मर रहा सूचना का अधिकार, निष्क्रिय होकर देख रही सरकार

👇समाचार सुनने के लिए यहां क्लिक करें

सूचना आयोगों में चार लाख से अधिक मामले लंबित; खाली पदों, कमजोर व्यवस्था और सरकारी उदासीनता ने बेअसर किया पारदर्शिता का कानून

डॉ. शैलेश शुक्ला

सूचना का अधिकार आज स्वयं सांस लेने के लिए संघर्ष कर रहा है और सरकार मूकदर्शक बनी हुई है। जिस कानून ने आम नागरिक को अफसरों से सवाल पूछने और सरकारी कामकाज का हिसाब मांगने की शक्ति दी थी, वही आज अपनी सुनवाई की प्रतीक्षा कर रहा है।

देश में एक केंद्रीय और 28 राज्य सूचना आयोग हैं। जून 2025 तक इन आयोगों में कुल 4,13,972 अपील और शिकायतें लंबित थीं। केंद्रीय सूचना आयोग के संबंध में सरकार ने फरवरी 2026 में राज्यसभा को बताया कि वहां 29,034 अपील और 3,577 शिकायतें यानी कुल 32,611 मामले लंबित थे। अगस्त 2026 में पोर्टल पर यह संख्या 40 हजार को पार कर गई। इनमें 36,350 अपील और 3,733 शिकायतें शामिल थीं।

इसका सीधा अर्थ यह है कि गांव के हैंडपंप, राशन कार्ड, छात्रवृत्ति अथवा किसी सरकारी योजना की जानकारी मांगने वाले व्यक्ति की दूसरी अपील की सुनवाई दो वर्ष बाद हो सकती है। तब तक संबंधित अधिकारी सेवानिवृत्त हो चुका होगा, उसका तबादला हो जाएगा या मांगी गई जानकारी का उद्देश्य ही समाप्त हो जाएगा।

खाली कुर्सियों ने बढ़ाया संकट

लंबित मामलों की यह भीड़ केवल आवेदनों की अधिकता से नहीं, बल्कि सूचना आयुक्तों के पद लंबे समय तक खाली रखने से पैदा हुई है। अक्टूबर 2025 में सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई के दौरान बताया गया था कि केंद्रीय सूचना आयोग में मुख्य सूचना आयुक्त का पद 14 सितंबर 2025 से खाली था। दस सूचना आयुक्तों में से आठ पद भी रिक्त थे। जब दस में से आठ कुर्सियां खाली होंगी तो आयोग अपना काम कैसे करेगा?

राज्यों की स्थिति और भी खराब रही है। जुलाई 2024 से अक्टूबर 2025 के बीच देश के 29 में से छह सूचना आयोग अलग-अलग अवधियों में पूरी तरह निष्क्रिय रहे, क्योंकि वहां एक भी आयुक्त उपलब्ध नहीं था। अक्टूबर 2025 तक हिमाचल प्रदेश और झारखंड के आयोग भी ऐसी स्थिति का सामना कर रहे थे। जब आयोग ही काम नहीं करेगा तो नागरिक न्याय मांगने कहां जाएगा?

दूसरी समस्या पुरानी और धीमी कार्यप्रणाली है। एक आयुक्त वर्ष में औसतन करीब 2,800 मामलों का निपटारा करता है, जबकि अनेक आयोगों में हर वर्ष हजारों नए मामले पहुंचते हैं। नतीजा यह है कि एक गड्ढा भरने तक दो नए गड्ढे बन जाते हैं। वर्तमान गति से लंबित मामलों का ढेर समाप्त होना संभव नहीं दिखाई देता।

जानकारी छिपाने से बढ़ रहा बोझ

तीसरी और सबसे गंभीर समस्या सरकार की मंशा तथा विभागों की जवाबदेही से जुड़ी है। सूचना का अधिकार कानून की धारा 4(1)(बी) के तहत प्रत्येक सरकारी विभाग को अपने संगठन, अधिकारियों, बजट, वेतन, नियमों, योजनाओं, ठेकों, सब्सिडी के लाभार्थियों और निर्णय प्रक्रिया सहित 17 श्रेणियों की जानकारी स्वयं सार्वजनिक करनी होती है। इसे स्वतः प्रकटीकरण कहा जाता है।

