उभरती अराजकता के सबक

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डॉ० मत्स्येन्द्र प्रभाकर

हाल ही में अपने-आप को ‘कॉकरोच’ कहे जाने वाले कथित ‘छात्र आन्दोलन” से जो दृश्य उभरे, वे सतही आक्रोश नहीं बल्कि गहरी सामाजिक विफलता की ऊँची-ऊँची लकीरें हैं। सोशल मीडिया पर वायरल हुए वीडियो और तस्वीरों में न केवल अभद्र भाषा और शारीरिक धक्का-मुक्की दिखी, बल्कि अनेक स्थानों पर शैक्षिक बहस और शान्तिपूर्ण प्रदर्शन की जगह घृणा, उकसावे और अराजकता का प्रदर्शन हुआ। कुछ रिपोर्टों में आयोजनों के दौरान नारेबाज़ी के साथ पत्थराव और तोड़फोड़ की घटनाओं का भी जिक्र आया; प्रशासन ने उसे नियंत्रित करने के लिए हस्तक्षेप किया और कुछ छात्र-समूहों पर पुलिस कार्रवाई, गिरफ्तारी तथा चोटों की खबरें दर्ज की गयीं। ये घटनाएँ व्यक्तिगत विस्फोट नहीं हैं—ये संकेत हैं कि हमारा पारिवारिक और शैक्षिक तंत्र विफल हो रहा है।

समस्या की जड़ : संस्कृति बनाम कौशल का असन्तुलन :

स्वतंत्रता के बाद की पीढ़ियों ने राष्ट्र को आधुनिक बनाने का काम किया — उद्योग, शिक्षा और पेशेवर सफलता पर जो जोर आया, वह प्रशंसनीय है। पर यह गौर करने योग्य है कि उसी समय चरित्र‑निर्माण, नैतिक शिक्षा और सार्वजनिक मर्यादा को प्राथमिकता नहीं दी गयी। माता‑पिता व्यस्त हुए, परिवारों का समय कम हुआ, और प्रतिस्पर्धात्मक शिक्षा ने सीखने के लक्ष्य को केवल नौकरी पाने तक सीमित कर दिया। परिणामतः बच्चे और युवा केवल ‘कौशल’ पाते गये पर ‘मानव’ बनने के आवश्यक पाठ छूटते गये मसलन : सहानुभूति, संयम, तर्कपूर्ण बहस, और सार्वजनिक जिम्मेदारी। यही वह रिक्ति है जिसका नुकसान आज हम सार्वजनिक मञ्चों पर देख रहे हैं।

मीडिया और सोशल प्लेटफॉर्म : दर्पण भी, प्रोत्साहक भी :

सोशल मीडिया ने हर सार्वजनिक घटना को तेज़ी से और व्यापक रूप से फैलाने की शक्ति दी है। यह शक्ति दर्पण के समान है—जहाँ समाज के चरित्र की झलक दिखती है—पर साथ ही यह ईंधन भी भरता है। त्वरित, सनसनीखेज क्लिप और कट‑पेस्ट की गयीं क्लिपें भावनाओं को भड़काती हैं, सन्दर्भ खो जाता है, और झुण्डबाजी का मनोविज्ञान जोर पकड़ता है। कई बार गुस्से और प्रदर्शन को राजनीतिक रंग दे दिया जाता है; अराजकता को लम्बी साँस मिल जाती है। जब पारिवारिक और शैक्षिक बुनियाद कमजोर हो और बहुल मीडिया‑प्रेरित उत्तेजना मिल जाए, तो परिणाम भयावह होते हैं।

संस्थागत विफलता : विश्वविद्यालय, छात्र संगठन और प्रशासन :

कई मामलों में विश्वविद्यालय प्रशासन और छात्र संगठनों की जवाबदेही पर सवाल उठते हैं। संस्थान जहां खुले संवाद और तर्क‑वितर्क को बढ़ावा देने चाहिए थे, वहां कभी-कभी निष्क्रियता, देर से हस्तक्षेप या राजनीतिक दलों के असर ने माहौल और बिगाड़ दिया। कुछ घटनाओं में छात्र नेताओं के आपसी टकराव, बाहरी एजेण्डा का प्रवेश और ‘ऑपरेटिव’ समूहों की भागीदारी रही, जिसके कारण हिंसा और अश्लीलता पर अंकुश नहीं लग पाया। प्रशासनिक पारदर्शिता और त्वरित संवादहीनता ने क्रोध को और बढ़ाया। यही कारण है कि आज एकाधिकार में बैठे संरचनात्मक घटकों—गृह, विद्यालय, और विश्वविद्यालय—की कार्यप्रणाली पर गम्भीर सोच जरूरी हो गयी है।

भावनात्मक-नैतिक क्षरण : क्या हम बच्चे ही नहीं सिखा रहे सही?

