संस्कारों की भूल भुलैया

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डॉ. नीरज भारद्वाज

भारतीय ज्ञान परंपरा पर विदेशों में अध्ययन अध्यापन किया जा रहा है। इसके विपरीत अपने ही देश में भारतीय ज्ञान परंपरा पराई नजर आ रही है। विचार करें तो हमारी ज्ञान परंपरा में शिक्षा के साथ-साथ सामाजिक व्यवहार भी बड़ा हिस्सा है। आज हमारे समाज और शिक्षा दोनों में ही विदेशीपन का बोलबाला तेजी से बढ़ रहा है। समाज तेजी से टूट रहा है,लोग गांव से नगर और महानगर की ओर बढ़ रहे हैं। विदेशी भाषाओं के चलते विदेशी संस्कृति और परंपरा लोगों के बीच पैर पसार रही है।

भाषा व्यक्ति का विकास करती है, उसे संस्कारवान बनाती है। हमारे युवा धीरे-धीरे अपने समाज, संस्कृति, शिक्षा, परंपरा, भाषा से दूर होते जा रहे हैं। विदेशी भाषा केवल भाषा नहीं होती, वह संस्कृति और संस्कार का भी बहुत बड़ा काम करती है। आज की युवा पीढ़ी उसे ही पढ़ना चाहती है। आज विदेशी भाषा में काम करने के चलते ही ऐसा दिखाई दे रहा है और युवा पीढ़ी संस्कार विमुख नजर आती है। आज बार-बारजनरेशन जेड शब्द सुनाईदे रहा है। पीढ़ियों को मापने का यह भारतीय मानक या आंकड़े नहीं है। यह सभी विदेशी ताकत और उनकी चाल है जो अलग-अलग वर्षों में पैदा होने वाली पीढ़ी को अपने हिसाब से गढ़ती और बनाती है।

विचार करें तो नेपाल, बांग्लादेश, श्रीलंका और अब भारत में जनरेशन जेड विरोध प्रदर्शन, धरना, आंदोलन, अनशन कर रहे हैं। सत्ता से सीधे टकरा रहे हैं, वह हर कीमत पर सरकार को उखाड़ फेंकना चाह रहे हैं जबकि नजर दौड़ाकर देखें तो हमें पता चलता है कि आज अमेरिका पूरे विश्व को अशांत किए हुए हैं। जब चाहे किसी भी देश पर हमला कर दे रहा है। पूरे विश्व की अर्थव्यवस्था को मिट्टी में मिलने का काम कर रहा है। मानवता को शर्मसार कर रहा है, युद्ध में लोग मर रहे हैं लेकिन वहां का जनरेशन जेड अपनी सरकार के विरोध में सड़कों पर क्यों नहीं आ रहा है? यदि वह सड़कों पर आ भी रहा है तो दिखाई और सुनाई क्यों नहीं पड़ रहा है? मीडिया में कहीं भी उनकी खबर क्यों नहीं है? क्या वहां का जनरेशन जेड सोया हुआ है? या किसी कारण से दबा कर शांत किया हुआ है? ये भी बड़े प्रश्न हैं, जिसका उत्तर हमें खोजना चाहिए।

दूसरी ओर विचार करके देखें तो जनरेशन जेड शब्द विदेश से ही आया है। उन्होंने ही पैमाने बनाएं हैं, किस समयावधि का युवा क्या कहलाया जायेगा जबकि ध्यान देकर देख तो भारतवर्ष में तो सामाजिक परंपरा बहुत विशाल और व्यापक है। यहां तो पीढ़ी दर पीढ़ी हम अपने परदादा, दादा, माता-पिता, नाना-नानी, रिश्तेदार, समाज, गांव आदि का सम्मान करते आए हैं और आगे भी करते रहेंगे। राष्ट्र हमारे लिए सर्वोपरि है। हम राष्ट्र के लिए बने हैं और राष्ट्र का विकास चाहते हैं। विदेशी ताकतों ने हमारी युवा पीढ़ी के दिमाग में जनरेशन जेड शब्द घुसा दिया है। माय लाइफ, माय रूल्स आदि कितने ही नेरेटिव उनके मन मस्तिष्क में बसा दिए हैं। इन सभी बातों को आगे बढ़ाने में कुछ तथाकथित बुद्धिजीवियों ने कहानियाँ भी लिख डाली हैं। सिनेमा ने तो एक कदम आगे बढ़कर फिल्में बना रहा है जिसमें जिस्म का खुलापन, रिश्तों को तोड़ना, देह का भोग आदि सभी कुछ नजर आता है।

भारतीय समाज और भारतीय ज्ञान परंपरा को तथाकथित बुद्धिजीवियों और सिनेमा ने बौना दिखाने का काम किया है। पूजा-पाठ, संस्कार, परंपरा, समाज में रहना और सामाजिक मान्यताओं को बनाए रखने को ढकोसला तथा ओछापन बताकर दिखाया गया है। पुस्तकों से भारतीय ज्ञान, संस्कार, संस्कृति, तीज-त्योहार आदि एक ही झटके में हटा दिए गए। आज की पीढ़ी इन सभी बातों से दूर नजर आ रही है जबकि गुरुकुल, संस्कृत पाठशालाओं, भारतीय ज्ञान परंपरा से जुड़ी संस्थाओं आदि में समाज, संस्कृति, संस्कार, राष्ट्र सभी कुछ दिखाइए दे रहा है। भाषा भी वहां परिनिष्ठित सुनाई पड़ती है। ऐसे लोगों के परिवार और समाज में संस्कार अभी जीवित हैं।

दूसरी ओर जनरेशन जेड कहीं जाने वाली पीढ़ी में तेजी और आधुनिकता दिखाई देती है। सभी कुछ तत्काल प्रभाव से पाना, उसे जल्दी से छोड़ देना, जल्दी ही किसी भी स्थिति में मोह भंग हो जाना। यह इनका विशेष गुण कहा जा सकता है। स्थिरता इनमें कम नजर आती है। जबकि संस्कार बच्चों में धीरे-धीरे बढ़ाते हैं, पल्लवित और पोषित होते हैं। जब वह अपने उत्कर्ष पर होते हैं, वह राष्ट्र के नवनिर्माण में कार्य करते हैं। विदेशी ताकतों को अपने संस्कार, सहनशीलता, विचार से ही हरा देते हैं। उसके लिए सड़क पर उतरने या कहीं अभद्र भाषा का प्रयोग करने की जरूरत नहीं पड़ती है। हमें अपनी ज्ञान परंपरा को जीवित रखना होगा, बच्चों में संस्कार भरने होंगे। यही आने वाली पीढ़ियों के लिए लाभदायक सिद्ध होगा।

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Author: Bharat Sarathi

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