8 सितंबर : अंतरराष्ट्रीय साक्षरता दिवस – भारतीय शिक्षा का नया स्वरूप: डिजिटल क्रांति और एआई साक्षरता

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तकनीक बने ज्ञान का माध्यम, शिक्षक और मानवीय मूल्यों का विकल्प नहीं

ओ.पी. पाल

अंतरराष्ट्रीय साक्षरता दिवस पर भारत की उपलब्धियों का आकलन करते हुए यह स्पष्ट दिखाई देता है कि देश ने निरक्षरता घटाने और डिजिटल तकनीक अपनाने की दिशा में उल्लेखनीय प्रगति की है। कृत्रिम बुद्धिमत्ता यानी एआई ने सीखने की प्रक्रिया को गति देने के साथ शिक्षा की नई संभावनाओं के द्वार खोले हैं। हालांकि, यह याद रखना होगा कि तकनीक शिक्षा का साधन है, साध्य नहीं।

शिक्षा की वास्तविक सफलता इस बात पर निर्भर करती है कि तकनीक का उपयोग बच्चों में ज्ञान, चरित्र, संवेदनशीलता और सामाजिक दायित्वबोध विकसित करने के लिए किस प्रकार किया जाता है। यदि एआई के ज्ञान को भारतीय जीवन-मूल्यों, समान अवसरों और नैतिकता के साथ जोड़ा जाए, तो भारत पूर्ण साक्षरता की ओर तेजी से बढ़ते हुए वैश्विक ज्ञान-अर्थव्यवस्था में अग्रणी भूमिका निभा सकता है।

आवधिक श्रम बल सर्वेक्षण 2023-24 के अनुसार सात वर्ष और उससे अधिक आयु वर्ग में भारत की साक्षरता दर 80.9 प्रतिशत है। वर्ष 2011 की जनगणना में यह लगभग 74 प्रतिशत थी। पुरुष साक्षरता 87.2 प्रतिशत और महिला साक्षरता 74.6 प्रतिशत है। ये आँकड़े प्रगति की तस्वीर तो प्रस्तुत करते हैं, लेकिन लैंगिक तथा ग्रामीण-शहरी अंतर को समाप्त करने की चुनौती अब भी हमारे सामने है।

बदल चुका है साक्षरता का अर्थ

इक्कीसवीं सदी में साक्षरता केवल पढ़ने, लिखने और सामान्य गणना करने तक सीमित नहीं रह गई है। अब डिजिटल उपकरणों को समझना, ऑनलाइन उपलब्ध सूचनाओं की सत्यता परखना, साइबर सुरक्षा के प्रति सजग रहना और एआई का विवेकपूर्ण उपयोग करना भी साक्षरता का महत्वपूर्ण हिस्सा बन चुका है।

एआई आधारित शैक्षणिक उपकरण कक्षाओं और सीखने की प्रक्रिया को नया स्वरूप दे रहे हैं। पारंपरिक कक्षा में शिक्षक के लिए प्रत्येक विद्यार्थी की क्षमता और सीखने की गति के अनुरूप पढ़ाना कठिन होता है। इसके विपरीत, एआई संचालित ‘अनुकूलित शिक्षण’ प्लेटफॉर्म विद्यार्थी की प्रगति का विश्लेषण कर उसकी आवश्यकता के अनुसार अध्ययन सामग्री उपलब्ध करा सकते हैं।

एआई शिक्षकों को उत्तर-पुस्तिकाओं के प्रारंभिक मूल्यांकन, पाठ योजना तैयार करने और अन्य प्रशासनिक कार्यों में भी सहायता दे सकता है। इससे शिक्षक विद्यार्थियों के व्यक्तिगत मार्गदर्शन, जिज्ञासा बढ़ाने और चरित्र निर्माण पर अधिक समय दे सकते हैं।

भारत जैसे बहुभाषी देश में ‘भाषिणी’ जैसे डिजिटल भाषा मंचों की भूमिका भी महत्वपूर्ण हो सकती है। अनुवाद और भाषायी तकनीक के माध्यम से कठिन विषयों की सामग्री भारतीय भाषाओं में उपलब्ध होने पर ग्रामीण तथा दूरदराज के विद्यार्थियों को ज्ञान की मुख्यधारा से जोड़ने में मदद मिलेगी।

नीतिगत प्रयास और डिजिटल शिक्षा

राष्ट्रीय शिक्षा नीति-2020 में डिजिटल साक्षरता, कम्प्यूटेशनल सोच, कोडिंग और भविष्य की तकनीकों से विद्यार्थियों को परिचित कराने पर जोर दिया गया है। मध्य एवं माध्यमिक स्तर पर एआई, मशीन लर्निंग, डेटा विज्ञान, रोबोटिक्स और इंटरनेट ऑफ थिंग्स जैसी तकनीकों के बारे में सीखने के अवसर विकसित किए जा रहे हैं।

