सवाल असुविधाजनक हो सकते हैं, लेकिन सवालों से मुक्त व्यवस्था लोकतंत्र नहीं कहलाती
डॉ. मत्स्येन्द्र प्रभाकर

‘नाराज फूफा’ प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी द्वारा राजनीतिक आलोचकों के लिए इस्तेमाल किया गया नया व्यंग्यात्मक संबोधन है। उन्होंने 5 सितम्बर को दिल्ली के श्रीराम कॉलेज ऑफ कॉमर्स के शताब्दी समारोह में उन लोगों पर तंज कसा, जो प्रत्येक विकास परियोजना या सरकारी निर्णय के सामने आते ही पूछने लगते हैं—“इसकी आवश्यकता क्या है?” प्रधानमंत्री की टिप्पणी ने एक दिलचस्प बहस को जन्म दिया है—क्या हर सरकारी फैसले पर सवाल उठाना विकास-विरोध है या लोकतंत्र की स्वाभाविक प्रक्रिया?
राजनीतिक शब्दावली में ‘नाराज फूफा’ भले ही नया हो, लेकिन भारतीय सामाजिक जीवन में फूफा बहुत पुराना और जाना-पहचाना चरित्र है। परिवार में वे अक्सर हर खुशी में कोई कमी खोज लेते हैं, प्रत्येक उपलब्धि को संदेह की निगाह से देखते हैं और हर निर्णय पर पूछते हैं—“लेकिन ऐसा क्यों?”
वे समारोह में होंठ सिकोड़कर चाय पीते रहते हैं और व्यवस्था की छोटी-से-छोटी कमी भी उनकी पैनी निगाह से बच नहीं पाती। मानो वे परिवार के ‘आपत्ति मंत्रालय’ के स्थायी और निर्विरोध पदाधिकारी हों!
क्या लोकतंत्र को ऐसे ‘फूफा’ से मुक्ति चाहिए?
इस प्रश्न का उत्तर है—नहीं।
लोकतंत्र की खूबसूरती ही इस बात में है कि उसमें असहमति और आलोचना के लिए जगह बनी रहे। लोकतंत्र का ‘फूफा’ कभी बिना कारण नाराज हो सकता है, कभी पूर्वाग्रह से बोल सकता है और कभी ऐसा जरूरी सवाल उठा सकता है, जिसे सत्ता तथा समाज दोनों अनदेखा कर रहे हों।
उसकी मौजूदगी भले ही असुविधाजनक लगे, लेकिन उसकी अनुपस्थिति उससे कहीं अधिक चिंताजनक होगी। इसलिए ‘फूफा’ से छुटकारा लोकतंत्र का समाधान नहीं है। लोकतंत्र में उसका होना इस बात का संकेत है कि सवाल पूछने की गुंजाइश अभी जीवित है।
लोकतंत्र को सवाल करने वाले भी चाहिए और उन सवालों का जवाब देने वाले भी।
राजनीति में ‘फूफा’ की यह श्रेणी किसी एक दल तक सीमित नहीं है। भाजपा में भी अपने ‘फूफा’ हैं, कांग्रेस में भी और समाजवादी तथा क्षेत्रीय दलों में भी। प्रत्येक राजनीतिक दल के भीतर कुछ ऐसे लोग मिल जाते हैं, जो नाराज भी रहते हैं और निष्ठावान भी। उनकी अपेक्षाएं कई बार तर्कसंगत नहीं होतीं, लेकिन नाराज होना वे अपना अधिकार समझते हैं।
नाराजगी और विद्रोह के बीच संतुलन बनाए रखना ही ‘फूफा’ का पुराना राजनीतिक कौशल है। वह असंतुष्ट भी रहता है और परिवार अथवा दल का हिस्सा भी बना रहता है।
भारतीय समाज का ‘स्थायी विपक्ष’
भारतीय परिवारों में फूफा जी का स्थान सबसे निराला होता है। वे केवल रिश्तेदार नहीं, बल्कि एक प्रकार की सामाजिक संस्था हैं। उन्हें ‘रिश्तेदारी का स्थायी विपक्ष’ कहा जाए तो शायद अनुचित नहीं होगा।
सरकार कोई भी हो, सत्ता किसी की भी हो—फूफा असंतुष्ट रहते हैं। उनका असंतोष ही उनकी पहचान बन जाता है। वे अचानक प्रसन्न दिखाई दें तो परिवार को चिंता होने लगती है कि कहीं कोई बड़ी गड़बड़ी तो नहीं हो गई!
