राजनैतिक द्वेष की आग में देश न जलाएँ

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वंदे मातरम् और युवाओं के कंधों पर राजनीति की बंदूक रखना खतरनाक

डॉ. घनश्याम बादल

देश इस समय राजनीतिक उबाल के ऐसे दौर से गुजर रहा है, जहां मुद्दों से अधिक उन पर मचाया जा रहा शोर दिखाई देता है। ‘वंदे मातरम्’ को लेकर सत्ता पक्ष और विपक्ष आमने-सामने हैं। दोनों ओर से एक-दूसरे को राष्ट्रवादी अथवा राष्ट्रविरोधी साबित करने की होड़ लगी है। दूसरी तरफ परीक्षाओं में कथित धांधली और अनियमितताओं के खिलाफ युवाओं का आक्रोश जंतर-मंतर से झारखंड तक सड़कों पर दिखाई दिया है।

भर्ती और प्रवेश परीक्षाओं को लेकर असंतोष इतना बढ़ा कि कई मामलों में परीक्षाएं रद्द करनी पड़ीं और जांच के आदेश दिए गए। इसी विवाद के बीच केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान का इस्तीफा भी हुआ। राष्ट्रपति सचिवालय ने 25 जुलाई 2026 को उनका इस्तीफा स्वीकार किया और प्रह्लाद जोशी को शिक्षा मंत्रालय का अतिरिक्त प्रभार सौंपा। हालांकि, आधिकारिक विज्ञप्ति में इस्तीफे का कारण नहीं बताया गया है।

इसी बीच वर्ष 2027 के उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव की आहट ने राजनीतिक तापमान और बढ़ा दिया है। प्रदेश में योगी आदित्यनाथ और अखिलेश यादव के बीच राजनीतिक टकराव हो अथवा राष्ट्रीय स्तर पर राहुल गांधी, नरेंद्र मोदी और अमित शाह के बीच तीखी बयानबाजी—ऐसा लगता है कि राजनीति ने संवाद के बजाय संघर्ष को अपना स्थायी हथियार बना लिया है।

यह केवल राजनीतिक प्रतिस्पर्धा नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक विमर्श के लिए खतरे की घंटी है।

सवाल पूछना अपराध नहीं

राहुल गांधी आज विपक्ष के सबसे मुखर चेहरों में शामिल हैं। छात्र आंदोलनों से लेकर सरकार की नीतियों तक वह लगातार आक्रामक रुख अपनाए हुए हैं। छात्र प्रदर्शनों के दौरान हुई पुलिस कार्रवाई को लेकर विपक्ष ने गृह मंत्री अमित शाह से जवाब और इस्तीफे की मांग तक उठाई। धरना-प्रदर्शनों के माध्यम से भी सरकार को घेरने की कोशिश हुई।

सत्ता पक्ष भी पीछे नहीं रहा। भाजपा नेताओं ने विपक्ष के तेवरों को राजनीतिक प्रचार का हथकंडा बताया। ‘वंदे मातरम्’ विवाद में अमित शाह ने कांग्रेस पर तीखा हमला करते हुए उसके रुख को राष्ट्रविरोध और तुष्टीकरण की राजनीति से जोड़ दिया। यहीं से असली चिंता पैदा होती है।

विपक्ष का काम सरकार से सवाल पूछना है, लेकिन हर सवाल को राजनीतिक युद्ध में बदल देना स्वस्थ लोकतंत्र का संकेत नहीं। इसी तरह सत्ता का काम जवाब देना है, लेकिन प्रत्येक आलोचक को राष्ट्रविरोधी ठहरा देना भी लोकतंत्र की सेहत के लिए ठीक नहीं है।

राहुल गांधी जितने आक्रामक होंगे, भाजपा उतने ही तीखे पलटवार करेगी। नरेंद्र मोदी और अमित शाह की राजनीतिक शैली भी विरोधियों को घेरने में पीछे नहीं रहती। नतीजा यह है कि बहस अक्सर इस पर टिक जाती है कि कौन कितना बड़ा देशभक्त है और कौन राष्ट्रविरोधी।

युवाओं के सवालों का जवाब कौन देगा?