वयस्क शिक्षा के क्षेत्र में ‘उल्लास—नव भारत साक्षरता कार्यक्रम’ 15 वर्ष और उससे अधिक आयु के गैर-साक्षर लोगों को बुनियादी पढ़ाई-लिखाई के साथ जीवन कौशल, डिजिटल और वित्तीय साक्षरता से जोड़ने का प्रयास है।

भारत ने कम लागत वाले डिजिटल ढाँचे और ऑनलाइन शिक्षा मंचों के माध्यम से बड़ी आबादी तक शैक्षणिक सामग्री पहुँचाने की क्षमता विकसित की है। फिर भी डिजिटल उपकरणों की उपलब्धता, इंटरनेट संपर्क, प्रशिक्षित शिक्षक और गुणवत्तापूर्ण स्थानीय भाषा सामग्री के मामले में राज्यों तथा सामाजिक वर्गों के बीच बड़ा अंतर बना हुआ है। इसलिए केवल डिजिटल मंच तैयार कर देना पर्याप्त नहीं होगा; उन तक समान और सुरक्षित पहुँच सुनिश्चित करना भी आवश्यक है।

सतही ज्ञान का खतरा

एआई चैटबॉट के बढ़ते उपयोग के बीच विद्यार्थियों में बिना सोचे-समझे तैयार उत्तर लेने की प्रवृत्ति भी बढ़ सकती है। इससे स्वतंत्र चिंतन, मौलिक लेखन, विश्लेषण और समस्या समाधान की क्षमता प्रभावित होने का खतरा है। ‘कॉपी-पेस्ट संस्कृति’ शिक्षा को ज्ञान अर्जित करने की प्रक्रिया के बजाय केवल उत्तर जुटाने का माध्यम बना सकती है।

इस चुनौती से निपटने के लिए विद्यार्थियों को एआई से मिले उत्तरों की सत्यता जाँचने, विभिन्न स्रोतों की तुलना करने और अपने विवेक से निष्कर्ष निकालने की शिक्षा देनी होगी। विद्यालयों को मूल्यांकन की ऐसी प्रणाली विकसित करनी चाहिए जिसमें रटने अथवा तैयार उत्तर प्रस्तुत करने के बजाय समझ, तर्क और मौलिकता को महत्व मिले।

एआई नहीं ले सकता शिक्षक का स्थान

कृत्रिम बुद्धिमत्ता कितनी भी सक्षम क्यों न हो जाए, वह शिक्षक और मानवीय संबंधों का पूर्ण विकल्प नहीं बन सकती। एआई किसी विद्यार्थी को गणित का कठिन प्रश्न हल करने में सहायता कर सकता है, लेकिन ईमानदारी, करुणा, अनुशासन, सह-अस्तित्व और नागरिक कर्तव्य जैसे मूल्य जीवंत सामाजिक वातावरण तथा मानवीय मार्गदर्शन से ही विकसित होते हैं।

इसलिए आधुनिक शिक्षा का आदर्श स्वरूप भारतीय संस्कारों और आधुनिक तकनीक का संतुलित संगम होना चाहिए। एआई के दौर में शिक्षक की भूमिका कम नहीं, बल्कि अधिक महत्वपूर्ण हो गई है। शिक्षक अब केवल सूचना देने वाला नहीं, बल्कि विद्यार्थी का मार्गदर्शक, प्रेरक और नैतिक दिशा-निर्देशक भी है।

शिक्षा का व्यावसायीकरण

डिजिटल क्रांति के साथ शिक्षा में व्यावसायीकरण और वास्तविक ज्ञानवर्धन के बीच बहस भी तेज हुई है। कई निजी एड-टेक कंपनियाँ और कोचिंग संस्थान एआई तथा डिजिटल उपकरणों को शिक्षा सुधार के बजाय ब्रांडिंग और बिक्री के माध्यम के रूप में प्रस्तुत करते हैं। महँगे पाठ्यक्रम और सशुल्क एआई उपकरण सामाजिक-आर्थिक असमानता बढ़ा सकते हैं।

मशीनों पर अत्यधिक निर्भरता से बच्चों के सामाजिक संपर्क, सहानुभूति, खेल, कला और व्यावहारिक अनुभवों में भी कमी आ सकती है। इसलिए डिजिटल शिक्षा की नीतियों में बच्चों की निजता, डेटा सुरक्षा, स्क्रीन समय और एआई के नैतिक उपयोग के स्पष्ट मानक होने चाहिए।

भारत के सामने अब केवल साक्षरता दर बढ़ाने का लक्ष्य नहीं है। चुनौती ऐसी साक्षरता विकसित करने की है जो व्यक्ति को डिजिटल दुनिया में सुरक्षित, विवेकशील, आत्मनिर्भर और जिम्मेदार नागरिक बनाए। तकनीक तभी सार्थक होगी, जब वह शिक्षा को अधिक मानवीय, समावेशी और ज्ञानपरक बनाने में सहायक बने।

Bharat Sarathi
Author: Bharat Sarathi

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