स्टेम सेल, टिश्यू इंजीनियरिंग और 3डी बायोप्रिंटिंग ने जगाई उम्मीद, लेकिन पूर्ण विकसित प्रत्यारोपण योग्य अंग बनाने में अभी कई चुनौतियां
डॉ. विजय गर्ग

एक ऐसे भविष्य की कल्पना कीजिए, जब किडनी, लिवर, हृदय या किसी अन्य महत्वपूर्ण अंग की प्रतीक्षा कर रहे मरीजों को पूरी तरह मानव अंगदाताओं पर निर्भर न रहना पड़े। वैज्ञानिक इसी संभावना को वास्तविकता में बदलने के लिए प्रयोगशालाओं में मानव ऊतक और अंग विकसित करने की दिशा में काम कर रहे हैं।
स्टेम सेल से बन रहे ऊतक
स्टेम सेल, टिश्यू इंजीनियरिंग और 3डी बायोप्रिंटिंग जैसी उन्नत तकनीकों की सहायता से जीवित ऊतक तैयार किए जा रहे हैं। स्टेम सेल शरीर की विभिन्न प्रकार की कोशिकाओं में विकसित होने की क्षमता रखते हैं। विशेष जैव-सामग्री से बनाया गया ढांचा इन कोशिकाओं को बढ़ने और ऊतक का आकार लेने में सहायता करता है।
3डी बायोप्रिंटिंग में जीवित कोशिकाओं और जैव-सामग्री की परतें अत्यंत सटीक ढंग से जमाई जाती हैं। इसका उद्देश्य प्राकृतिक अंगों जैसी संरचना तैयार करना है।
छोटे ‘ऑर्गेनॉइड’ बने बड़ी उपलब्धि
वैज्ञानिक किडनी, लिवर, आंत, मस्तिष्क और अन्य अंगों के छोटे तथा सरल प्रतिरूप विकसित करने में महत्वपूर्ण सफलता प्राप्त कर चुके हैं। इन्हें ‘ऑर्गेनॉइड’ कहा जाता है। ये पूर्ण अंग नहीं होते, लेकिन किसी वास्तविक अंग की कुछ संरचनाओं और कार्यप्रणालियों की नकल कर सकते हैं।
इन प्रयोगशाला-विकसित ऊतकों से वैज्ञानिकों को बीमारियों की प्रक्रिया समझने, मरीज के अनुरूप उपचार खोजने और नई दवाओं की प्रभावशीलता तथा दुष्प्रभावों का परीक्षण करने में सहायता मिल रही है।
प्रत्यारोपण की राह अभी कठिन
पूरी तरह कार्यशील और प्रत्यारोपण योग्य हृदय, किडनी या लिवर विकसित करना अभी बड़ी वैज्ञानिक चुनौती है। किसी अंग को जीवित रखने के लिए रक्त वाहिकाओं का जटिल जाल, तंत्रिकाओं का संपर्क, पर्याप्त मजबूती और शरीर के साथ तालमेल आवश्यक होता है।
यह सुनिश्चित करना भी जरूरी है कि प्रत्यारोपण के बाद शरीर नए अंग को अस्वीकार न करे तथा उसमें अनियंत्रित कोशिका वृद्धि या अन्य गंभीर समस्या उत्पन्न न हो। बड़े पैमाने पर उत्पादन, गुणवत्ता की जांच, लागत और नैतिक नियमों से जुड़े प्रश्न भी अभी शेष हैं।
अंगों की कमी हो सकती है दूर
अब तक हुई प्रगति उत्साहजनक है। भविष्य में मरीज की अपनी कोशिकाओं से अंग या ऊतक विकसित किए जा सके तो प्रतिरक्षा-अस्वीकृति का खतरा घट सकता है। इससे अंगदाताओं की कमी कम करने और प्रत्यारोपण को अधिक लोगों के लिए सुलभ बनाने में सहायता मिल सकती है।
हालांकि यह कहना जल्दबाजी होगी कि प्रयोगशालाओं में बने पूर्ण मानव अंग निकट भविष्य में सामान्य रूप से उपलब्ध हो जाएंगे। फिलहाल ऊतकों, ऑर्गेनॉइड और सीमित जैविक संरचनाओं का विकास इस दिशा में मजबूत आधार तैयार कर रहा है।
जो कभी विज्ञान-कथा जैसा लगता था, वह धीरे-धीरे वैज्ञानिक संभावना बनता जा रहा है। आने वाले समय में प्रयोगशाला केवल ज्ञान और अनुसंधान का केंद्र ही नहीं, बल्कि जीवन बचाने वाले नए ऊतकों, अंगों और उम्मीदों का जन्मस्थान भी बन सकती है।






