विद्रोही ने दावा किया कि शनिवार को दिल्ली को अघोषित रूप से बंद कर किले में बदल दिया गया। उनके अनुसार, 45 मेट्रो स्टेशन बंद किए गए और दिल्ली की ओर आने वाली 75 ट्रेनें रद्द की गईं। उन्होंने आरोप लगाया कि बसों और निजी वाहनों से राजधानी आने वाले लोगों को कड़ी पुलिस जांच का सामना करना पड़ रहा है तथा कई स्थानों पर ऑटो और टैक्सियों के संचालन पर भी पाबंदियां लगाई गई हैं।

उन्होंने होटलों में लोगों के ठहरने पर रोक तथा दुकानों, व्यापारिक संस्थानों, सरकारी कार्यालयों और शिक्षण संस्थानों को बंद किए जाने का भी दावा किया। विद्रोही ने कहा कि यदि विरोध प्रदर्शन रोकने के लिए नागरिकों की सामान्य गतिविधियों पर इस तरह अंकुश लगाया जाता है, तो सरकार की लोकतांत्रिक प्रतिबद्धता पर सवाल उठना स्वाभाविक है।

हरियाणा में विपक्षी कार्यकर्ताओं को रोकने का आरोप

विद्रोही ने आरोप लगाया कि हरियाणा से कांग्रेस और अन्य विपक्षी दलों के नेता एवं कार्यकर्ता दिल्ली न पहुंच सकें, इसके लिए पिछले तीन दिनों से उन्हें नजरबंद किया जा रहा है। उन्होंने इन कथित कार्रवाइयों को अनुचित बताते हुए कहा कि शांतिपूर्ण आंदोलन में भाग लेने से लोगों को रोकना असहमति की आवाज दबाने का प्रयास है।

उन्होंने भाजपा पर चुनावी अनियमितताओं के आरोप दोहराते हुए कहा कि मतदाताओं के सवालों का जवाब देने के बजाय सरकार आंदोलन को दबाने के लिए प्रशासनिक मशीनरी का इस्तेमाल कर रही है। उनके अनुसार, चुनाव प्रक्रिया और निर्वाचन आयोग की भूमिका को लेकर उठ रहे सवालों का समाधान पारदर्शिता और जवाबदेही से होना चाहिए।

विद्रोही ने कहा कि लोकतंत्र में सरकार की आलोचना करना और शांतिपूर्ण विरोध जताना जनता का अधिकार है। उन्होंने आरोप लगाया कि केंद्र सरकार अपने खिलाफ चल रहे जनआंदोलन को कमजोर करने के लिए दमनकारी रास्ता अपना रही है, जबकि पाबंदियां लगाकर जनता के सवालों को समाप्त नहीं किया जा सकता।

Bharat Sarathi
Author: Bharat Sarathi

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