कानून की मूल भावना यह थी कि अधिकतम जानकारी पहले से सार्वजनिक होगी तो नागरिकों को आरटीआई आवेदन लगाने की आवश्यकता कम पड़ेगी। वास्तविकता यह है कि बड़ी संख्या में विभाग इसका ठीक ढंग से पालन नहीं करते। कहीं वेबसाइट पर वर्षों पुरानी जानकारी पड़ी है तो कहीं आवश्यक विवरण उपलब्ध ही नहीं है। परिणामस्वरूप एक ही तरह की जानकारी के लिए हजारों आवेदन आते हैं और सूचना आयोगों पर बोझ बढ़ता जाता है। यह बोझ काफी हद तक सरकार और उसके विभागों ने स्वयं पैदा किया है।

लंबित फाइलें नहीं, टूटता जनविश्वास

चार लाख से अधिक लंबित मामले केवल सरकारी फाइलें नहीं, बल्कि लाखों नागरिकों के टूटते भरोसे की कहानी हैं। इसी कानून के माध्यम से अनेक घोटालों, अनियमितताओं और सरकारी खर्च से जुड़े तथ्यों पर से पर्दा उठा। इसी ने गरीब को पेंशन, छात्र को उत्तरपुस्तिका, किसान को मुआवजे और नागरिक को विकास कार्यों का हिसाब मांगने की शक्ति दी।

यदि अपील की सुनवाई दो साल बाद होगी तो जानकारी रोकने वाले अधिकारी के मन से कार्रवाई का डर समाप्त हो जाएगा। वह सोचेगा कि अपील होगी तो वर्षों तक मामला टलता रहेगा और तब तक उसका तबादला हो जाएगा। जवाबदेही का यह डर समाप्त होना भ्रष्टाचार की जीत है।

सरकारें अक्सर आरटीआई के दुरुपयोग की बात करती हैं, लेकिन दुरुपयोग की आड़ में इसके वास्तविक उपयोग को कमजोर नहीं किया जा सकता। समय पर नियुक्तियां न करना, पर्याप्त स्टाफ और बजट उपलब्ध न कराना तथा आयोगों को निष्क्रिय छोड़ देना कानून को औपचारिक रूप से रद्द किए बिना कमजोर करने जैसा है।

पांच कदमों से सुधर सकती है व्यवस्था

सबसे पहले सूचना आयुक्तों की नियुक्ति का निश्चित कैलेंडर बनाया जाना चाहिए। किसी आयुक्त का कार्यकाल समाप्त होने से कम से कम तीन महीने पहले चयन प्रक्रिया शुरू हो। कोई पद 30 दिन से अधिक खाली रहे तो संबंधित विभाग और अधिकारी की जवाबदेही तय की जाए।

दूसरा, मामलों के अनुपात में आयुक्तों और सहायक कर्मचारियों की संख्या बढ़ाई जाए। अधिक लंबित मामलों वाले आयोगों में अतिरिक्त पीठ गठित कर सुनवाई की गति तेज की जा सकती है।

तीसरा, धारा 4 को आरटीआई व्यवस्था का वास्तविक आधार बनाया जाए। प्रत्येक विभाग के लिए 17 निर्धारित श्रेणियों की जानकारी हर तीन महीने में अपडेट करना अनिवार्य हो। इसका स्वतंत्र एजेंसी से वार्षिक ऑडिट कराया जाए और विभागों की सार्वजनिक रैंकिंग जारी की जाए। खराब प्रदर्शन करने वाले विभाग प्रमुखों की जवाबदेही भी तय हो। जानकारी पहले से वेबसाइट पर उपलब्ध होगी तो आरटीआई आवेदनों की संख्या अपने आप काफी कम हो जाएगी।

चौथा, सुनवाई को ऑनलाइन, सुलभ और समयबद्ध बनाया जाए। आज भी कई आवेदकों को सुनवाई के लिए सैकड़ों किलोमीटर दूर जाना पड़ता है। वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग को स्थायी व्यवस्था बनाया जाए और दूसरी अपीलों के निस्तारण की अधिकतम समय-सीमा कानून में निर्धारित की जाए।

