अंतर्राष्ट्रीय न्याय दिवस: न्याय की रफ्तार पर खड़े सवाल

👇समाचार सुनने के लिए यहां क्लिक करें

करोड़ों लंबित मुकदमों और वर्षों तक खिंचती सुनवाई के बीच भारत के सामने सबसे बड़ा प्रश्न—क्या विलंबित न्याय वास्तव में न्याय है?

कमलेश पांडेय
वरिष्ठ पत्रकार एवं राजनीतिक विश्लेषक

अंतर्राष्ट्रीय न्याय दिवस (17 जुलाई) केवल न्याय की महत्ता का स्मरण कराने का अवसर नहीं है, बल्कि यह स्वयं से एक कठिन प्रश्न पूछने का भी दिन है—क्या वर्षों बाद मिला न्याय वास्तव में न्याय कहलाता है?

आज दुनिया के अनेक देशों की तरह भारत में भी करोड़ों मुकदमे लंबित हैं। अनेक वादियों की पूरी उम्र अदालतों के चक्कर लगाते-लगाते बीत जाती है। कई मामलों में निर्णय तब आता है, जब पीड़ित या आरोपी इस दुनिया में ही नहीं रहते। ऐसे में न्यायिक प्रक्रिया की विश्वसनीयता और प्रभावशीलता पर प्रश्न उठना स्वाभाविक है और इस विशेष दिवस पर प्रासंगिक भी।

हमें यह समझना होगा कि 21वीं सदी के भारत की न्यायिक व्यवस्था की सफलता इस बात से नहीं आंकी जाएगी कि उसने कितने ऐतिहासिक फैसले दिए, बल्कि इस आधार पर आंकी जाएगी कि उसने आम नागरिक को कितनी जल्दी, कितनी निष्पक्षता से और कितनी कम लागत में न्याय उपलब्ध कराया। इसलिए भारत का लक्ष्य केवल “फास्ट जस्टिस” नहीं, बल्कि “फेयर, फास्ट एंड अफोर्डेबल जस्टिस” होना चाहिए। यही विकसित भारत की न्यायिक पहचान बन सकती है।

कानूनी मामलों के जानकारों के अनुसार, न्याय में देरी के पीछे न्यायाधीशों की कमी, बार-बार स्थगन, जटिल कानूनी प्रक्रियाएँ, अपर्याप्त न्यायिक ढांचा और मुकदमों की बढ़ती संख्या जैसी कई वजहें हैं। लेकिन सबसे बड़ी विडंबना यह है कि विलंबित न्याय केवल एक प्रशासनिक समस्या नहीं रह जाता, बल्कि सामाजिक और आर्थिक समस्या भी बन जाता है। इससे आम नागरिक का न्यायपालिका पर विश्वास कमजोर पड़ सकता है और कई बार लोग वैकल्पिक तथा गैर-कानूनी रास्तों की ओर आकर्षित हो सकते हैं।

इस अवसर पर सबसे बड़ा यक्ष प्रश्न यही है—क्या न्याय केवल सही निर्णय देने का नाम है, या सही समय पर सही निर्णय देना ही वास्तविक न्याय है? यदि न्याय समय पर नहीं मिलता, तो उसका नैतिक और व्यावहारिक महत्व दोनों कम हो जाते हैं। इसलिए न्यायिक सुधार, तकनीक का बेहतर उपयोग, न्यायाधीशों की संख्या में वृद्धि, वैकल्पिक विवाद निपटान (ADR) को बढ़ावा तथा अनावश्यक स्थगनों पर नियंत्रण जैसी पहलें अब विकल्प नहीं, बल्कि आवश्यकता बन चुकी हैं।

अंतर्राष्ट्रीय न्याय दिवस हमें यह संकल्प लेने का अवसर देता है कि न्याय केवल निष्पक्ष ही नहीं, बल्कि त्वरित, सुलभ और प्रभावी भी होना चाहिए। क्योंकि लोकतंत्र की वास्तविक शक्ति केवल कानून के शासन में नहीं, बल्कि समय पर मिलने वाले न्याय में निहित होती है।

सवाल यह है कि इस कसौटी पर भारत कहाँ खड़ा है?

भारत की स्थिति मिश्रित है। एक ओर भारतीय न्यायपालिका विश्व की सबसे स्वतंत्र और सम्मानित न्याय प्रणालियों में गिनी जाती है, जिसने अनेक ऐतिहासिक फैसलों के माध्यम से संविधान और मौलिक अधिकारों की रक्षा की है। दूसरी ओर, त्वरित न्याय के पैमाने पर भारत अब भी गंभीर चुनौतियों का सामना कर रहा है।

सर्वोच्च न्यायालय के अधिवक्ता सुधांशु चौधरी के अनुसार, स्थिति की प्रमुख तस्वीर इस प्रकार है—

1. लंबित मुकदमे

देशभर की अदालतों में करोड़ों मामले लंबित हैं। इनमें सबसे अधिक मामले जिला न्यायालयों में हैं, जबकि उच्च न्यायालयों और सर्वोच्च न्यायालय में भी लंबित मामलों का भारी बोझ बना हुआ है।