उत्तर भारत में यह बात मजाक के रूप में कही जाती है कि यदि शादी में फूफा जी न रूठें तो शादी अधूरी मानी जाती है। समारोह में भोजन से लेकर बैठने की व्यवस्था तक उनकी नजर रहती है। उनकी संतुष्टि कई बार आयोजन की सफलता का अनौपचारिक पैमाना बन जाती है।
लेकिन फूफा की आलोचना में केवल नाराजगी ही नहीं होती। उसमें आत्मीयता, चिंता और अपनेपन का भाव भी हो सकता है। वह परिवार का हिस्सा होने के कारण बोलता है। उसे लगता है कि कुछ ठीक नहीं हो रहा और शायद अपने ढंग से वह सही सलाह देने की कोशिश कर रहा है।
सवाल दबाइए नहीं, जवाब दीजिए
लोकतंत्र का ‘फूफा’ भी यही काम करता है। वह सवाल पूछता है, आलोचना करता है और व्यवस्था की कमियां गिनाता है। कभी उसका सवाल बेबुनियाद हो सकता है, लेकिन कभी वही सवाल सत्ता को आईना भी दिखा सकता है।
इसलिए उसकी नाराजगी को दबाने के बजाय सुना जाना चाहिए। इसके बाद तर्क और तथ्यों के आधार पर तय किया जा सकता है कि कौन-सा सवाल उचित है और कौन-सा पूर्वाग्रह से प्रेरित। लोकतंत्र में प्रत्येक आवाज को अभिव्यक्ति का अवसर मिलना चाहिए—चाहे वह सत्ता समर्थक की हो, विपक्ष की हो, युवा की हो या किसी ‘नाराज फूफा’ की।
प्रधानमंत्री मोदी का ‘नाराज फूफा’ संबोधन राजनीतिक तंज है, लेकिन इसके पीछे एक गहरा सामाजिक सत्य भी छिपा है। प्रत्येक समाज में कुछ लोग बदलाव से असहज होते हैं। उन्हें पुरानी व्यवस्था अधिक सुरक्षित और परिचित लगती है। लोकतांत्रिक शासन का दायित्व ऐसे लोगों का उपहास करके उन्हें अलग कर देना नहीं, बल्कि संवाद के माध्यम से उन्हें साथ लेकर चलना है।
विकास आवश्यक है, लेकिन विकास के नाम पर उठने वाले हर सवाल को निरर्थक या विरोध से प्रेरित मान लेना भी उचित नहीं। सरकार के फैसलों की आलोचना और उनकी जवाबदेही लोकतंत्र को कमजोर नहीं, बल्कि मजबूत करती है।
‘लोकतंत्र के फूफा’ की नाराजगी को हल्के में नहीं लिया जाना चाहिए। कभी वह गलतफहमी में हो सकता है और कभी वही कड़वा सच बोल रहा होता है। लोकतंत्र की असली परीक्षा इसी में है कि वह दोनों स्थितियों के बीच अंतर पहचाने, आलोचक को सुने और उसके सवालों का तथ्यपूर्ण जवाब दे।
क्योंकि सवाल असुविधाजनक जरूर हो सकते हैं, लेकिन सवालों से मुक्त व्यवस्था लोकतंत्र नहीं कहलाती।








