दिल्ली में केवल इमारत नहीं गिरी, भ्रष्टाचार और लापरवाही की परतें भी खुलीं
डॉ. उपेंद्र कश्यप

दिल्ली के सत्य निकेतन इलाके में पांच मंजिला इमारत ढहने से सात लोगों की मौत हो गई और कई घायल हो गए। हादसे के बाद राजनीति गर्मा गई और प्रशासन ने भवन मालिक के खिलाफ कार्रवाई शुरू कर दी। मालिक की भूमिका की निष्पक्ष जांच और दोष सिद्ध होने पर कठोर कार्रवाई आवश्यक है, लेकिन क्या इस त्रासदी के लिए केवल भवन मालिक को जिम्मेदार ठहराना पर्याप्त होगा?
सवाल यह भी है कि वर्षों तक नियमों के विरुद्ध निर्माण, भवन में किए जा रहे बदलाव और सुरक्षा मानकों की अनदेखी संबंधित विभागों की निगाह से कैसे बची रही? यदि सरकारी एजेंसियां ईमानदारी और जिम्मेदारी से अपना काम करतीं तो क्या ऐसी दुर्घटना को रोका नहीं जा सकता था?
सत्य निकेतन की घटना केवल एक इमारत गिरने का मामला नहीं है। यह उस व्यवस्था की विफलता का प्रतीक है, जिसमें हादसा होने के बाद तो प्रशासन सक्रिय दिखाई देता है, लेकिन खतरा पैदा होने से पहले कार्रवाई नहीं करता। इमारत गिरने और भवनों में आग लगने की घटनाएं बार-बार सामने आती हैं। हर हादसे के बाद जांच, मुआवजे और दोषियों को नहीं बख्शने की घोषणाएं होती हैं, लेकिन कुछ समय बाद मामला ठंडा पड़ जाता है।
निर्माण से प्रमाणपत्र तक सवालों के घेरे में व्यवस्था
भ्रष्टाचार और प्रशासनिक लापरवाही ऐसी मौतों का कारण कैसे बनते हैं, इसे समझना जरूरी है। भवन निर्माण के लिए नक्शा स्वीकृत कराने से लेकर निर्माण पूरा होने के बाद प्रमाणपत्र लेने तक कई स्तरों पर सरकारी अनुमति आवश्यक होती है। इन प्रक्रियाओं में रिश्वतखोरी और नियमों की अनदेखी के आरोप अक्सर सामने आते रहे हैं।
कई मामलों में नक्शे के विपरीत निर्माण किया जाता है, अतिरिक्त मंजिलें खड़ी कर दी जाती हैं या कमजोर इमारतों के मूल ढांचे में बदलाव कर दिया जाता है। इसके बावजूद संबंधित एजेंसियां समय रहते कार्रवाई नहीं करतीं। निरीक्षण यदि केवल कागजी औपचारिकता बन जाए तो निर्माण की गुणवत्ता और सुरक्षा मानकों का वास्तविक परीक्षण कैसे होगा?
यह जांचना आवश्यक है कि सत्य निकेतन की इमारत स्वीकृत नक्शे के अनुसार बनी थी या नहीं। यदि उसमें अवैध निर्माण अथवा बिना अनुमति बदलाव किए गए थे तो संबंधित अधिकारियों को इसकी जानकारी क्यों नहीं हुई? यदि जानकारी थी तो कार्रवाई क्यों नहीं की गई? प्रारंभिक जानकारियों में इमारत के स्वीकृत स्वरूप, अतिरिक्त मंजिलों और बेसमेंट में मरम्मत को लेकर गंभीर सवाल सामने आए हैं।
अग्नि सुरक्षा प्रमाणपत्र भी महज औपचारिकता न बने
इसी प्रकार भवनों में आग से बचाव के लिए अग्निशमन विभाग सुरक्षा उपकरणों, निकासी मार्गों और अन्य व्यवस्थाओं का निरीक्षण कर अनापत्ति प्रमाणपत्र जारी करता है। लेकिन जब बिना पर्याप्त जांच के प्रमाणपत्र जारी होने के आरोप लगते हैं तो पूरी व्यवस्था संदेह के घेरे में आ जाती है।
प्रभावशाली लोगों की पहुंच, राजनीतिक दबाव अथवा रिश्वत के कारण यदि नियमों की अनदेखी की जाती है तो उसका परिणाम अंततः आम नागरिकों को अपनी जान देकर भुगतना पड़ता है। सुरक्षा प्रमाणपत्र केवल कागज का एक टुकड़ा नहीं, बल्कि उसमें रहने और काम करने वाले प्रत्येक व्यक्ति के जीवन की गारंटी होना चाहिए।
केवल मालिक नहीं, अधिकारियों की भी जवाबदेही तय हो
यदि केंद्र और राज्य सरकारें वास्तव में ऐसी दुर्घटनाएं रोकना चाहती हैं तो उन्हें जवाबदेही की स्पष्ट व्यवस्था बनानी होगी। किसी भवन के गिरने या उसमें आग लगने पर केवल मालिक अथवा संचालक के खिलाफ मुकदमा दर्ज कर देना पर्याप्त नहीं है। उस भवन का नक्शा स्वीकृत करने, निर्माण का निरीक्षण करने, नियमों का पालन सुनिश्चित कराने और सुरक्षा प्रमाणपत्र जारी करने वाले अधिकारियों की भूमिका भी जांची जानी चाहिए।
जांच में लापरवाही, मिलीभगत अथवा भ्रष्टाचार सामने आने पर संबंधित अधिकारी के खिलाफ विभागीय कार्रवाई के साथ आपराधिक मुकदमा भी चलना चाहिए। अधिकारी सेवानिवृत्त हो चुका हो तो भी उसे जवाबदेही से मुक्त नहीं किया जाना चाहिए। इसके साथ ही व्यावसायिक भवनों, छात्रावासों और पेइंग गेस्ट आवासों का निश्चित समयावधि में स्वतंत्र संरचनात्मक एवं अग्नि सुरक्षा ऑडिट अनिवार्य किया जाना चाहिए।
सत्य निकेतन हादसे में नगर निगम के उपायुक्त समेत पांच अधिकारियों को निलंबित किया गया है। यह कार्रवाई स्वागतयोग्य है, लेकिन इसे केवल तत्काल जनाक्रोश शांत करने तक सीमित नहीं रहना चाहिए।
सत्य निकेतन में केवल एक इमारत नहीं गिरी है। उसके मलबे में प्रशासनिक सतर्कता, नियामक व्यवस्था और सरकारी जवाबदेही पर जनता का भरोसा भी दबा है। दुर्घटनाओं को रोकने के लिए नए कानूनों से अधिक आवश्यकता मौजूदा नियमों को ईमानदारी से लागू करने की है। जब तक भवन मालिकों के साथ लापरवाह अधिकारियों और संरक्षण देने वाले प्रभावशाली लोगों को भी दंडित नहीं किया जाएगा, तब तक ऐसी त्रासदियों का सिलसिला थमना कठिन है।
इस विमर्श का उद्देश्य किसी भवन मालिक का बचाव करना नहीं, बल्कि हादसे के लिए जिम्मेदार पूरी व्यवस्था की भूमिका की निष्पक्ष जांच और जवाबदेही सुनिश्चित करना है।