2. न्याय मिलने में लंबा समय

भूमि विवाद, दीवानी मुकदमे, पारिवारिक विवाद और अनेक आपराधिक मामलों में अंतिम निर्णय आने में वर्षों, बल्कि कई बार दशकों तक लग जाते हैं।

3. अंडरट्रायल कैदी

भारतीय जेलों में बड़ी संख्या ऐसे कैदियों की है, जिनका मुकदमा अभी पूरा नहीं हुआ है। यह “शीघ्र न्याय” की कसौटी पर एक गंभीर चुनौती है।

4. सुधार के प्रयास

ई-कोर्ट परियोजना, वर्चुअल सुनवाई, राष्ट्रीय न्यायिक डेटा ग्रिड (NJDG), फास्ट ट्रैक कोर्ट, लोक अदालतें और मध्यस्थता जैसी व्यवस्थाओं के माध्यम से सुधार के प्रयास किए गए हैं और कुछ क्षेत्रों में सकारात्मक परिणाम भी सामने आए हैं।

इसलिए सबसे बड़ा प्रश्न यही है कि क्या न्यायालयों का उद्देश्य केवल न्याय देना है, या समय पर न्याय देना भी उतना ही आवश्यक है? जब एक पीढ़ी मुकदमा दायर करे और दूसरी पीढ़ी फैसला सुने, तो लोकतंत्र में न्याय की प्रभावशीलता पर प्रश्न उठना स्वाभाविक है।

सुलगता सवाल: न्याय की गुणवत्ता और निष्पक्षता बनाए रखते हुए उसकी गति कैसे बढ़ाई जाए?

अंतर्राष्ट्रीय न्याय दिवस पर भारत के सामने सबसे बड़ी चुनौती यही है कि न्याय की गुणवत्ता और निष्पक्षता बनाए रखते हुए न्याय की गति कैसे बढ़ाई जाए। आने वाले वर्षों में भारतीय न्यायपालिका की सफलता का वास्तविक आकलन इसी कसौटी पर होगा।

इस चुनौती का समाधान केवल अधिक न्यायाधीश नियुक्त करने में नहीं, बल्कि व्यापक न्यायिक सुधारों में निहित है।

पहला, जनसंख्या और मुकदमों की संख्या के अनुपात में पर्याप्त न्यायाधीशों तथा आधुनिक न्यायालयों की स्थापना की जाए।

दूसरा, समयबद्ध सुनवाई की संस्कृति विकसित हो तथा अनावश्यक स्थगनों पर प्रभावी अंकुश लगाया जाए।

तीसरा, ई-फाइलिंग, डिजिटल रिकॉर्ड, कृत्रिम बुद्धिमत्ता आधारित केस मैनेजमेंट और वर्चुअल सुनवाई जैसी तकनीकों का व्यापक उपयोग हो।

चौथा, लोक अदालत, मध्यस्थता और पंचाट जैसी वैकल्पिक विवाद समाधान प्रणालियों को बढ़ावा दिया जाए ताकि छोटे और दीवानी विवाद अदालतों के बाहर ही सुलझ सकें।

पाँचवाँ, उच्च न्यायालयों और अधीनस्थ न्यायालयों में रिक्त न्यायिक पदों को प्राथमिकता के आधार पर शीघ्र भरा जाए।

छठा, त्वरित न्याय के नाम पर न्याय की गुणवत्ता से कोई समझौता न हो। प्रत्येक पक्ष को सुनने, साक्ष्यों की निष्पक्ष जांच और कारणयुक्त निर्णय की परंपरा अक्षुण्ण रहनी चाहिए।

सातवाँ, पुलिस और अभियोजन तंत्र में सुधार किया जाए। यदि जांच समयबद्ध, वैज्ञानिक और निष्पक्ष होगी, तो अदालतों में मुकदमों का निपटारा भी अधिक प्रभावी होगा।

निष्कर्षतः भारत का लक्ष्य केवल “फास्ट जस्टिस” नहीं, बल्कि “फेयर, फास्ट एंड अफोर्डेबल जस्टिस” होना चाहिए। क्योंकि न्याय तभी सार्थक है, जब वह समय पर मिले, सभी के लिए समान हो और उसकी लागत इतनी अधिक न हो कि एक सामान्य नागरिक न्याय मांगने से ही पीछे हट जाए।

अंततः एक विचारोत्तेजक प्रश्न हमारे सामने खड़ा है—क्या लोकतंत्र में न्यायालयों की सफलता का पैमाना केवल ऐतिहासिक फैसले हैं, या यह भी कि एक सामान्य नागरिक को उसके जीवनकाल में समय पर न्याय मिल जाए?

यदि इसका उत्तर दूसरा है, तो न्यायिक सुधार अब भविष्य का एजेंडा नहीं, बल्कि वर्तमान की अनिवार्य आवश्यकता है।

Bharat Sarathi
Author: Bharat Sarathi

Leave a Comment

और पढ़ें

error: Content is protected !!