बरसात तेरी ऐसी की तैसी!

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सड़कों, पुलों और इमारतों की पोल खोलने वाली ‘निर्दयी’ बरसात पर एक व्यंग्य

कस्तूरी दिनेश

एक नंबर की जलनखोर, बेहूदा मौसम है यह डायन बरसात! दूसरों का बैंक-बैलेंस, बंगला, मोटरगाड़ी और सुख-चैन इसे फूटी आंख नहीं सुहाता। आते ही यह अच्छे-भले, ईमानदार और भोले-भाले लोगों की पोलपट्टी खोलने में लग जाती है। इस नकटी को सामाजिक मर्यादा का भी थोड़ा-बहुत ख्याल नहीं कि आखिर लोग क्या कहेंगे!

जरा ग्रीष्म और शीत ऋतु को देखिए, कितनी सभ्य, शांत और मर्यादित हैं। कोई कितना भी गिरा हुआ या नीच इंसान क्यों न हो, उसके बारे में कभी एक शब्द नहीं बोलतीं, न चुगली करती हैं और न शिकायत। अच्छे लोग ऐसे होते हैं, बरसात की तरह नहीं कि आते ही दूसरों पर कीचड़ उछालना शुरू कर दें।

बेचारे ठेकेदार और अफसर ठंड में ठिठुरते हुए और गर्मी में बंगला-गाड़ी तथा बाल-बच्चों को छोड़कर पसीना बहाते हुए करोड़ों रुपये की शानदार टू-लेन और फोर-लेन सड़कें बनाते हैं। लेकिन यह साली बरसात आते ही उन्हें खोद-खोदकर, तोड़-फोड़कर उनकी दैया-मैया एक कर देती है। इतने बड़े गड्ढे बना देती है कि उनमें दस-बीस चक्के वाला ट्रेलर भी समा जाए।

अरी बेहया! कम से कम मंत्री जी के उद्घाटन तक तो रुक जाती। धैर्य नाम की चीज भी तुझमें नहीं है। अरे, बेचारे लोगों ने इस मेहनत के काम में थोड़ा-बहुत गिट्टी, सीमेंट, रेत और डामर इधर-उधर कर ही लिया तो कौन-सा आसमान टूट पड़ा? बाल-बच्चेदार लोग हैं, दो पैसे नहीं कमाएंगे तो परिवार चलाएंगे कैसे? सरकारी वेतन से भी कहीं घर चलता है भला!

करोड़ों-अरबों का पुल ठीक से बन भी नहीं पाता और तुम आकर उसे मिनट-दो मिनट में भरभराकर गिरा देती हो। क्या यही इंसानियत है? पुल पूरा बन जाता, मंत्री जी मुस्कुराते हुए आते, फीता काटते, उद्घाटन होता, तालियां बजतीं और जयकारे लगते, तो कितना अच्छा लगता। थोड़ा ठहर नहीं सकती थी, चुड़ैल? मंत्री जी का लाव-लश्कर गुजर जाता, उसके बाद गिरा देती तो तुम्हारा क्या चला जाता?

स्कूल-कॉलेज की इमारतें अभी पूरी बन भी नहीं पातीं, अस्पतालों के भवन अधूरे ही रहते हैं और तुम उनके पीछे पड़ जाती हो। भरे बाजार, खुलेआम और दिनदहाड़े उन्हें ऐसे गिरा देती हो मानो किसी आतंकवादी हमले का दृश्य हो। क्या तुम्हारी नजर में दूसरों की दिन-रात की मेहनत का कोई मूल्य नहीं? करोड़ों-अरबों का नुकसान होता है, उसे कौन भरेगा? तुम्हारा बाप?

सरकार में बैठे लोग भी अजीब हैं। पूरा दोष और बदमाशी तुम्हारी और गाज गिरती है बेचारे गरीब इंजीनियरों और ठेकेदारों पर। बदनामी उनकी, कार्रवाई उन पर! करे कोई और भरे कोई। क्या इन गरीब इंजीनियरों और ठेकेदारों पर तुम्हें जरा भी तरस नहीं आता?

अरी आतंकवादी, हृदयहीन बरसात! तेरी ऐसी की तैसी। सुधर जा। कहीं इन ईमानदार, पवित्र हृदय वाले बेचारे इंजीनियरों और ठेकेदारों की आह तुझे लग गई, तो डूब मरने के लिए चुल्लू भर पानी भी नसीब नहीं होगा!

Bharat Sarathi
Author: Bharat Sarathi

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