“निजी शिक्षा, ट्यूशन संस्कृति और रटंत व्यवस्था के बीच फंसा मध्यम वर्ग अब ऐसी शिक्षा व्यवस्था की तलाश में है, जो बच्चों को केवल अंक नहीं, बल्कि समझ, कौशल और रोजगार से भी जोड़े।”
सरदूल सिंह

आज हर माता-पिता, विशेषकर मध्यम वर्ग, अपने बच्चों की शिक्षा और भविष्य को लेकर अत्यंत चिंतित हैं। सरकारी विद्यालयों में शिक्षकों की कमी और उपलब्ध शिक्षकों को गैर-शैक्षणिक एवं प्रशासनिक कार्यों में लगाए जाने के कारण नियमित शिक्षण प्रभावित हो रहा है। यही कारण है कि जागरूक मध्यम वर्ग तेजी से निजी शिक्षण संस्थानों की ओर रुख कर रहा है। राजस्थान सहित अनेक राज्यों में सरकारी विद्यालयों की तुलना में निजी स्कूलों में नामांकन में उल्लेखनीय वृद्धि इसी प्रवृत्ति का परिणाम है।
पिछले चार-पांच वर्षों में सरकारी विद्यालयों में विद्यार्थियों की संख्या में आई गिरावट के पीछे तीन प्रमुख कारण दिखाई देते हैं। पहला, शिक्षकों के रिक्त पद; दूसरा, शिक्षकों पर गैर-शैक्षणिक कार्यों का बढ़ता बोझ; और तीसरा, आर्थिक तंगी के कारण बढ़ता ड्रॉपआउट। मध्यम और गरीब परिवारों की आय में लगातार कमी आने से अनेक बच्चों को पढ़ाई बीच में छोड़कर परिवार की आर्थिक सहायता के लिए खेतों, दुकानों या छोटे-मोटे रोजगारों में लगना पड़ता है।
एक महत्वपूर्ण प्रश्न यह भी है कि बच्चों के भविष्य को लेकर चिंतित मध्यम वर्ग इस धारणा का शिकार हो चुका है कि सफलता और सुरक्षित भविष्य का एकमात्र मार्ग रटने वाली शिक्षा है। परिणामस्वरूप बच्चों की योग्यता का आकलन उनकी समझ, रचनात्मकता और जिज्ञासा से नहीं, बल्कि भारी गृहकार्य पूरा करने और पाठ याद करने की क्षमता से किया जाने लगा है।
इस मानसिकता के कारण लोग व्यवस्था में परिवर्तन की मांग करने के बजाय स्वयं को उसी के अनुरूप ढालने का प्रयास करते हैं। गांवों से शहरों की ओर पलायन बढ़ रहा है और परिवार अपनी आय का बड़ा हिस्सा निजी अंग्रेजी माध्यम स्कूलों की फीस पर खर्च कर रहे हैं।
अंग्रेजी माध्यम के विद्यालयों में प्रवेश के साथ ही अनेक बच्चों के सामने भाषा एक बड़ी चुनौती बन जाती है। शब्दों और अवधारणाओं की मूल समझ विकसित न हो पाने के कारण उन्हें विषयों को समझने के बजाय याद करने पर अधिक निर्भर होना पड़ता है। स्थिति यह हो जाती है कि विद्यालय के बाद लगभग हर बच्चे को ट्यूशन का सहारा लेना पड़ता है। विडंबना यह है कि कई बार यह ट्यूशन उसी शिक्षक के पास होती है जो विद्यालय में उसे पढ़ाता है। माता-पिता का समय भी बच्चों को विभिन्न ट्यूशन केंद्रों तक पहुंचाने और वापस लाने में व्यतीत होने लगता है।
इन ट्यूशन केंद्रों में भी मुख्य जोर रटने पर ही रहता है। पढ़ाई को इतना बोझिल बना दिया जाता है कि बच्चा अपनी सेहत और बचपन दोनों को दांव पर लगा देता है। अनुभव बताते हैं कि केवल रटने के आधार पर अर्जित ज्ञान व्यावहारिक जीवन में सीमित उपयोगिता रखता है। हालांकि वर्तमान परीक्षा और अंक प्रणाली भी काफी हद तक स्मरण शक्ति पर आधारित है, इसलिए विद्यार्थी सफलता का एकमात्र आधार रटंत शिक्षा को ही मान बैठते हैं।
शिक्षा मनोविज्ञान के अनुसार, यदि बालक में अध्ययन के प्रति स्वाभाविक रुचि विकसित न हो तो शिक्षा ज्ञान बनने के बजाय मानसिक बोझ बन जाती है। शिक्षा को इस बोझ से मुक्त करने के लिए विषयों को रोचक और जीवन से जुड़ा बनाना आवश्यक है। इसके लिए सही उच्चारण, दृश्य माध्यमों और व्यावहारिक अनुभवों के माध्यम से अवधारणाओं को समझाना जरूरी है। जब तक बालक किसी विषय की मूल संकल्पना और उससे जुड़ी तकनीकी शब्दावली को नहीं समझता, तब तक शिक्षा अधूरी रह जाती है।
अक्सर परिवार तब निराशा का अनुभव करते हैं जब शिक्षा पूरी होने के बाद भी युवा अपनी योग्यता और रुचि के अनुरूप रोजगार प्राप्त नहीं कर पाते। पहले रटकर पढ़ाई का बोझ और बाद में मनोनुकूल रोजगार न मिलने का दबाव युवाओं के जीवन को प्रभावित करता है। उत्पादन, सेवा क्षेत्र अथवा विदेशों में उपलब्ध अनेक रोजगार ऐसे होते हैं जो विद्यार्थियों की शिक्षा और रुचि से मेल नहीं खाते।
यदि शिक्षण पद्धति में आवश्यक परिवर्तन किए जाएं तो बच्चे अवधारणाओं को सहजता से आत्मसात कर सकते हैं और उनमें वैज्ञानिक दृष्टिकोण विकसित हो सकता है। उदाहरण के लिए, यदि इतिहास को केवल तिथियों और घटनाओं के रूप में याद कराने के बजाय उसके सामाजिक, आर्थिक और वैज्ञानिक कारणों के साथ पढ़ाया जाए, तो विद्यार्थी वर्तमान को बेहतर ढंग से समझने और भविष्य के सामाजिक परिवर्तनों का आकलन करने में सक्षम होंगे।
वास्तव में शब्द किसी मूर्त वस्तु या अनुभव का अमूर्त रूप होते हैं। जब बालक मूर्त और अमूर्त के इस संबंध को समझ लेता है, तो पढ़ाई उसके लिए बोझ नहीं रह जाती। शिक्षा को व्यावहारिक बनाने का वास्तविक अर्थ भी यही है कि ज्ञान को जीवन और अनुभव से जोड़ा जाए। यदि यह पूरी प्रक्रिया मातृभाषा के माध्यम से संचालित हो, तो सीखना और भी सहज और प्रभावी बन सकता है।
जब किसी विषय का क्रमिक और वैज्ञानिक विकास विद्यार्थी की समझ में आने लगता है, तब शिक्षा उसके मार्ग की बाधा नहीं, बल्कि उसके समग्र विकास का सबसे सशक्त साधन बन जाती है। और यदि शिक्षा व्यवस्था युवाओं को उनकी योग्यता और रुचि के अनुरूप सम्मानजनक रोजगार उपलब्ध कराने में सक्षम हो सके, तो वह एक अधिक न्यायपूर्ण, समतामूलक और सशक्त समाज के निर्माण की दिशा में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है।









