अल्फाज, अंदाज और आवाज से शायरों ने लूटी महफिल, उम्दा ग़ज़लें सुन श्रोता हुए मंत्रमुग्ध
गुरुग्राम, 6 सितंबर। सुरुचि परिवार के तत्वावधान में रविवार को सेक्टर-4 स्थित सीसीए स्कूल के सभागार में ‘एक शाम—दीक्षित दनकौरी के नाम’ साहित्यिक कार्यक्रम का आयोजन किया गया। प्रख्यात ग़ज़लकार दीक्षित दनकौरी सहित नीना सहर, गार्गी कौशिक और राजीव सिंहल ने अपनी रचनाओं से श्रोताओं को मंत्रमुग्ध कर दिया।
कार्यक्रम की अध्यक्षता डॉ. धनीराम अग्रवाल ने की, जबकि प्राचार्य निर्मल यादव मुख्य अतिथि रहीं। सचिव त्रिलोक कौशिक ने कार्यक्रम का संचालन किया। वीणा अग्रवाल की मधुर सरस्वती वंदना से साहित्यिक संध्या का शुभारंभ हुआ।
दनकौरी की ग़ज़लों ने जीता दिल
दीक्षित दनकौरी ने करीब एक घंटे तक अपनी चुनिंदा ग़ज़लें प्रस्तुत कीं। श्रोताओं की फरमाइश पर भी उन्होंने कई रचनाएं सुनाईं। जिंदगी के संघर्ष और उम्मीद को व्यक्त करते हुए उन्होंने पढ़ा—

लाख तूफां हों, पार जाना भी है,
चोट खाना भी है, मुस्कराना भी है।
नाव को हर बला से बचाना भी है,
पार लगना भी है और लगाना भी है।
उनकी शायरी में व्यंग्य, करुणा, आत्मविश्वास और स्वाभिमान के विविध रंग दिखाई दिए—
मैं सुन सकता हूं तेरी खामोशी भी,
मैं गूंगा हूं, बहरा नहीं हूं।
मेरी नाकामियों पर तंज मत कर,
टूटा हूं अभी, बिखरा नहीं हूं।
सुरुचि सम्मान से अलंकृत दनकौरी ने अपनी सादगी का परिचय देते हुए कहा—
मेरी ग़ज़ल, नज़्म, रुबाई सब मिट्टी,
तुझ तक ही जब पहुंच न पाई, सब मिट्टी।
अन्य शायरों को भी मिला भरपूर प्यार
गार्गी कौशिक की शायरी को भी श्रोताओं ने खूब सराहा। उन्होंने पढ़ा—

तुमने कैसा सवाल रखा है,
उलझन में डाल रखा है।
हम तो उनको कभी का खो देते,
वो तो तुमने संभाल रखा है।
नीना सहर ने बदलती सामाजिक परंपराओं पर कहा—
जो हममें है, हमारे बच्चों में नहीं है,
रवायतें आखिरी हैं—हम लोग।
राजीव सिंहल ने अपनी ग़ज़ल की बानगी पेश करते हुए पढ़ा—
मुझी पर जुर्म करने के लिए,
वो इजाजत मुझसे पाना चाहता है।
वो जो हर लम्हा तेरे साथ गुजरा,
वही हमसे चुराना चाहता है।
त्रिलोक कौशिक ने अपनी रचना में कहा—
आपने अपने मन को उचारा बांसुरी में,
इसमें राधिका की पीर आनी चाहिए थी।
‘संघर्षों से बनाया महत्वपूर्ण स्थान’
इससे पूर्व डॉ. धनीराम अग्रवाल की नवप्रकाशित पुस्तक ‘आत्मकथ्य’ पर विचार रखते हुए प्राचार्य निर्मल यादव ने कहा कि डॉ. अग्रवाल ने जीवन के अनेक संघर्षों से उबरकर समाज में अपना महत्वपूर्ण स्थान बनाया है।
डॉ. धनीराम अग्रवाल ने कहा, “मुझे धोखे तो मिले, लेकिन बचाने वाले भी निरंतर मिलते रहे।” उन्होंने अल्फाज, अंदाज और आवाज के जरिये महफिल को यादगार बनाने वाले सभी शायरों की मुक्तकंठ से प्रशंसा की। मदन साहनी ने अपने दो शिष्यों प्रशांत और सुमित की जीवन-यात्रा का उल्लेख किया तो श्रोताओं की आंखें नम हो गईं।
कार्यक्रम में पिंकी गुप्ता, दीपशिखा श्रीवास्तव, सुरेंद्र मनचंदा, हरिंद्र यादव, नीरज श्रीवास्तव, सविता स्याल, लोकेश चौधरी, कमलेश पालीवाल, रविंद्र यादव, हरीश कुमार, प्रमोद कुमार, मीनाक्षी सक्सेना, अरुणा अदलखा, सुभाष अदलखा, मेघना शर्मा, शिवप्रसाद तिवारी और अनिल श्रीवास्तव सहित अनेक साहित्यप्रेमी उपस्थित रहे।








