बाढ़, सूखा और गिरता भूजल एक ही जल संकट के हिस्से हैं। समाधान के लिए नदी, खेत और शहर को साथ रखकर योजना बनानी होगी।
कुमार कृष्णन

भारत में पानी का संकट केवल कमी का संकट नहीं है। एक ही देश में कहीं बाढ़ घर और आजीविका बहा ले जाती है, तो कहीं पीने और सिंचाई के लिए पानी नहीं मिलता। बदलता वर्षा चक्र, गिरता भूजल और बढ़ती मांग इस विरोधाभास को और गंभीर बना रहे हैं।
नई दिल्ली के भारत मंडपम में 22 से 26 सितंबर तक आयोजित नौवें भारतीय अंतरराष्ट्रीय जल सप्ताह की थीम ‘जलवायु-अनुकूल जल प्रबंधन’ है। यह विषय एक सीधा सवाल उठाता है: जब वर्षा का स्वरूप बदल रहा है, तो पानी के प्रबंधन की हमारी नीति कितनी बदली है?
कुछ घंटों की तेज बारिश शहरों को डुबो देती है, लेकिन कुछ महीने बाद वही शहर पानी की कमी से जूझते हैं। वर्षाजल को जमीन में उतरने की जगह नहीं मिलेगी, तो बाढ़ का पानी भूजल भंडार भी नहीं भर पाएगा। इसलिए बाढ़ से राहत और सूखे में टैंकर भेजने से आगे बढ़कर पूरे जलचक्र की योजना बनानी होगी।
नदी को भी पानी चाहिए
नदियों को जोड़ने या उनका पानी दूर तक ले जाने वाली परियोजनाओं का मूल्यांकन केवल उपलब्ध पानी और लागत के आधार पर नहीं हो सकता। नदी में बहने वाला पानी उसकी जैव-विविधता, गाद की गति और किनारे बसे समुदायों के जीवन को भी बनाए रखता है। किसी परियोजना पर निर्णय से पहले पूरे नदी बेसिन और पर्यावरणीय प्रवाह पर उसका असर समझना जरूरी है।
राज्यों के बीच जल बंटवारे में भी यह सवाल शामिल होना चाहिए कि नदी के लिए कितना पानी बचेगा। नदी को खाली करके जल सुरक्षा हासिल नहीं की जा सकती।
स्थानीय ज्ञान के साथ आधुनिक विज्ञान
तालाब, जोहड़, बावड़ियां और अन्य पारंपरिक जल प्रणालियां बताती हैं कि समाज ने कभी वर्षा को स्थानीय जरूरतों के अनुसार सहेजने के तरीके विकसित किए थे। इन्हें आज के जल विज्ञान, भूजल अध्ययन और मौसम पूर्वानुमान से जोड़ना होगा। तकनीक पानी के प्रवाह और जलाशयों में गाद का बेहतर आकलन कर सकती है, लेकिन स्थानीय समुदायों के अनुभव को निर्णय से बाहर नहीं रखा जा सकता।
किसान से अकेले कीमत न वसूलें
खेती में पानी का अधिक कुशल उपयोग आवश्यक है। लेकिन किसान को कम पानी वाली फसल अपनाने की सलाह तभी व्यावहारिक होगी जब उस फसल के लिए भरोसेमंद बाजार, उचित कीमत और खरीद व्यवस्था भी हो। जल संरक्षण की पूरी आर्थिक कीमत किसान पर डालना न्यायसंगत नहीं होगा।
शहरों के सामने अलग चुनौती है। निर्माण के साथ तालाब, प्राकृतिक जलधाराएं और भूजल पुनर्भरण क्षेत्र सिमटते हैं। परिणाम तेज बारिश में जलभराव और गर्मियों में पानी की कमी के रूप में दिख सकता है। शहरी नियोजन में वर्षाजल के लिए रास्ता और नदी के बाढ़ क्षेत्र के लिए जगह सुरक्षित करनी होगी। उपचारित पानी का दोबारा उपयोग बढ़े, तो उसकी गुणवत्ता और इस्तेमाल की निगरानी भी स्पष्ट होनी चाहिए।
नागरिकों से नल बंद रखने की अपील जरूरी है, पर जल संकट का समाधान केवल घरों में पानी बचाने से नहीं निकलेगा। खेत की फसल पद्धति, शहरों का निर्माण, उद्योगों का जल उपयोग, भूजल दोहन और जलाशयों का संचालन—इन सबकी जिम्मेदारी तय करनी होगी।
जल सप्ताह की असली परीक्षा सम्मेलन के बाद होगी। क्या सूखते कुओं और शहरों के तालाबों के लिए ठोस योजना बनेगी? क्या किसान कम पानी में भी सुरक्षित आय पा सकेगा? और क्या नदी को पानी के स्रोत के साथ एक जीवित पारिस्थितिकी तंत्र भी माना जाएगा? जलवायु-अनुकूल जल प्रबंधन का अर्थ इन्हीं सवालों के जवाब को नीति और व्यवहार में उतारना है।