जनता पूछ रही है कि इस राजनीतिक युद्ध में उसके हिस्से क्या आया? क्या बेरोजगार युवा को नौकरी मिली? परीक्षा की तैयारी में लगाए गए उसके वर्षों की भरपाई कौन करेगा? पेपर लीक और भर्ती अनियमितताओं को रोकने का स्थायी उपाय क्या है? क्या महंगाई, शिक्षा, स्वास्थ्य और रोजगार जैसे प्रश्न राजनीतिक प्राथमिकताओं के केंद्र में हैं?

यही वे सवाल हैं, जिनसे राजनीतिक विमर्श बार-बार भटकता दिखाई देता है।

युवाओं का आक्रोश किसी दल की राजनीतिक संपत्ति नहीं है। उनकी नाराजगी के पीछे बेरोजगारी, परीक्षा प्रणाली की खामियां, परिणामों में देरी और प्रशासनिक जवाबदेही की कमी जैसे वास्तविक प्रश्न हैं। राजनीतिक दल यदि इस आक्रोश को केवल अपने पक्ष में इस्तेमाल करेंगे तो वे समस्या का समाधान नहीं, उसका राजनीतिक दोहन करेंगे।

युवाओं के कंधों पर राजनीति की बंदूक रखकर चुनावी निशाना साधना किसी भी दल के लिए उचित नहीं है।

किसी दल की जागीर नहीं ‘वंदे मातरम्’

‘वंदे मातरम्’ किसी राजनीतिक दल की जागीर नहीं है। वह भारत के स्वतंत्रता संग्राम की गौरवपूर्ण स्मृति और राष्ट्रीय चेतना का प्रतीक है। उसका सम्मान प्रत्येक भारतीय के लिए स्वाभाविक होना चाहिए।

लेकिन राष्ट्रगीत को राजनीतिक तलवार बनाकर विपक्ष को राष्ट्रविरोधी अथवा सत्ता पक्ष को राष्ट्रवाद का अकेला ठेकेदार घोषित करना—दोनों ही खतरनाक प्रवृत्तियां हैं। राष्ट्रवाद का प्रमाणपत्र संसद या चुनावी मंच से नहीं बांटा जाना चाहिए। राष्ट्रभक्ति का अंतिम पैमाना यह भी नहीं हो सकता कि किसने कितनी ऊंची आवाज में नारा लगाया।

देशभक्ति को किसी राजनीतिक दल के प्रमाणपत्र की आवश्यकता नहीं है।

विपक्ष को भी यह समझना होगा कि केवल सरकार के विरोध में आक्रामक होना पर्याप्त नहीं है। राहुल गांधी और विपक्ष के सामने युवाओं के वास्तविक सवालों को राजनीतिक नारों से आगे ले जाकर ठोस नीति और वैकल्पिक कार्यक्रम में बदलने का अवसर है।

सरकार पर आरोप लगाना आसान है, लेकिन यह बताना कठिन है कि सत्ता में आने पर परीक्षा व्यवस्था को पारदर्शी कैसे बनाया जाएगा, रोजगार कैसे बढ़ाया जाएगा और प्रशासनिक जवाबदेही कैसे सुनिश्चित होगी। इसी कसौटी पर विपक्ष की भी परीक्षा होनी चाहिए।

मजबूत सरकार के साथ मजबूत असहमति भी जरूरी

यही कसौटी सत्ता पक्ष पर भी लागू होती है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और अमित शाह की राजनीतिक ताकत निर्विवाद रूप से बड़ी है, लेकिन बड़ी राजनीतिक शक्ति के साथ बड़ी जिम्मेदारी भी आती है। लोकतंत्र में सरकार मजबूत होनी चाहिए, मगर असहमति को भी मजबूती से अपनी बात रखने का अधिकार होना चाहिए।

