रेवाड़ी अनाज मंडी में धरनारत किसानों से की चर्चा, बाजरा 2,900 रुपये प्रति क्विंटल पर खरीदने की मांग
रेवाड़ी, 27 सितंबर। स्वयंसेवी संस्था ग्रामीण भारत के अध्यक्ष वेदप्रकाश विद्रोही ने बाजरे की खरीद को लेकर हरियाणा सरकार के दावों पर सवाल उठाया है। एमएसपी पर बाजरा खरीद की मांग को लेकर रेवाड़ी अनाज मंडी में धरने पर बैठे जय किसान आंदोलन के किसानों से चर्चा करते हुए उन्होंने मुख्यमंत्री से पूछा कि जब सरकार सभी 24 फसलें न्यूनतम समर्थन मूल्य पर खरीदने का दावा करती है, तो बाजरे के लिए भावांतर योजना का सहारा क्यों लिया जा रहा है?
विद्रोही ने कहा कि एक अक्टूबर से शुरू होने वाली बाजरे की सरकारी खरीद में किसानों को 2,900 रुपये प्रति क्विंटल का न्यूनतम समर्थन मूल्य सीधे मिलना चाहिए। उन्होंने मांग की कि सरकार भावांतर योजना की बजाय एमएसपी पर बाजरे की खरीद सुनिश्चित करे।
दावे और खरीद व्यवस्था पर सवाल
विद्रोही ने आरोप लगाया कि मुख्यमंत्री हरियाणा और प्रदेश से बाहर बार-बार सभी रबी और खरीफ फसलों की एमएसपी पर खरीद का दावा करते हैं, लेकिन बाजरे के मामले में सरकार की व्यवस्था इस दावे पर सवाल खड़े करती है। उन्होंने पूछा कि यदि सभी 24 फसलें एमएसपी पर खरीदी जा रही हैं, तो बाजरा उत्पादक किसानों को भावांतर योजना में क्यों उलझाया जा रहा है?
उन्होंने दावा किया कि प्रदेश में गेहूं और धान सहित केवल चार-पांच फसलों की ही एमएसपी पर खरीद होती है, जबकि अन्य फसलों के मामले में भावांतर योजना को आगे कर किसानों को पूरी एमएसपी मिलने का भरोसा दिया जाता है। विद्रोही ने इसे सरकार की कथनी और करनी में अंतर बताते हुए कहा कि सरकार अपने दावे के अनुरूप खरीद व्यवस्था लागू करे।
बाजरे पर टिकी अहीरवाल की खरीफ अर्थव्यवस्था
विद्रोही ने कहा कि बाजरा अहीरवाल और दक्षिणी हरियाणा की प्रमुख खरीफ फसल है। इस क्षेत्र में धान की खेती न के बराबर होने के कारण किसानों की खरीफ की आमदनी मुख्य रूप से बाजरे पर निर्भर करती है। ऐसे में बाजरे का उचित मूल्य मिलना यहां के किसानों की आर्थिक स्थिति से सीधे जुड़ा सवाल है।
उन्होंने कहा कि बाजरा उत्पादकों को उनकी उपज का घोषित समर्थन मूल्य दिलाना सरकार की जिम्मेदारी है। खरीद की ऐसी व्यवस्था होनी चाहिए, जिसमें किसान को अपनी फसल का मूल्य पाने के लिए अनिश्चितता का सामना न करना पड़े।
प्रति क्विंटल 200 से 300 रुपये नुकसान का दावा
विद्रोही ने दावा किया कि भावांतर व्यवस्था के तहत बाजरा बेचने पर किसानों को कम से कम 200 से 300 रुपये प्रति क्विंटल का नुकसान होता है। उन्होंने कहा कि बाजार में उपज बेचने के बाद किसान इस बात के लिए भी सरकार पर निर्भर रहता है कि उसे कितने उत्पादन पर भावांतर का भुगतान मिलेगा।
उन्होंने सवाल उठाया कि जब सरकार बाजरे की खरीद और किसानों को समर्थन मूल्य देने की बात करती है, तो सीधे एमएसपी पर खरीद क्यों नहीं करती? उनके अनुसार, भावांतर के भुगतान की अनिश्चितता किसानों की परेशानी बढ़ाती है।
सीधे एमएसपी पर खरीद करे सरकार
विद्रोही ने आरोप लगाया कि भाजपा सरकार भावांतर योजना में किसानों को उलझाकर सीधे एमएसपी पर खरीद की जिम्मेदारी से बच रही है। उन्होंने इसे किसानों के साथ धोखाधड़ी बताते हुए मांग की कि बाजरे की खरीद 2,900 रुपये प्रति क्विंटल के न्यूनतम समर्थन मूल्य पर की जाए।
उन्होंने कहा कि सरकार सभी फसलें एमएसपी पर खरीदने के अपने दावे को बाजरे की खरीद में भी लागू करे और धरने पर बैठे किसानों की मांग स्वीकार कर उन्हें उनकी उपज का पूरा मूल्य दिलाए।








