मध्यप्रदेश और झारखंड राज्यसभा चुनावों में अलग-अलग मापदंड अपनाने का आरोप, चुनाव आयोग और सुप्रीम कोर्ट की भूमिका पर उठाए सवाल
रेवाडी, 13 जून 2026। स्वयंसेवी संस्था ग्रामीण भारत के अध्यक्ष वेदप्रकाश विद्रोही ने आरोप लगाया है कि मध्यप्रदेश और झारखंड के राज्यसभा चुनावों से जुड़े घटनाक्रमों ने देश में लोकतंत्र, संविधान और निष्पक्ष चुनाव प्रक्रिया पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। उन्होंने कहा कि निर्वाचन अधिकारियों, चुनाव आयोग और सुप्रीम कोर्ट के रवैये से यह प्रतीत होता है कि अब यह तय करने का अधिकार भी राजनीतिक दलों और मतदाताओं के हाथ में नहीं रह गया कि चुनाव कौन लड़ेगा और कौन नहीं।
विद्रोही ने कहा कि मध्यप्रदेश में कांग्रेस उम्मीदवार मीनाक्षी नटराजन का नामांकन पत्र कथित रूप से मनमाने ढंग से रद्द कर दिया गया। उन्होंने आरोप लगाया कि चुनाव आयोग के समक्ष शिकायत और सुनवाई के बावजूद आयोग ने मामले पर कोई स्पष्ट निर्णय नहीं दिया, जिससे भाजपा उम्मीदवारों के निर्विरोध निर्वाचित होने का रास्ता साफ हो गया। उन्होंने इसे लोकतंत्र की हत्या बताते हुए कहा कि यदि संविधान का रक्षक सुप्रीम कोर्ट भी ऐसे मामलों में हस्तक्षेप से इनकार कर दे तो लोकतांत्रिक संस्थाओं की जवाबदेही पर प्रश्नचिह्न लगना स्वाभाविक है।
विद्रोही ने झारखंड राज्यसभा चुनाव का उल्लेख करते हुए कहा कि उद्योगपति परिमल नाथवानी के नामांकन पत्र में कथित खामियां होने के बावजूद उन्हें सुधार का अवसर दिया गया और नया शपथपत्र स्वीकार कर चुनाव लड़ने की अनुमति प्रदान की गई। उनके अनुसार यह प्रक्रिया चुनावी नियमों और कानूनों की भावना के विपरीत है।
उन्होंने सवाल उठाया कि यदि मध्यप्रदेश और झारखंड दोनों भारत के ही राज्य हैं तो समान प्रकृति के मामलों में अलग-अलग मानदंड कैसे अपनाए जा सकते हैं। विद्रोही ने आरोप लगाया कि एक ही चुनावी प्रक्रिया में अलग-अलग उम्मीदवारों के लिए अलग-अलग नियम लागू किए गए, जिससे चुनाव आयोग की निष्पक्षता पर संदेह उत्पन्न होता है।
ग्रामीण भारत अध्यक्ष ने कहा कि इन घटनाओं ने लोकतंत्र और संविधान की रक्षा से जुड़ी संस्थाओं की कार्यप्रणाली पर गंभीर प्रश्न खड़े किए हैं। उन्होंने आरोप लगाया कि चुनाव आयोग अब केवल वोटों की नहीं बल्कि सीटों की राजनीति का माध्यम बनता जा रहा है, जबकि सुप्रीम कोर्ट अपनी संवैधानिक जिम्मेदारियों के निर्वहन में अपेक्षित सक्रियता नहीं दिखा रहा।
विद्रोही ने कहा कि लोकतांत्रिक मूल्यों और संविधान की रक्षा के लिए अब देश की जनता को जागरूक होकर आगे आना होगा तथा लोकतांत्रिक संस्थाओं की जवाबदेही सुनिश्चित करने के लिए आवाज उठानी होगी।