उत्तर प्रदेश में योगी आदित्यनाथ और अखिलेश यादव का राजनीतिक संघर्ष चुनाव नजदीक आने के साथ और तीखा होना स्वाभाविक है। चुनावी राजनीति में नीतियों की आलोचना होनी चाहिए तथा उपलब्धियों और विफलताओं पर बहस भी होनी चाहिए। लेकिन यदि चुनाव जीतने की रणनीति समाज को जाति, धर्म, क्षेत्र और राष्ट्रवाद की भावनात्मक रेखाओं पर बांटने लगे तो चुनाव भले जीता जा सकता है, समाज नहीं।

इसी तरह बाबा रामदेव हों, अरविंद केजरीवाल हों अथवा सार्वजनिक जीवन में प्रभाव रखने वाला कोई अन्य व्यक्ति—सभी को समझना होगा कि उनके शब्द केवल बयान नहीं होते, वे सामाजिक वातावरण भी बनाते हैं। इसलिए सार्वजनिक जीवन में सक्रिय प्रत्येक व्यक्ति की जिम्मेदारी है कि वह आग में घी डालने के बजाय विवेक की आवाज बने।

बुद्धिजीवियों की चुप्पी भी खतरनाक

इस दौर में बुद्धिजीवी वर्ग की जिम्मेदारी अत्यंत महत्वपूर्ण है। यदि बुद्धिजीवी केवल तालियां बजाने अथवा निंदा करने तक सीमित रह गए तो लोकतंत्र कमजोर होगा। उन्हें सत्ता से भी सवाल पूछने चाहिए और विपक्ष को भी कठघरे में खड़ा करना चाहिए।

राष्ट्रवाद के नाम पर होने वाले राजनीतिक ध्रुवीकरण पर भी बोलना होगा और विपक्ष की अति-आक्रामक राजनीति पर भी। लोकतंत्र में तटस्थता का अर्थ चुप्पी नहीं, बल्कि सत्ता और विपक्ष के लिए समान कसौटी अपनाना है।

नेताओं को भी यह चेतावनी समझनी होगी कि देश चुनावों से चलता अवश्य है, लेकिन केवल चुनावों के लिए नहीं चलता। प्रत्येक मुद्दे को चुनावी चश्मे से देखा जाएगा तो शिक्षा और रोजगार पीछे छूट जाएंगे, विकास आरोप-प्रत्यारोप में दब जाएगा तथा राष्ट्रहित दलगत हितों में उलझकर रह जाएगा।

देश बड़ा है, दल छोटे हैं

राजनीति को याद रखना होगा कि चुनाव पांच वर्ष के लिए होते हैं, लेकिन समाज पीढ़ियों तक रहता है। इसलिए राहुल गांधी की आक्रामकता हो अथवा मोदी-शाह का पलटवार, योगी-अखिलेश का संघर्ष हो या अन्य नेताओं की बयानबाजी—हर किसी को अपनी राजनीतिक मर्यादा पहचाननी होगी। सत्ता को अहंकार और विपक्ष को अति-आक्रामकता से बचना होगा।

जनता को भी केवल नारों पर नहीं, काम के आधार पर मतदान करना सीखना होगा। उसे पूछना होगा कि राष्ट्रवाद की बात करने वालों ने राष्ट्र के लिए क्या किया? सरकार से सवाल पूछने वालों के पास समाधान क्या है? युवाओं के भविष्य की चिंता जताने वाले उनके लिए कौन-सी ठोस नीति लेकर आए हैं?

लोकतंत्र में सबसे बड़ा हथियार नारा नहीं, जागरूक मतदाता है।

देश को ‘वंदे मातरम्’ पर लड़ने वाले नहीं, उसकी भावना को व्यवहार में उतारने वाले नेता चाहिए। राष्ट्रवाद की आग इतनी न भड़काई जाए कि उसमें लोकतांत्रिक मर्यादाएं ही जलने लगें।

याद रखिए—देश बड़ा है, दल छोटे हैं। संविधान बड़ा है, सत्ता छोटी है। जनता सर्वोपरि है और नेता उसके प्रतिनिधि हैं। राजनीति यदि यह भूल गई तो जनता को उसे याद दिलाना होगा—केवल मतपेटी के दिन नहीं, बल्कि हर दिन जागरूक नागरिक बनकर।

Bharat Sarathi
Author: Bharat Sarathi

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