हम जिस बात को अनदेखा कर रहे हैं, वह यह है कि मानवता को आकार देने में केवल पाठ्यपुस्तक ही काफी नहीं। बच्चा जब घर में पहले संस्कार और मर्यादा नहीं पाता, तो उसका सार्वजनिक आचरण भी असंयत होता है। कई अभिभावक आज बच्चों को “जीतना” और “कमाना” सिखाते हैं — सफलता का एकमात्र पैमाना बन गया है—पर ज़िन्दगी की सबसे कठिन परखें: संयम, सहानुभूति, सहअस्तित्व—इन पर प्रशिक्षण नहीं दिया गया। परिणामस्वरूप युवा वर्ग में संवेदनशीलता और तर्क की कमी दिखती है; छोटी-छोटी उत्तेजनाओं पर हिंसा और गाली-गलौज का सहारा लिया जा रहा है।

समाधान : कठोर, पर व्यावहारिक कदम आवश्यक :

यहाँ केवल चीखकर दोषारोपण से काम नहीं बनने वाला। समाधान बहुआयामी और दृढ़ होना चाहिए:-

शिक्षा‑सुधार : स्कूलों और विश्वविद्यालयों में नैतिक शिक्षा, नागरिकता और जीवन-क्षमता को पाठ्यक्रम का अनिवार्य हिस्सा बनाना होगा। केवल करियर‑गाइडेंस नहीं, बल्कि ‘कैसे इंसान बनें’—यह पाठ होना चाहिए।

पारिवारिक नीतियाँ : माता‑पिता को समय निकालकर बच्चों से संवाद करना होगा; माता‑पिता प्रशिक्षण और काउंसलिंग प्रोग्राम प्रोत्साहित किये जाने चाहिए।

संस्थागत जवाबदेही : विश्वविद्यालय प्रशासन और छात्र संगठनों के लिए पारदर्शी अन्वेषण और त्वरित दण्डात्मक व्यवस्था होनी चाहिए; बाहरी उकसावे और हिंसात्मक तत्वों की सक्रिय निगरानी हो।

मीडिया‑जागरूकता : सोशल मीडिया कम्पनियों और मञ्चों को पब्लिशिंग‑रूल्स को सख्ती से लागू करना चाहिए; सन्दर्भहीन, उकसाने वाली क्लिपों पर फ़ैक्ट-चेक तथा लेबलिंग अनिवार्य हो।

सामुदायिक हस्तक्षेप : स्थानीय स्तर पर नागरिक मञ्च, धार्मिक तथा सांस्कृतिक संगठनों तथा एनजीओ’ज मिलकर किशोरों के लिए व्यवहारिक कार्यशालाएँ और नैतिक शिक्षा के कार्यक्रम सञ्चालित करें।

राजनीति और रोना-काना : बहाने नहीं चलेंगे :

हम यह भी भूल रहे हैं कि इन घटनाओं को कभी-कभी राजनीतिक खेल के रूप में इस्तेमाल कर लिया जाता है—किसी भी हिंसा या असभ्य घटनाओं को चुनकर राजनीतिक झण्डा बुलन्द कर दिया जाता है। यह रवैया समस्या को गहरा और लम्बी अवधि का बना देता है। अगर सरकारें और नीति‑निर्माता मात्र लाइनों और बयानबाजी में लगे रहेंगे, तो असल सुधार नहीं होगा। हमें कठोर, निष्पक्ष और दीर्घकालिक नीतियाँ चाहिएं—न की पलायनवाद और दिखावटी नारों की भरमार।

निष्कर्ष : चेतना चेतना — या विनाश :

देश को तकनीकी, आर्थिक और वैश्विक स्तर पर आगे बढ़ाना आवश्यक है, पर वह तभी सार्थक होगा जब नागरिकों में इंसान होने का बोध जिन्दा हो। अगर आज हम केवल कौशल और करियर तक सीमित रहेंगे और मानवीय गुणों को छोड़ देंगे, तो आने वाली पीढ़ियाँ शक्तिशाली विपक्ष नहीं, बल्कि असभ्यता, हिंसा और शोषण की मशीन बनकर उभरेंगी। आज की घटनाएँ चेतावनी हैं—या हम अभी सुधार करें, या फिर हमारा समाज धीरे-धीरे उन विकृतियों का शिकार होगा जिन्हें रोकना बाद में और कठिन और महंगा होगा। समय आ गया है—सोचने का, बदलने का और जड़ से सुधार करने का—न सिर्फ नारे लगाने का।

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Author: Bharat Sarathi

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