पांचवां, जुर्माने का डर वापस लाया जाए। कानून की धारा 20 में सूचना देने में अनुचित देरी करने वाले जन सूचना अधिकारी पर प्रतिदिन 250 रुपये और अधिकतम 25 हजार रुपये तक जुर्माना लगाने का प्रावधान है। आयोगों द्वारा इसका प्रभावी प्रयोग नहीं किए जाने से यह व्यवस्था कमजोर हो गई है। जब तक लापरवाही की व्यक्तिगत जवाबदेही तय नहीं होगी, सूचना रोकने की प्रवृत्ति समाप्त नहीं होगी।

पारदर्शिता कमजोर तो भ्रष्टाचार मजबूत

आरटीआई को कमजोर करने का असर केवल सूचना आयोगों पर नहीं, बल्कि पूरी शासन व्यवस्था पर पड़ता है। समय पर जानकारी न मिलने से योजनाओं की गड़बड़ियां छिपी रहती हैं। मनरेगा की मजदूरी, अस्पतालों में दवाओं की खरीद, स्कूलों में मध्याह्न भोजन और विकास कार्यों पर हुए खर्च का हिसाब अंधेरे में चला जाता है। आखिरकार गांव और कस्बे का सामान्य नागरिक थककर चुप हो जाता है।

कई विभाग आरटीआई आवेदन को एक कार्यालय से दूसरे कार्यालय में भेजकर टालने का प्रयास करते हैं। कहीं धारा 6(3) के नाम पर विलंब होता है तो कहीं धारा 8(1)(जे) का व्यापक अर्थ निकालकर सार्वजनिक हित की सूचना को भी व्यक्तिगत जानकारी बताकर रोक दिया जाता है। निजी जानकारी और सार्वजनिक धन के उपयोग में स्पष्ट अंतर करना आवश्यक है। किसी व्यक्ति के मेडिकल रिकॉर्ड निजी हो सकते हैं, लेकिन सरकारी खजाने से हुए कुल खर्च की जानकारी सार्वजनिक की जा सकती है। इससे निजता भी बचेगी और पारदर्शिता भी बनी रहेगी।

सुधार तभी संभव है जब सरकार आरटीआई को बोझ नहीं, सुशासन का सहायक माने। ईमानदार अधिकारी के लिए यह कानून सुरक्षा कवच है, क्योंकि वह कह सकता है कि उसके विभाग की प्रत्येक जानकारी सार्वजनिक है। डर उसी को लगता है जो कुछ छिपाना चाहता है।

केंद्रीय और राज्य सूचना आयोगों की वेबसाइटों पर विभागवार रैंकिंग, ऑडिट रिपोर्ट, लंबित मामलों और प्रतिदिन हुए निस्तारण की स्थिति प्रदर्शित होनी चाहिए, ताकि जनता स्वयं व्यवस्था की निगरानी कर सके।

सूचना का अधिकार किसी एक राजनीतिक दल का नहीं, जनता का कानून है। इसने सामान्य नागरिक को कलेक्टर के कार्यालय में जाकर हिसाब मांगने का साहस दिया। चार लाख से अधिक लंबित मामले बताते हैं कि जनता आज भी सवाल पूछना चाहती है, लेकिन व्यवस्था समय पर जवाब देने को तैयार नहीं है।

यदि सरकार वास्तव में पारदर्शिता में विश्वास करती है तो उसे सबसे पहले सूचना आयोगों को सक्रिय करना होगा। उन्हें पर्याप्त आयुक्त, कर्मचारी, बजट और अधिकार देने होंगे। अन्यथा इतिहास यही लिखेगा कि एक कानून ने जनता को सत्ता से सवाल पूछने की ताकत दी थी और सरकार ने कुर्सियां खाली रखकर उसी कानून को धीरे-धीरे मार दिया।

Bharat Sarathi
Author: Bharat Sarathi

Leave a Comment

और पढ़ें